पवन के. वर्मा का कॉलम:  अमेरिका अपने ही इतिहास से आखिर कब सबक लेगा?
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पवन के. वर्मा का कॉलम: अमेरिका अपने ही इतिहास से आखिर कब सबक लेगा?

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5 घंटे पहले

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पवन के. वर्मा
पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक - Dainik Bhaskar

पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक

इतिहास की एक अजीब आदत होती है। उसे नजरअंदाज करें तो वह अकसर त्रासदी के रूप में लौट आता है। सात दशकों से अधिक समय तक अमेरिका ने वैश्विक राजनीति पर असाधारण प्रभाव डाला है। लेकिन दूसरे देशों के मामलों में दखल देने के उसके रिकॉर्ड से जो चिंताजनक पैटर्न उभरता है, वह विवेकशीलता नहीं, उसकी इस भ्रांत धारणा का परिचय देता है कि जटिल समाजों को बाहरी दबाव, सत्ता परिवर्तन या कठपुतली शासकों की स्थापना के जरिए बदला जा सकता है।

ईरान में 1979 की क्रांति से पहले तक अमेरिका और उसके सहयोगी शाह रजा पहलवी का समर्थन करते रहे थे। ईरान के पास विशाल तेल भंडार थे और इन संसाधनों तक पहुंच सुनिश्चित करना पश्चिमी भू-राजनीतिक समीकरणों का केंद्रीय तत्व था। शाह अपनी पश्चिमी शिक्षा और आधुनिकीकरण के प्रति उत्साह के चलते पश्चिम के लिए एक आदर्श साझेदार थे। लेकिन तेहरान के महलों की चमक-दमक के नीचे एक दूसरा ईरान भी मौजूद था।

यह बाजारों, धर्मगुरुओं और फारसी समाज में गहरी जड़ें जमाए सांस्कृतिक व धार्मिक परंपराओं वाला ईरान था। शाह की पश्चिमीकृत जीवनशैली और उनका अधिनायकवादी शासन उनके अपने लोगों के बड़े हिस्से को उनसे दूर कर रहा था। अमेरिका ने इन विसंगतियों को पहचानने की कोशिश नहीं की और शाह को केवल एक अनुकूल सहयोगी और तेल आपूर्ति के भरोसेमंद संरक्षक के रूप में ही देखा।

नतीजा यह हुआ कि क्रांति ने राजशाही को उखाड़ फेंका और उसकी जगह एक धार्मिक गणराज्य स्थापित कर दिया, जो तभी से अमेरिका के प्रतिकूल रहा है। तुर्किये में भी पश्चिम ने उत्साहपूर्वक आधुनिकता के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क (1923–38) की विरासत का स्वागत किया। उनके व्यापक सुधारों का उद्देश्य उस्मानी साम्राज्य के पारंपरिक समाज को एक धर्मनिरपेक्ष, पश्चिमोन्मुख गणराज्य में बदलना था।

अतातुर्क की दृष्टि निस्संदेह साहसी थी, लेकिन उन्होंने यह मान बैठने की भूल की थी कि एक व्यापक रूढ़िवादी और धार्मिक समाज को पश्चिमी मूल्यों से निकटता रखने वाले एक छोटे-से अभिजात वर्ग के जरिए स्थायी रूप से बदला जा सकता है। दशकों तक यह व्यवस्था कायम रही। तुर्किये की सेना बार-बार विदेशी मूल्य प्रणालियों का अंधानुकरण करती रही और पश्चिमी सरकारें इसकी सराहना करती रहीं।

लेकिन समाजों की अपनी स्मृतियां होती हैं। सांस्कृतिक पहचानों को अनंतकाल तक दबाया नहीं जा सकता। समय के साथ रूढ़िवादी और धार्मिक तुर्कों की राजनीतिक ऊर्जा ने एर्दोगान के उदय और अधिक मुखर राजनीति को जन्म दिया। जिसे कभी पश्चिम के साथ जुड़ी एक आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया जाता था, वह धीरे-धीरे कहीं जटिल और विवादित राजनीतिक परिदृश्य में बदल गया।

वियतनाम में अमेरिका को यकीन था कि वह सैन्य हस्तक्षेप और एक कमजोर दक्षिण वियतनामी शासन के समर्थन से साम्यवाद को रोक सकता है। इसका परिणाम एक विनाशकारी युद्ध के रूप में सामने आया, जिसमें लाखों लोगों की जान गई और अंततः वही परिणाम सामने आया, जिसे अमेरिका रोकना चाहता था।

इराक में 2003 का आक्रमण व्यापक विनाश के हथियारों को समाप्त करने और क्षेत्र में लोकतंत्र लाने के आधार पर जायज ठहराया गया था। वे हथियार कभी नहीं मिले, राज्य-व्यवस्था ध्वस्त हो गई और उससे पैदा हुई अस्थिरता ने साम्प्रदायिक हिंसा तथा उग्रवादी आंदोलनों के उभार को बढ़ावा दिया। लीबिया में 2011 में पश्चिम समर्थित हस्तक्षेप से गद्दाफी को सत्ता से हटा दिया गया। इसे मानवीय सिद्धांतों की जीत बताया गया था। लेकिन उसके बाद का दौर लंबी अराजकता, प्रतिद्वंद्वी मिलिशियाओं और एक बिखरे हुए देश का रहा है।

आज ट्रम्प ईरान में सत्ता-परिवर्तन पर आमादा हैं। लेकिन ईरान की सांस्कृतिक विरासत बेहद समृद्ध है। लगभग नौ करोड़ की आबादी वाला यह देश एक विशाल और जटिल भू-भाग में बसा है। उसकी राजनीतिक व्यवस्था को बाहर से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। अमेरिका आखिर कब तक ताकत का जोर दिखाता रहेगा और पश्चिमी राजनीतिक मॉडल को सभी समाजों के लिए अनुकूल मानकर कार्रवाई करता रहेगा?

  • ट्रम्प ईरान में सत्ता-परिवर्तन पर आमादा हैं। लेकिन ईरान जैसे बड़े और जटिल देश की राजनीतिक व्यवस्था को बाहर से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। अमेरिका आखिर कब तक दुनिया में अपनी ताकत का जोर दिखाता रहेगा?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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