अमिताभ कांत का कॉलम:  तेल-गैस पर हमारी निर्भरता पर भी सवाल उठने चाहिए
टिपण्णी

अमिताभ कांत का कॉलम: तेल-गैस पर हमारी निर्भरता पर भी सवाल उठने चाहिए

Spread the love




पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने एक बार फिर दुनिया को याद दिलाया है कि ऊर्जा सुरक्षा भौगोलिक स्थितियों की बंधक है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण हाइड्रोकार्बन गलियारों में से एक के आसपास केंद्रित एक ही युद्ध तेल और गैस बाजारों को हिला देने के लिए काफी साबित हुआ है। ईरान के उत्तर और ओमान के दक्षिण में स्थित होर्मुज की खाड़ी के जरिए शिपिंग गंभीर रूप से बाधित हो गई है और दुनिया की प्रमुख ताकतें खुले तौर पर वैश्विक ऊर्जा प्रवाह पर घिर आए खतरे को स्वीकार रही हैं। वैश्विक तेल और एलएनजी का पांचवां हिस्सा इस संकरे गलियारे से गुजरता है। यह आधुनिक ऊर्जा इतिहास में देखी गई किसी भी घटना से अधिक गंभीर है। जहां 1970 के दशक के दोनों तेल झटकों में से प्रत्येक ने वैश्विक आपूर्ति को लगभग पांच मिलियन बैरल प्रतिदिन की क्षति पहुंचाई थी, वहीं वर्तमान संकट पहले ही अनुमानित 11 मिलियन बैरल प्रतिदिन की आपूर्ति को बाधित कर रहा है। इसके निहितार्थों को नजरअंदाज करना कठिन है और इसके प्रभाव विश्व अर्थव्यवस्था में गूंजने लगे हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक है। आंकड़े बताते हैं कि हम अपनी तेल आवश्यकताओं के 90% से अधिक और गैस की जरूरतों के लगभग आधे हिस्से के लिए आयात पर निर्भर हैं। हाल के हफ्तों में, खाड़ी क्षेत्र में व्यवधान बढ़ने के साथ ही नई दिल्ली को आपातकालीन ऊर्जा निगरानी के लिए मजबूर होना पड़ा है। सरकार ने यह भी स्वीकारा है कि भारत की एलपीजी खपत का लगभग 60% आयात के माध्यम से पूरा होता है और उन आयातों का लगभग 90% होर्मुज से होकर आता है। कच्चे तेल के मामले में भारत ने अपने विकल्पों को उल्लेखनीय ढंग से बढ़ाया है, लेकिन फरवरी 2026 तक उसके आयात में मध्य-पूर्व की हिस्सेदारी फिर भी 59% तक थी। युद्ध शुरू होने से पहले ही भारत का तेल और गैस आयात बिल उस स्तर के आसपास मंडरा रहा था, जो एक वर्ष की अवधि में आसानी से 180 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। कतर ने अकेले ही 2024-25 में भारत के एलएनजी आयात के 11.2 मिलियन टन की आपूर्ति की थी, जो कुल का 41% है। जीवाश्म ईंधनों पर भारत की निर्भरता एक जलवायु मुद्दा भर नहीं है, बल्कि सुरक्षा संकट भी है। आयातित हाइड्रोकार्बन हमारी अर्थव्यवस्था को उन क्षेत्रों और समुद्री मार्गों पर आश्रित कर देते हैं, जिन पर उसका सीमित नियंत्रण है। तेल कीमतों में अभूतपूर्व उछाल और गैस आपूर्ति में व्यवधान के साथ ही हमारा आयात-बिल केवल बढ़ेगा और उद्योग, कृषि, परिवहन तथा परिवारों पर दबाव में इजाफा होता रहेगा। गैर-जीवाश्म ईंधन इस समीकरण को बदल देते हैं। एक बार जब सोलर पार्क, पवन ऊर्जा फार्म, जलविद्युत परिसंपत्तियां या परमाणु संयंत्र निर्मित होकर जुड़ जाते हैं, तो वे लंबे समय तक घरेलू बिजली उत्पन्न कर सकते हैं और किसी दूसरे क्षेत्र में घट रही भू-राजनीतिक घटनाओं को लेकर उनका जोखिम कहीं कम होता है। सोलर फोटोवोल्टिक प्रणालियां अब सामान्यतः 25 से 35 वर्षों तक संचालित होती हैं, जबकि विंड टर्बाइन भी आम तौर पर 20 से 25 वर्षों के लिए डिजाइन किए जाते हैं। इसका यह मतलब है कि गैर-जीवाश्म क्षमता एक बार स्थापित हो जाने पर युद्धों, शिपिंग व्यवधानों और समुद्री टकरावों के दौरान भी उत्पादन करती रहती है। आधुनिक ऊर्जा इतिहास में यह पहली बार है, जब इस पैमाने का संकट जीवाश्म ईंधन प्रणाली को मजबूत नहीं कर रहा है, बल्कि उससे दूर जाने की परिस्थितियों को तेज कर रहा है। 1973, 1979 और यहां तक कि 2008 के झटकों ने भी अंततः तेल की केंद्रीयता को ही मजबूत किया था। लेकिन आज दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं। जीवाश्म ईंधनों पर भारत की निर्भरता एक जलवायु मुद्दा भर नहीं है, बल्कि सुरक्षा संकट भी है। आयातित हाइड्रोकार्बन हमारी अर्थव्यवस्था को उन क्षेत्रों और समुद्री मार्गों पर आश्रित कर देते हैं, जिन पर हमारा नियंत्रण नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *