बोरिया मजुमदार का कॉलम:  इस बार विश्व कप के प्रति पहले जैसा उत्साह क्यों नहीं?
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बोरिया मजुमदार का कॉलम: इस बार विश्व कप के प्रति पहले जैसा उत्साह क्यों नहीं?

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भारत में फीफा विश्व कप के लिए उपयुक्त ब्रॉडकास्टिंग पार्टनर ढूंढने में हुई कठिनाइयों पर पहले ही काफी कुछ लिखा जा चुका है। आखिरकार, कुछ दिन पहले ही फीफा के साथ ‘जी’ के 8 साल के करार की घोषणा हो पाई। हालांकि इसकी कीमत 2022 और 2018 में चुकाई गई रकम से कम रही। इसके पीछे कई कारण हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है। फीफा को इतनी कठिनाई क्यों हुई और कीमतें कम क्यों रहीं? पहला कारण यह है कि अब टूर्नामेंट में 48 टीमें हैं। यानी शुरुआती दौर के बहुत-से मुकाबले भारतीय बाजार के लिए उतने रुचिकर नहीं होंगे। वास्तव में इनमें से कई सारी टीमों को भारतीय फुटबॉल प्रशंसक फॉलो तक नहीं करते। ऐसे में कम ही संभावना है कि दर्शक पूरी रात जागकर उन खिलाड़ियों को देखेंगे, जिन्हें वे जानते तक नही। मैचों के देर रात में होने से भी कम ही ब्रांड उनसे जुड़ना चाहेंगे। ऐसे में ब्रॉडकास्टर्स इस उत्पाद के लिए कीमतें कम रखने को मजबूर हैं। दूसरा कारण यह है कि फुटबॉल विश्व कप का समय इंग्लैंड में होने वाले महिला टी20 विश्व कप और उसके बाद भारत-इंग्लैंड के टी20 और 50 ओवरों वाले वाइट-बॉल मुकाबलों से टकरा रहा है। हो सकता है रोहित शर्मा और विराट कोहली इंग्लैंड की धरती पर आखिरी बार खेलते दिखें। ऐसे में भारतीय दर्शकों के लिए उन्हें देखना ज्यादा रुचिकर होगा। 19 जुलाई को लॉर्ड्स में होने वाला मुकाबला फीफा विश्व कप फाइनल के साथ टकरा रहा है तो माना जा सकता है कि भारतीय प्रशंसक फुटबॉल की तुलना में क्रिकेट देखने के लिए ज्यादा उत्साहित होंगे। इसमें यदि विम्बलडन को भी जोड़ दें तो तय है कि फुटबॉल विश्व कप को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम घर में टी20 विश्वकप जीत चुकी है तो अब महिला टी20 विश्वकप को लेकर भी भारतीय दर्शकों की गहरी दिलचस्पी है। इसके अधिकतर मुकाबले भारतीय समयानुसार रात को शुरू होंगे तो इनका समय भी फीफा मैचों से टकरा सकता है। ऐसे में भारतीय दर्शक बंट जाएंगे। महिला टी20 विश्व कप के प्रसारण अधिकार जियो के पास हैं, जबकि वाइट-बॉल सीरीज के अधिकार सोनी के पास हैं। मतलब, दोनों ब्रॉडकास्टर्स के पास दिखाने के लिए पर्याप्त क्वालिटी कंटेंट मौजूद है और उन्हें फीफा के लिए बड़ी रकम खर्च करने की जरूरत नहीं लगी। ‘जी’ ने इस अवसर का इस्तेमाल खेल बाजार में दोबारा प्रवेश करने के लिए किया है और कहना चाहिए कि यह एक समझदारी भरा कदम है। भारतीय बाजार बड़ा है और फीफा भी ग्लोबल साउथ के इस सबसे बड़े बाजार से दूर नहीं रहना चाहेगा। कीमतों को कम रखना जरूरी था, इसलिए मांग तथा आपूर्ति के प्रतिस्पर्धी माहौल में अंत समय तक मोलभाव की लड़ाई बनी रही। इस डील से 2022 के विश्वकप की तुलना नहीं की जा सकती। इसके दो और कारण हैं। पहला, तब बड़ी संख्या में भारतीय कतर पहुंचे थे और माहौल ऐसा था जैसे विश्वकप भारत में ही हो रहा हो। दूसरा, तब सभी स्टेडियम एक घंटे की दूरी पर थे तो एक दिन में कई मैच देख पाना संभव था। समय का अंतर भी ऐसा था कि भारतीय दर्शक लगभग सभी मैच प्राइम टाइम में देख सकते थे। वर्तमान परिदृश्य की तुलना करते वक्त इन तमाम फैक्टर्स को ध्यान में रखा जाना चाहिए। लेकिन विश्व कप की ब्रॉडकास्ट डील भारत में फुटबॉल की स्थिति को भी दर्शाती है। फिलहाल भारतीय फुटबॉल बेहद खराब दौर से गुजर रहा है और हमारे पास बीते दो वर्षों में चर्चा करने लायक कुछ भी नहीं रहा है। अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) इंडियन सुपर लीग (आईएसएल) को पटरी पर लाने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहा है। आज भी यह स्पष्ट नहीं कि अगले वर्ष क्या होगा। ब्रॉडकास्ट पार्टनरों ने अभी तक कोई डील नहीं की है और कई क्लब प्रस्तावित व्यवस्था के विरोध में हैं। कुछ समय पहले फुटबॉल में भारत की रैंकिंग 99वें स्थान पर थी, लेकिन आज हम 140 से भी निचले पायदान पर हैं। हालांकि महिला फुटबॉल में सुधार दिख रहा है और अंडर-17 एएफसी एशियन कप का प्रदर्शन भी शानदार रहा, लेकिन भारत के पुरुष फुटबॉल को एक नई ऑक्सीजन की जरूरत है। देर रात को होने वाले मैच, 48 टीमों का फॉर्मेट, क्रिकेट के प्रति अत्यधिक रूझान, भारतीय फुटबॉल की बुरी हालत- ये तमाम कारण हैं, जिनके चलते इस बार 2022 के फीफा विश्वकप जैसा उत्साह प्रशंसकों में नहीं दिखलाई दे रहा है।
(ये ले​खक के अपने विचार हैं)



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