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जिन ओवैसी को भाजपा की बी-टीम या मुसलमानों के वोट काटने वाली पार्टी के नेता के तौर पर देखा जाता था, उन्हें अचानक राजनीति को प्रभावित करने वाली ताकत के रूप में देखा जाने लगा है। यह महाराष्ट्र के नगरीय निकाय चुनावों के नतीजों का कमाल है। इन चुनावों में ओवैसी की पार्टी (एआईएमआईएम) के प्रदर्शन ने आजादी के बाद पहली बार इस तरह की संभावनाएं पैदा कर दी हैं कि निकट भविष्य में भारत के मुसलमान केवल मुसलमानों की गोलबंदी पर आधारित एक मुसलमान नेता की पार्टी को भी वोट देने के बारे में सोच सकते हैं। अगर ऐसा हो गया तो उसका परिणाम क्या निकलेगा? इस सवाल का जवाब पाना मुश्किल नहीं है। उत्तर भारत की राजनीति पूरी तरह से बदल जाएगी। सपा और राजद जैसे बड़े राजनीतिक दलों का यूपी-बिहार में शक्तिशाली मुस्लिम-यादव जनाधार टूट जाएगा। कांग्रेस को बिहार और यूपी के बाहर मुसलमानों के जो वोट मिलते हैं (सारे देश में तकरीबन 35-37 फीसदी), उनकी संख्या बहुत घट जाएगी। दिल्ली में आम आदमी पार्टी कमजोर हो जाएगी। बंगाल में टीएमसी की झोली में गिरने वाले 27 फीसदी मुसलमान वोटों में भारी कटौती देखी जाएगी। कुल मिलाकर पूरे देश के पैमाने पर कमोबेश आजादी से पहले का वह नजारा उभरता हुए प्रतीत होगा, जिसमें एक तरफ कांग्रेस थी (जिसे जिन्ना हिंदू पार्टी कहते थे) और दूसरी तरफ मुस्लिम लीग थी, जो मुसलमानों की नुमाइंदगी का दम भरती थी। फर्क यह होगा कि कांग्रेस की जगह आज के हालात में हिंदू राष्ट्रवाद की पैरोकारी करने वाली भाजपा होगी। भारत की आबादी का जो धार्मिक समीकरण है, उसकी रोशनी में क्या भाजपा के लिए इससे ज्यादा फायदेमंद कोई और सियासी परिस्थिति हो सकती है? लेकिन क्या हम इस तरह के आकलन पर पहंुचने की जल्दबाजी तो नहीं कर रहे हैं? अभी तो ओवैसी के आकर्षण की नींव केवल शहरी और अर्ध-शहरी मुसलमान वोटों के बीच ही पड़ी है। ग्रामीण मुसलमान उनकी अपील से अभी दूर ही लग रहे हैं। दूसरे, अभी तक यह पार्टी तीन छोटे-छोटे इलाकों में ही जमती हुई दिखाई पड़ी है। पहला है हैदराबाद का पुराना शहर, जहां ओवैसी के पिता सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी ने 1967 में एआईएमआईएम की स्थापना की थी। दूसरा बिहार का सीमांचल है, जहां इस पार्टी ने दो विधानसभा चुनावों में चमकदार प्रदर्शन करके महागठबंधन को नुकसान पहुंचाया है। तीसरा इलाका महाराष्ट्र के कुछ नगर निगमों को माना जा सकता है, जहां इस पार्टी ने भाजपा को टक्कर देते हुए शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया है और उद्धव ठाकरे की शिवसेना से वह थोड़ी ही पीछे है। बाकी सभी जगहों पर एआईएमआईएम मुख्यतः अपने प्रदर्शन से भाजपा को लाभ पहुंचाती हुई दिखती है। मसलन, दिल्ली चुनाव में उसने 40 फीसदी मुसलमान आबादी वाले मुस्तफाबाद क्षेत्र में भाजपा के उम्मीदवार को जिताने में प्रमुख भूमिका निभाई। यूपी में इस पार्टी ने सात निर्वाचन क्षेत्रों को चुना, जहां उसे भाजपा के जीत के अंतराल से ज्यादा वोट मिले। हालांकि इतने कम आंकड़े किसी पार्टी के राष्ट्रीय पैमाने पर उभार के ठोस प्रमाण नहीं बन सकते। लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम एआईएमआईएम के उभार के लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य उपलब्ध करा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद सरकार द्वारा दुनिया भर में भेजे गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों में से एक की सदस्यता ओवैसी को मिली। इससे ओवैसी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वयं को भारतीय मुसलमानों के प्रतिनिधि चेहरे के रूप में पेश करने का मौका मिल गया। इधर मुसलमान मतदाता भी गैर-मुस्लिम नेतृत्व वाली उन पार्टियों से निराश हैं, जो अभी तक उनके वोटों की दावेदार मानी जाती रही हैं। एआईएमआईएम की कामयाबी से आजादी से पहले का वह नजारा उभरता प्रतीत हो रहा है, जिसमें एक तरफ कांग्रेस थी और दूसरी तरफ मुस्लिम लीग। फर्क यह है कि कांग्रेस की जगह आज हिंदुत्व की पैरोकारी करने वाली भाजपा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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