अभय कुमार दुबे का कॉलम:  मध्य-पूर्व के इस युद्ध ने कई सारी चीजों से परदा हटाया है
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अभय कुमार दुबे का कॉलम: मध्य-पूर्व के इस युद्ध ने कई सारी चीजों से परदा हटाया है

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7 घंटे पहले

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अभय कुमार दुबे, अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर - Dainik Bhaskar

अभय कुमार दुबे, अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर

क्या मध्य-पूर्व में बारह दिन तक मिसाइलों और बमों से लड़े गए युद्ध में असली झगड़ा केवल 408 किलोग्राम यूरेनियम का था? हम जानते हैं कि 1984 से लगातार कोशिश करते-करते ईरान इस यूरेनियम को केवल 60 फीसदी तक ही परिष्कृत कर पाया था।

एटम बम बनाने के लिए यह आंकड़ा 90 फीसदी तक पहुंचना जरूरी है। इसीलिए अमेरिका की इंटेलिजेंस चीफ तुलसी गबार्ड ने ट्रम्प की डांट खाकर बयान बदलने से पहले स्वीकार कर लिया था कि ईरान बम बनाने से काफी दूर है।

खास बात यह है कि अभी कुछ दिन पहले तक ट्रम्प का घोषित मकसद ईरानी यूरेनियम के एनरिचमेंट की सीमा तय करने का था। इसके लिए उनके और ईरान के बीच पांच दौर की बातचीत हो चुकी थी। बस एक दौर और होना था जिसके बाद एटमी संधि हो जाती। लेकिन, तब अचानक इजराइल ने ईरान पर हमला क्यों कर दिया?

और इस हमले के बाद ट्रम्प ने अचानक एनरिचमेंट की सीमा आरोपित करने का लक्ष्य बदलकर ईरान के पूरे परमाणु कार्यक्रम को तबाह करने का इरादा क्यों बना लिया? अमेरिका पर निर्भर इजराइल उससे बिना पूछे यह कदम उठाने की जुर्रत तो नहीं ही कर सकता था।

एक और जरूरी सवाल है। अमेरिका के बी-2 बमवर्षक विमानों ने ईरान के तीन एटमी संयंत्रों पर 14 जीबीयू-57 नामक बंकरतोड़क बम बरसाए। उसके पास ऐसे केवल 20 बम थे। अब बचे कुल छह। क्या अमेरिका के पास इस तरह की कोई गारंटी थी कि बाकी छह बम और डालने के बाद ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से खत्म हो जाएगा?

विशेषज्ञों में इस बात पर मतैक्य है कि अमेरिकी बमबारी में केवल संयंत्रों को नुकसान हुआ है, जिसकी भरपाई तीन-चार साल में हो सकती है। सैटेलाइट की तस्वीरें बताती हैं कि एनरिच्ड यूरेनियम तो ईरान ने ट्रकों में भरकर पहले ही हटा लिया था। क्या अमेरिका की सीमाओं को ईरान के सिर्फ एक हमले (कतर के फौजी अड्डे पर) ने उजागर नहीं कर दिया है? इन सभी सवालों का एक संभव जवाब इस युद्ध के शुरू और बंद होने की अंतर्कथा में छिपा है।

इसके मर्म में इजराइल, ईरान और मध्य-पूर्व के देशों के सत्ताधारियों पर हावी राजनीतिक असुरक्षा की भावना है। इसने ट्रम्प के मन की बेचैनियों के साथ जुड़कर हाहाकारी अंदेशों वाले युद्ध को जन्म दिया। युद्ध से पहले इजराइल के नेतन्याहू भ्रष्टाचार के इलजामों और बढ़ती अलोकप्रियता से जूझ रहे थे।

सत्ता में टिके रहने के लिए उन्होंने दो कट्टरपंथी पार्टियों का सहारा लिया, जिनके नेताओं ने उन्हें फिलिस्तीनी समस्या के राजनीतिक हल का विकल्प अपनाने नहीं दिया। नेतन्याहू जानते हैं कि अगर सत्ता गई तो उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जाना पड़ेगा।

ईरान के धार्मिक और राजनीतिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की सरकार भी अरसे से अलोकप्रियता का सामना कर रही थी। अपनी गिरती साख बचाने के लिए उन्हें भी युद्ध की आवश्यकता थी। उनके सत्ता से हटने का मतलब था 55 साल पुरानी इस्लामिक क्रांति का खात्मा। वे इतिहास में ऐसे अयातुल्ला की तरह नहीं दर्ज होना चाहते थे, जिसने इस्लामिक रिपब्लिक के सपने को नष्ट कर दिया हो। इसलिए उन्होंने खुदकुशी की हद तक जाने का फैसला कर लिया।

कुवैत, बहरीन, कतर, यूईए, सऊदी अरब जैसे देशों के शासक अमेरिकी पिट्ठू होने के साथ-साथ पूरी तरह से तेल पर निर्भर निरंकुश तंत्रों का संचालन कर रहे हैं। जैसे ही ईरान ने कतर और इराक के फौजी अड्डों पर मिसाइल बरसाए, उनके हाथ-पैर फूल गए।

उनके पास इस तरह के युद्ध में भाग लेने की सैन्य-क्षमता नहीं है। उन्होंने अमेरिका पर दबाव डाला कि युद्ध खत्म होना उनके लिए जरूरी है। मध्य-पूर्व के इस युद्ध ने सबकी पोलें खोल दी हैं। सबसे ज्यादा तो उसने स्वयं युद्ध की नीति की ही पोल खोल दी है कि उसके पीछे छुपकर राजनीतिक अक्षमता के परिणामों से नहीं बचा जा सकता।

मध्य-पूर्व के इस युद्ध के शुरू और खत्म होने की अंतर्कथा को समझना जरूरी है। इसने सबकी पोलें खोल दी। सबसे ज्यादा तो उसने युद्ध-नीति की पोल खोली है कि उसके पीछे छुपकर राजनीतिक अक्षमता के परिणामों से नहीं बचा जा सकता। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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