4 घंटे पहले
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आज (3 मार्च) भी फाल्गुन पूर्णिमा है। कल 2 तारीख की रात होलिका दहन हुआ, लेकिन आज चंद्रग्रहण की वजह से अधिकतर क्षेत्रों में धुलंडी नहीं मनाई जा रही है, इन क्षेत्रों में कल यानी 4 मार्च को होली खेली जाएगी।
आज का चंद्रग्रहण भारत में भी दिखाई देगा। ग्रहण दोपहर 3.21 बजे शुरू होगा और शाम 6.47 मिनट तक रहेगा। भारत में शाम को ग्रहण लगा हुआ चंद्र उदय होगा। सूतक और ग्रहण के समय में रंग-गुलाल खेलना, उत्सव मनाना, पूजा-पाठ करना शुभ नहीं माना जाता। इसी मान्यता की वजह से ज्यादातर पंडितों ने 4 मार्च को होली मनाने की सलाह दी है।
शाम को ग्रहण खत्म होने के बाद करें शुद्धिकरण
चंद्रग्रहण का सूतक ग्रहण शुरू होने से 9 घंटे पहले लग जाता है। ग्रहण दोपहर 3.21 बजे से शुरू होगा, इसलिए इसका सूतक सुबह 6.21 बजे से है। शाम को 6.47 बजे ग्रहण और सूतक खत्म होंगे। ग्रहण खत्म होने के बाद घरों में और मंदिरों में शुद्धिकरण किया जाता है। भक्त पहले खुद स्नान करते हैं और फिर देवी-देवताओं को भी स्नान कराते हैं। इसके बाद विधिवत पूजा-पाठ की जाती है।
सूतक के समय करें ये शुभ काम
ग्रहण और सूतक के समय में पूजा-पाठ, उत्सव मनाना, विवाह, गृह प्रवेश, जनेऊ संस्कार जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं, लेकिन इस दौरान मंत्र जप, दान-पुण्य खासतौर पर करना चाहिए। जरूरतमंद लोगों को अनाज, जूते-चप्पल, खाना, धन, कपड़े आदि चीजों का दान कर सकते हैं। किसी गोशाला में गायों की देखभाल के लिए धन का दान करें। गायों को हरी घास खिलाएं। किसी नदी-तालाब में मछलियों को आटे की गोलियां बनाकर खिलाएं। कहीं खुली जगह में चींटियों के लिए आटा-शकर डाल सकते हैं।
मान्यता- राहु-केतु से जुड़े ग्रहण की कथा
पुराने समय में देवताओं ने भगवान विष्णु की सलाह से असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन किया था। इस मंथन से कई दिव्य रत्न निकले और अंत अमृत निकला।
समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले थे। मंथन के अंत में जब अमृत निकला तो इसके लिए देवताओं और दानवों के बीच युद्ध होने लगा। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया और देवताओं को अमृतपान करवाने लगे।
जब सभी देवता अमृत पी रहे थे, उस समय राहु नाम का असुर देवताओं का वेश धारण करके वहां पहुंच गया था। राहु ने देवताओं के बीच बैठकर धोखे से अमृत पान कर लिया था।
चंद्र और सूर्य ने देवताओं के बीच बैठे राहु को पहचान लिया था। चंद्र-सूर्य ने भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दे दी। विष्णु जी ने क्रोधित होकर राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया, क्योंकि राहु ने भी अमृत पी लिया था, इस कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई। राहु का सिर धड़ से अलग हो गया। उसका सिर राहु और धड़ केतु बन गया।
चंद्र और सूर्य ने राहु का भेद खोल दिया था, इसलिए राहु चंद्र-सूर्य को अपना शत्रु मानता है और समय-समय पर इन दोनों ग्रहों को ग्रसता है। शास्त्रों में इसी घटना को सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण कहा जाता है।
विज्ञान के अनुसार कैसे होता है ग्रहण
चंद्रग्रहण एक खगोलीय घटना है। जब सूर्य और चंद्र के बीच पृथ्वी आ जाती है, ये तीनों ग्रह एक सीधी लाइन में आ जाते हैं और चंद्र पर पृथ्वी की छाया पड़ती है, तब चंद्रग्रहण होता है।









