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भास्कर इंटरव्यू- भावना जाट: नेशनल मेडल जीतने पर लोगों ने कहा था कि इस सर्टिफिकेट पर तो नमकीन रखकर खाओगी, उन्हें गलत साबित कर खुशी हुई


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नई दिल्ली2 मिनट पहले

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सफलता एक दिन में नहीं मिलती। इसके लिए सब कुछ त्याग करना पड़ता है। लोगों के तानों का सामना करना पड़ता है। फोकस होकर कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। तब कहीं जाकर सफलता मिलती है। इसका उदाहरण हैं राजस्थान के छोटे से गांव की रहने वाली भावना जाट। भावना कहती हैं- शुरुआती दिनों में लोग ताने मारते थे।

भावना आगे कहती हैं कि नेशनल मेडल जीतने पर परिवार के सदस्य ने कहा था कि इस सर्टिफिकेट का कुछ नहीं होगा, इस पर तो नमकीन रखकर ही खाओगी। तब दुख हुआ था, लेकिन अब लगता है कि वो नहीं होते तो शायद ही मैं यहां तक पहुंच पाती। जानते हैं कैसे भावना ने राजस्थान के छोटे से गांव से निकलकर टोक्यो ओलिंपिक तक का सफर तय किया…

सवालः आपके खेल के सफर की शुरुआत कैसे हुई?
जवाबः शुरुआती दिनों में खेल को लेकर कोई सपना नहीं था। मैंने कभी ओलिंपिक या अन्य गेम को लेकर नहीं सोचा था। पीटीआई सर के कहने पर वॉक शुरू कर दी थी। बस सही सोचकर कि एन्जाॅय करना है। लेकिन समय के साथ लगाव बढ़ते गया। शुरुआती दिनों का सफर काफी मुश्किल रहा है। जब मैं प्रैक्टिस करती थी तो भी लोग ताने मारते थे। लेकिन मम्मी-पापा और भाई का सपोर्ट रहा है। मेरी तैयारी के लिए भाई ने पढ़ाई तक छोड़ दी थी। 12वीं के बाद मैं उदयपुर चली आई।

सवालः तैयारी के लिए आपके पापा ने सोने गिरवी रखकर पैसे जुटाए थे। क्या यह सही है?
जवाबः किसान परिवार में पैसों की दिक्कतें तो हमेशा से रही हैं। पापा पैसे का जुगाड़ नहीं कर पाते थे। सोने गिरवी रखकर पैसा लोन पर लेते थे। भाई प्राइवेट जॉब करने लगा था तो वह आधी सैलरी मेरी तैयारी पर खर्च कर देते थे। शुरुआत भले ही मुश्किल रही हो, लेकिन समय के साथ मेरा भी हौसला बढ़ता गया।

सवालः क्या खेलने को लेकर आपको किसी ने ताने मारे?
जवाबः गांव में लड़के और लड़की में फर्क किया जाता था। लड़कियों को घर से बाहर नहीं जाना चाहिए। लड़कियों को सिर्फ घर का काम करना चाहिए। आपको बता दूं कि गांव में बहुत प्रतिभा है। उनके परिवार को सपोर्ट करने की जरूरत है। मेरी उन लोगों से गुजारिश है कि अपने बच्चों पर भरोसा कर उन्हें बाहर भेजिए। इसके साथ ही लड़के-लड़कियों में भेदभाव बंद करना चाहिए।

सवालः क्या आपको लगता है कि लड़कियों को सपोर्ट नहीं मिलता?
जवाबः मुझे ओलिंपिक के बारे में पता नहीं था। चार महीने पहले ही बताया था कि ओलिंपिक क्वालिफाइंग है। मैंने सोच लिया था कि जाना है। लेकिन दिक्कत तब आई जब आर्थिक तंगी हाे गई। लेकिन घर वालों का पूरा सपोर्ट रहा। लक्ष्य बनाकर तैयारी करने वालों की कभी हार नहीं होती। लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों से आगे हैं। उनको सपोर्ट मिले तो वे काफी कुछ कर जाएंगी।

सवालः नेशनल मेडल जीतने पर परिवार के सदस्यों का कैसा रिएक्शन था?
जवाबः नेशनल जीतने पर सर्टिफिकेट भी मिला था। इसको लेकर मेरे ही परिवार के सदस्य ने कहा था कि इससे कुछ नहीं होगा। नौकरी भी नहीं मिलेगी। इस सर्टिफिकेट पर नमकीन रखकर खाअोगी। तब बहुत दुख हुआ था, लेकिन अब ऐसे लोगों को गलत साबित कर काफी खुश हूं।

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