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कहानी: बचपन के दिन बेहद ख़ूबसूरत होते हैं, जो हमेशा याद रहते हैं, आइए इस कहानी के ज़रिए बचपन की यादें ताज़ा कर लें…


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प्रीतम सिंह15 घंटे पहले

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मेरे घर के सामने जाती हुई धूप से घर की परछाई जहां बन रही थी वहां ख़ाली मैदान है जो मेरे जन्म से भी पहले से ख़ाली है। वहां खेलती एक बच्ची को उसकी मम्मी घसीटते हुए अंदर ले जा रही थी, ‘चलो अंजलि अंदर, अभी बाहर नहीं खेलना है। कोई इन्फेक्शन हो गया तो।’ कहते हुए उसे अंदर लेकर दरवाज़ा बंद कर दिया। उसी घर में जहां मेरे बचपन का यार रहता था। मगर अब किराएदार रहते हैं। जब कभी किराया लेने आता है तब ही मिलना हो पाता है। नौकरी लगते ही दूसरे शहर में सेटल हो गया है।

यहीं सामने तो खेलते थे हम। इन्फेक्शन के डर ने आज के बचपन को घर में क़ैद कर दिया है। अब से पहले तक सबका बचपन इससे आज़ाद था। शाम गहरा रही थी और इधर मेरी चाय कप की तली तक पहुंच रही है। तभी सामने तीन-चार बच्चे खेलने के लिए जमा हो गए। उन सबमें मैं ख़ुद को और अपने यार को ढूंढ रहा था। सोलह-सत्रह साल पहले इसी तरह शाम को हम भी इकट्‌ठा हो जाया करते थे। हमारे आस-पास ज़्यादा घर नहीं थे। मैं अपनी बहनों लता और तनु दीदी के साथ खेलता था। एक दिन पास में मकान बना, जिसमें पराग और उसका परिवार रहने आया। पराग भी मेरा हमउम्र ही था। उससे बड़ी बहन थी सुमन दीदी। वह हिम्मती और बड़े दिलवाला था पर शरारत में मुझसे कम था। इधर मैं सबसे छोटा था और सबसे बड़ी लता दीदी थीं।

जब हम तीनों खेलते तो वो दोनों भी आते। शुरू में हमारी उन दोनों से बनती नहीं थी। एक बार हमने उनके पीछे कुत्ता दौड़ा दिया था। बाद में उसकी बहन ने मां से बोलकर हमंे डांट पड़वाई थी। अगले दिन हम सितोलिया खेल रहे थे, तभी पराग वहां आकर गिलोल (गुलेल) से पत्थरों की ढेरी गिराकर भाग गया। गिलोल का बड़ा शौक़ था उसे। हर वक़्त वो उसे अपने साथ रखता था। फिर मैं भागा उसके पीछे तो वह घर में जा घुसा। मैंने उसे घर से निकलने पर मज़ा चखाने की धमकी दे डाली।

ऐसे ही एक दिन मैं लता दीदी के साथ फुटबॉल खेल रहा था। वो भी खेलने आया। मैंने दीदी को चुप रहने का इशारा किया। फिर मैंने फुटबॉल में कुछ ऐसे किक मारी कि वो उसकी पीठ पर जा लगी। वो रोता हुआ अपने घर चला गया। मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कोई जंग जीत ली हो। एक दिन लता दीदी को मम्मी ने कुछ सौदा लाने बाहर भेजा। चुपके से मैं भी साथ हो लिया। हमारे घर से कुछ दूरी पर एक पहाड़ी थी और सड़क के पास से पहाड़ी पर जाने का एक छोटा-सा रास्ता था। वहां बेर की छोटी-छोटी झाड़ियां थीं। दीदी बेर तोड़ने के लिए रुक गईं। शाम ढलने को थी, पर बचपन को शाम से क्या लेना-देना। उसे तो बेर दिख रहे थे। ‘अंकुर, दीदी, जल्दी भागो’ तभी कान के पर्दे चीरते हुए शब्द सुनाई दिए। दीदी और मैंने एक दूसरे को देखा। दोनों की आंखों में एक अंजाना डर पनपने लगा। “ये तो पराग की आवाज़ है’ सामान्य होते हुए मैंने दीदी से कहा। ‘हुंह! फालतू में ही डरा दिया’ दीदी के शब्दों को सुनकर ऐसा लगा जैसे उन्होंने डर को भगा दिया हो। ‘यहां आ गया तो बेर मांगेगा। तू मत सुन उसकी बात, चुपचाप बेर तोड़’ दीदी ने एक सख़्त आदेश देते हुए ध्यान न देने को कहा। ‘अंकुर भाग पहाड़ी से जंगली कुत्ता आ रहा है’ पराग ने पास आते हुए कहा। उसकी सांस फूल रही थी। इतना सुनना था कि दीदी और मैंने एक साथ पहाड़ी की ओर देखा। सचमुच एक कुत्ता आ रहा था। मेरी तो जान सूख गई। दीदी के भी होश उड़ गए। दीदी और मैं किसी मूर्ति में तब्दील हो चुके थे। पराग ने वहां पड़ी एक लकड़ी उठा ली। तभी उसकी बहन भी वहां आ गई। ‘तुम दोनों यहां क्या कर रहे थे…? और तू पराग…इनके पीछे-पीछे आ गया’ कहते हुए सुमन दीदी ने भी झट से पेड़ की झुकी हुई टहनी तोड़ ली। वो कुत्ता हमारे सामने आ चुका था। पराग और उसकी बहन ने निडर होकर लकड़ी से उसको डराया, तो कुत्ता भाग गया। शायद हमें एक साथ देखकर उसे भी डर लगा होगा। फिर हम सब घर आ गए। बाद में मम्मी ने बताया वो लकड़बग्गा था। उस दिन से हम पांचों एक हो गए थे। बस समूह दो बन गए थे। अब तीनों लड़कियों की खिचड़ी अलग पकती, तो पराग और मेरी दाल अलग। गर्मियों के एक दिन मैं पराग को पहाड़ी के नीचे बने कुंड पर ले गया, जो पेड़ों से घिरा रहता था। मेरी गर्दन तक पानी था उसमंे। मैं सैकड़ों बार उसमें नहा चुका था छुप-छुपकर। वहां एक पेड़ पर मधुमक्खियों का छत्ता था। एक बार जिन्हें छेड़ने पर ठुड्डी सूजी थी मेरी। जब पराग को मैंने छत्ता दिखाया तो देखते ही उसने गिलोल से निशाना साधा और हम कूद पडे कुंड में। हम अंदर और नाराज़ मधुमक्खियां बाहर। मैंने चुपके से निकलकर देखा तो ऊपर ‘उहहम’ की धुन सुनाई दी। ‘अंकुर, पराग, कहां हो तुम दोनों…? छुपो मत… मैंने तुम दोनों को यहां आते देख लिया था’ तभी तनु दीदी की आवाज़ सुनाई दी। हम कितनी देर पानी में रहते। मैंने मुंडी बाहर निकालकर ज़ोर से चिल्लाकर कहा – ‘तनु दीदी…हम इधर हैं।’ कह तो दिया था मगर कुंड से बाहर आ नहीं सकते थे। मेरी आवाज़ सुनते ही दीदी हमारी तरफ़ आने लगीं। समझ में नहीं आया क्या करें। तभी दीदी ने पानी पर मंडराती मधुमक्खियों के झुंड को देख लिया और वे वहां से ऐसे भागीं जैसे किसी प्रतियोगिता में दौड़ रही हों। हम दोनों का हंस-हंसकर बुरा हाल हो रहा था। फिर कपड़े पहनकर हम भी जल्दी से भागे। मगर भागते-भागते पराग के हाथ पर तीन-चार मधुमक्खियों ने डंक मार ही दिए। रोता-उछलता हुआ पराग अपने घर गया। कभी हम छुपन-छुपाई खेलते तो कभी सब मिलकर बेर तोड़ रहे होते। कभी चेन तोड़ तो कभी बर्फ-पानी खेलते। कभी हम पत्थरों को मुट्ठी में भरकर जमा कर लिया करते फिर बैठकर कुंड में इस होड़ में फेंकते कि किसके पत्थर की आवाज़ तेज़ आती है। धीरे-धीरे वक़्त ने करवट बदली एक-एक कर हम सबकी शादियां हो गईं। बहनें ससुराल चली गईं और पराग शहर जाकर व्यस्त है। तभी मंदिर कि घंटियोंं की आवाज़ से मेरी चेतना लौटी। चाय का कप उठाकर मैं नीचे जाने लगा। यादों में कुंड में कंकड़ फेंकते पांच बच्चे कौंध रहे थे और अंतर्मन में बचपन की यादें।

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