एन. रघुरामन का कॉलम:  कला को पनपना है तो अमीरों को सहायता और शिक्षितों को प्रोत्साहन देना चाहिए
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एन. रघुरामन का कॉलम: कला को पनपना है तो अमीरों को सहायता और शिक्षितों को प्रोत्साहन देना चाहिए

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11 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

आईपीएल पूरा होने की वजह से लंबे समय बाद किसी रविवार की शाम मुझे लगा कि मेरे पास करने के लिए कुछ नहीं था। परिवार ने एकाएक तय किया कि मुंबई के बांद्रा स्थित नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर (एनएमएसीसी) चलें। वहां हम पारंपरिक भरतनाट्यम नृत्य शो ‘इकोज ऑफ तंजावुर- द अनब्रोकन’ देखने पहुंचे।

125 सीटों वाले छोटे किन्तु पूरे भर चुके एक्सपेरिमेंटल थिएटर में मेरी नजर एक परिचित चेहरे पर पड़ी। मेरी तथाकथित इंटेलिजेंस तुरंत सक्रिय हुई, सवाल उठाया कि ‘ये यहां कैसे? इनका तो इस कार्यक्रम से कोई संबंध नहीं है।’ मैंने अंदाजा लगाया कि उनकी उम्र इस छोटे ऑडिटोरियम की कुल बैठक क्षमता की लगभग आधी होगी। फिर भी, वे पूरी तरह से उस शास्त्रीय नृत्य कला में खोए थे, जो तंजावुर जिले की विरासत है। इसी स्थान से मैं भी आता हूं।

उसी क्षण मेरे दिमाग ने मुझे सोमवार के लेख का विषय दे दिया। दिमाग ने शो खत्म होते ही उनका इंटरव्यू लेने का निर्देश दिया। मेरा योजनाबद्ध और उत्सुकता भरा पहला सवाल यही होने वाला था कि ‘आप यहां कैसे?’ फिर लगा कि किसी वरिष्ठजन से ऐसा सवाल पूछना कितना मूर्खतापूर्ण होता।

वे 73 वर्षीय अनंग देसाई थे, जिन्हें कल्ट-क्लासिक सिटकॉम ‘खिचड़ी’ में चिड़चिड़े लेकिन सबके चहेते परिवार के मुखिया ‘बाबूजी’ (तुलसीदास पारेख) के किरदार के लिए जाना जाता है। 100 से अधिक टीवी शो और 70 फिल्मों के करियर वाले देसाई का पालन-पोषण अहमदाबाद में हुआ।

उनके पिता कार्डियोलॉजिस्ट और मां सिंगर व पेंटर थीं। अपनी कला को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा तथा फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में निखारने के कारण उनकी कलात्मक समझ बेहद गहरी है। बात की तो वे मुस्कराए और बोले, ‘कला तो कला है। मुझे हर रूप में कला से प्रेम है।’

वे इससे ज्यादा सही नहीं हो सकते थे। जो परफॉर्मेंस हमने देखी, वो तंजावुर क्वार्टेट से उपजी है। प्रिया मुरले, लेखा प्रसाद और स्नेहा महेश विशाल द्वारा प्रस्तुत यह नृत्य कला सर्फोजी-द्वितीय (1777–1832) के राजदरबार में विकसित हुई थी। सर्फोजी-द्वितीय तंजावुर के दूरदर्शी मराठा शासक थे, जिनके दौर में व्यापक सांस्कृतिक, शैक्षणिक और वैज्ञानिक पुनर्जागरण हुआ था।

उनका दरबार उत्कृष्ट संगीतकारों, रचनाकारों और उन नट्टुवनारों को एक मंच पर लाया, जो मंजीरे बजा कर लयबद्ध बोलों के जरिए नर्तकों का मार्गदर्शन करते थे। कार्यक्रम की खूबसूरती कई अप्रत्याशित रूपों में सामने आई। प्रिया ने पैरों से नृत्य नहीं किया, बल्कि आंखों की अभिव्यक्ति से पूरी कहानी बताई।

बेहद खूबसूरती से भगवान कृष्ण और कुचेला (सुदामा) की नि:स्वार्थ मित्रता और दिव्यता जीवंत की। मैंने उनसे जाकर कहा, ‘वाह, आज एहसास हुआ कि कोई सिर्फ आंखों से भी पूरी कहानी कह सकता है।’ इसे भरतनाट्यम की भाषा में ‘अभिनयम’ कहते हैं। वहीं, लेखा और स्नेहा ने भगवान शिव की स्तुति में ‘कीर्तनम’ प्रस्तुत किया और उनकी जटिल, ब्रह्मांडीय मुद्राओं को अद्भुत सौंदर्य के साथ साकार किया।

उस शाम मुझे एहसास हुआ कि ऐसे हेरिटेज आर्ट फॉर्म्स को मुख्यधारा का ऐसा मंच देना कितना मूल्यवान होता है, जहां वर्ल्ड क्लास थिएटर में वैश्विक मानकों की साउंड, लाइटिंग और मंच सज्जा हो। यह निश्चित ही विचारणीय है। 90 मिनट के कार्यक्रम के बाद मेरा मन दो वर्गों के प्रति कृतज्ञता से भर गया।

पहले, वे समृद्ध लोग जिन्होंने ऐसा ठिकाना बनाया और उभरती प्रतिभाओं के लिए इसे खोला, ताकि संस्कृति फल-फूल सके। दूसरे, वे बुद्धिमान दर्शक जिन्होंने हर सीट भर दी, कला को समझा और सही समय पर तालियां बजाईं। इससे कलाकारों को लगा कि वे ऐसे दर्शकों के सामने प्रस्तुति दे रहे हैं, जो कला की बारीकियों को अच्छे-से समझते हैं। अनंग देसाई इस दूसरे वर्ग का एक शानदार उदाहरण थे।

फंडा यह है कि कला की एक यूनिवर्सल भाषा होती है, जो हर भाषाई सीमा के परे है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हमारी समृद्ध विरासत को सच में सुरक्षित रखना है तो अमीरों को आर्थिक सहायता देकर ऐसे ठिकाने मुहैया कराने होंगे, जहां संस्कृति फल-फूल सके और शिक्षित लोगों को उसे जिंदा रखने के लिए बौद्धिक सराहना देनी होगी।

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