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अमेरिका की विदेश नीति मध्य और मध्य-पूर्व एशिया की ओर: बाइडेन मानवाधिकार को विदेश नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल कर रहे, निशाना चीन पर; मौजूदा हालात में पाक की मुश्किलें ज्यादा


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11 मिनट पहले

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अमेरिकी कांग्रेस के चार्टर से बने इस पॉलिसी फोरम के विशेषज्ञ से दैनिक भास्कर के रितेश शुक्ल ने खास बातचीत की। - Dainik Bhaskar

अमेरिकी कांग्रेस के चार्टर से बने इस पॉलिसी फोरम के विशेषज्ञ से दैनिक भास्कर के रितेश शुक्ल ने खास बातचीत की।

  • साउथ एशिया सेंटर के उपनिदेशक से समझिए अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा के मायने

अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद नए विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकेन एक साथ कई देशों की यात्रा पर निकले हैं। अफगानिस्तान से निकलने के अमेरिका के फैसले के बाद अब उसके विदेश मंत्री की यात्रा का मुख्य फोकस मध्य और मध्य-पूर्व एशिया है।

भारत यात्रा के दौरान मानवाधिकार के मुद्दे पर उनके वक्तव्यों की चर्चा तो हुई, मगर साउथ एशिया सेंटर के उपनिदेशक माइकल कूगेलमान का कहना है कि इससे कहीं ज्यादा जरूरी ये समझना है कि अमेरिका किस तरह मानवाधिकार के मुद्दे को अपनी विदेश नीति का एक हथियार बना रहा है, जिसका निशाना चीन होगा। अमेरिकी कांग्रेस के चार्टर से बने इस पॉलिसी फोरम के विशेषज्ञ से दैनिक भास्कर के रितेश शुक्ल ने खास बातचीत की। पढ़ें मुख्य अंश…

ब्लिंकेन की भारत यात्रा में क्या नया है?
अफगानिस्तान में भारत की भूमिका व मानवाधिकार पर खुली चर्चा मेरे मत में नया है। दरवाजे के पीछे चर्चा होना और पब्लिक डोमेन में इनका आना अलग बातें हैं।

बाइडेन मानवाधिकार को विदेश नीति का औजार बना रहे हैं?
हां, ये सच है। बाइडेन ने फॉरेन पॉलिसी का आधार लोकतंत्र, मानवाधिकार व समानता को बनाया है। फरवरी में यूएन के मानवाधिकार काउंसिल से दोबारा जुड़ने की घोषणा की थी, जिससे ट्रम्प 2018 में अलग हुए थे।

अमेरिका में भी तो मानवाधिकार समस्या हैं?
बाइडेन ये जानते हैं। लिहाजा जून में ही कांग्रेस से उन्होंने आग्रह किया था कि ‘फॉर द पीपुल एक्ट’ पास करें ताकि वे इस पर मुहर लगा सकें।

ब्लिंकेन भारत में थे, रक्षा मंत्री लॉएड सिंगापुर में तो पाक के रक्षा सलाहकार और आईएसआई के डीजी अमेरिका क्यों गए थे?
अमेरिका में पेंटागन और सीआईए भी है। खुफिया विभाग से मुलाकात हुई होगी। वह कहता रहा है कि अमेरिका को बेस नहीं देगा जबकि अमेरिका ने बेस मांगा ही नहीं है। अमेरिका का उसके साथ 30 साल का करार है कि वो पाक का एयर स्पेस इस्तेमाल कर सकता है। ब्लिंकेन भारत के बाद कुवैत गए, जहां बंद दरवाजे के पीछे काफी चर्चाएं हुईं।

पाकिस्तान के सामने कैसी चुनौतियां हैं?
अब पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर उथल-पुथल बढ़ेगी। रिफ्यूजी बढ़ेंगे जो वह नहीं चाहता। तालिबान को देख पाक में तहरीक-ए-तालिबान भी देश पर कब्जे का मंसूबा बांध सकता है। पाक के दोनों बॉर्डर पर खतरा बढ़ गया है। पीओके में आजादी के नारे लग रहे हैं। आशा है कि जल्द वह भारत से सीजफायर पर तैयार हो जाएगा।

अमेरिका भारत से क्या चाहता है?
अफगानिस्तान में जिन देशों का भी दखल है उनमें एकमात्र भारत है, जिस पर अमेरिका को विश्वास है। खास बात ये है कि भारत की छवि वहां बेदाग है। अमेरिका की आवश्यकता है कि भारत का दखल इस क्षेत्र में बढ़े।

क्या तालिबान सरकार बना पाएगा?
बना सकता तो अब तक बना चुका होता। जनता निर्वाचित सरकार के अधीन है और उन क्षेत्रों पर आक्रमण करने का अर्थ है कि तालिबान दुनिया में अछूत करार दिया जाएगा।

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