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E-इश्क: सुहानी ने वहां से निकलते समय आखिरी नजर आईने पर डाली और पहली बार उसे अपने चेहरे पर वह खुशी दिखी जो वह पिछले सालभर से ढूंढ़ रही थी


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  • While Leaving There, Suhani Cast Her Last Glance In The Mirror And For The First Time She Saw The Happiness On Her Face That She Was Looking For Since Last Year.

4 घंटे पहले

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“क्या यार सुहानी, कितने आईने और देखोगी..? सालभर से मैं भी तुम्हारे साथ यही उल-जुलूल चीजें कर रही हूं। कभी-कभी तो लगता है, तुम्हारे साथ आईनो की दुकानों में जाते-जाते कहीं मैं दिमागी संतुलन न खो दूं। क्या देखती हो घंटों, खरीदती तो हो नहीं। कम ऑन यार, आईना ही तो है, कोई भी ले लो।” सुहानी अपने विचारों के ध्यान से जागी और मन ही मन सोचने लगी, “सिर्फ आईना… कैसे समझाऊं पूजा तुम्हें, यह सिर्फ आईना नहीं है, यह तो वह दर्पण है जिसमें मेरा अक्स दिखता है। या यूं कहूं वही पुराना अक्स ढूंढ रही हूं, मेरा वही खुशहाल अक्स जो एकाकी नहीं था।” मन की उहापोह से बाहर निकलकर सुहानी ने पूजा से कहा, “सुनो पूजा, तुम हॉस्टल लौट जाओ, मुझे बाजार में कुछ और देर लगेगी।” पूजा को भेजकर सुहानी फिर एक बार आईने को इत्मिनान से ताकने लगी। उसकी नजरें आईने पर किसी सर्च लाइट की तरह कुछ ढूंढ रही थीं, पर उस प्रकाश में उसे सिर्फ अपना अंधकारमय अतीत नजर आ रहा था, जिसकी हर आवाज में एक ही नाम था, रोहन… जिसे सुहानी ने खुद अपना जीवनसाथी चुना था। रोहन और सुहानी एक-दूसरे से प्यार तो बहुत करते थे, पर रिश्ते की जिम्मेदारी को नहीं समझते थे। शादी के कुछ समय बाद ही दोनों में नोकझोंक शुरू हो गई। “रोहन… ओ… रोहन, जल्दी उठा करो, ऑफिस सिर्फ तुम नहीं जाते, मैं भी जाती हूं, अपने काम तो खुद कर लिया करो।” सुहानी ने झल्लाते हुए कहा। रोहन खीझ भरे स्वर में बोला, “तो मत किया करो मेरे काम, मुझ पर एहसान करने की कोई जरूरत नहीं है।”

इस तरह की शिकायतें शादी के दो-तीन महीनों में ही शुरू हो गई थी। कैरियर, ऑफिस से शुरू हुई छोटी-छोटी तकरारें जल्द ही रिश्तेदार, परिवार, मान-सम्मान तक पहुंच गई। छोटी-छोटी नोकझोंक अब लड़ाई-झगड़ों में तब्दील हो गई थी और साल भर में ही दोनों ने अपने रिश्ते से हार मान ली। आखिरकार दोनों ने एक छत के नीचे रहना छोड़ दिया। सुहानी विमेन हॉस्टल में शिफ्ट हो गई, जहां कुछ महीने बहुत अच्छे गुजरे। न किसी की जिम्मेदारी, न कोई एडजस्टमेंट, न ही कोई परिवार। पर धीरे-धीरे दोस्त, कैरियर और उसकी बेफिक्री की जिंदगी ने उसे एकाकी करना शुरू कर दिया। उस एकांतवास का सन्नाटा और अंतरात्मा का शोर अब उसे कचोट रहा था। रह-रहकर उसे रोहन के साथ बिताए पलों की याद आती थी। वह खुद को समझाती थी कि वह जैसी है उसमें ही खुश है, और उसे खुश रहने के लिए किसी रोहन की जरूरत नहीं। पर उसके इस झूठ की पोल उसके कमरे में लगा आईना एक पल में खोल देता, क्योंकि जब भी वह उस आईने में देखती उसे अपने अक्स की जगह अकेलापन और भयावह खामोशी ही नजर आती… उसकी खुशी और हंसी अब उस दर्पण में उसे दिखाई नहीं देते। तब से सुहानी हर दुकान से एक ऐसा दर्पण ढूंढती थी जो उसके चेहरे पर सच्ची खुशी दिखाता हो। सुहानी अपने अतीत के गलियारों में अभी घूम ही रही थी कि दुकानदार ने आवाज लगाई , “मैडम जी, पैक कर दूं यह वाला।” दुकानदार की आवाज से सुहानी चौंक गई, बोली, “नहीं…नहीं, मैं तो बस ऐसे ही…”

सुहानी ने वहां से निकलते समय आखिरी नजर आईने पर डाली और पहली बार उसे अपने चेहरे पर वह खुशी दिखी जो वह पिछले सालभर से ढूंढ रही थी। उसने आईने में देखा, उसके पीछे रोहन अपने दोस्त के साथ खड़ा था, वह मुड़ी और उसके पास गई, वह यह मौका छोड़ना नहीं चाहती थी। उसने पूछा, “रोहन तुम यहां कैसे..? कितने दिनों बाद तुम्हें देख रही हूं… कैसे हो रोहन..?” रोहन उसे एकटक देखता रह गया, उसकी आंखें कह रही थीं कि वह उसी किसी दर्पण की तलाश कर रहा है जिसे सुहानी खोज रही थी। रोहन ने अपने दोस्त को पीछे छोड़ा और सुहानी की ओर बढ़ा। वह मुस्कुराया और बोला, “सुहानी, तुम नहीं बदली… एक साथ इतने सारे सवाल…” वह उसे बहुत प्यार भरी नजरों से निहारने लगा, “कहां चली गई थी तुम मुझे छोड़कर? तुम्हारे जाने के कुछ दिनों बाद ही मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। मैं तुमसे बात करना चाहता था, तुमसे मिलना चाहता था। मैंने तुम्हें कितना ढूंढा, पर तुम्हारी कहीं कोई खबर नहीं थी… क्या तुम मुझे माफ कर सकती हो? शायद तुम्हारे जाने के बाद ही मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैं तुम्हें सिर्फ पसंद ही नहीं, प्यार भी करता हूं। मेरी जिद मेरी गलती थी। सुहानी ने उसे तिरछी नजर से देखा, उसके चेहरे पर जो पछतावा था, वो उसे देख पा रही थी। सुहानी की आंखें पानी से और होंठ मुस्कान से भर गए। रोहन बोला, “अगर तुम चाहो तो एक-एक कप फिल्टर कॉफी हो जाए? सुहानी ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा, “रोहन, तुम यहीं रुको, मैं अभी आई। वह भागी-भागी आईने की दुकान में आई और दुकानदार से बोली, “भैया… यही आईना पैक कर दो, मैं इसे खरीदूंगी।” शायद जो आईना सुहानी लंबे समय से ढूंढ रही थी, उसे वह दर्पण मिल चुका था। अपना आईना हाथों में पकड़े सुहानी रोहन के साथ वहां से चली गई।

– माधवी कठाले निबंधे

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