आज सफला एकादशी:  ये है सफलता, शांति और समृद्धि देने वाला व्रत, जानिए पौष कृष्ण एकादशी की पूजा-विधि, कथा और महत्व
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आज सफला एकादशी: ये है सफलता, शांति और समृद्धि देने वाला व्रत, जानिए पौष कृष्ण एकादशी की पूजा-विधि, कथा और महत्व

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6 घंटे पहले

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आज (15 दिसंबर) पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, इसे सफला एकादशी कहा जाता है। जैसा इस व्रत का नाम है, वैसा ही इसका फल है। मान्यता है कि इस एकादशी के व्रत से जीवन के हर काम में सफलता मिलती है। भक्त अधूरे काम पूरे करने, नौकरी-व्यापार में तरक्की पाने, पारिवारिक सुख और मानसिक शांति की कामना से ये व्रत करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता महालक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार, एकादशी व्रत को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों पुरुषार्थ देने वाला माना गया है। इस व्रत से मन शांत होता है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं और जाने-अनजाने में किए गए पापों का फल नष्ट होता है। सोमवार और एकादशी के योग में विष्णु-लक्ष्मी के साथ ही भगवान शिव का भी विशेष अभिषेक करना चाहिए।

सफला एकादशी का महत्व

मान्यता है कि पौष कृष्ण एकादशी हर काम सफल बनाने वाली है। जो लोग लंबे समय से प्रयास कर रहे हैं, लेकिन परिणाम नहीं मिल पा रहा, उनके लिए ये व्रत विशेष फलदायी माना गया है। नौकरी, परीक्षा, व्यापार, विवाह, संतान, स्वास्थ्य, हर क्षेत्र में सफलता की कामना से ये व्रत किया जाता है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में एकादशी व्रत की महिमा बताई गई है। शास्त्रों के अनुसार एक बार भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहा था कि जो भक्त श्रद्धा से एकादशी व्रत करता है, उसके जीवन के विघ्न दूर होते हैं।

एकादशी से जुड़ी परंपराएं

सफला एकादशी पर गंगा, यमुना, नर्मदा, शिप्रा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा है। माना जाता है कि इस दिन किया गया स्नान शरीर के साथ-साथ मन को भी शुद्ध करता है। जो लोग नदी तक नहीं जा पाते, वे घर पर ही स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। इसके बाद साफ वस्त्र पहनकर भगवान की पूजा करनी चाहिए।

सफला एकादशी व्रत की कथा

सफला एकादशी की कथा लुंभक नाम के राजकुमार से जुड़ी है। पुराने समय में राजा महिष्मान नाम के एक राजा थे। उनका पुत्र लुंभक पापी स्वभाव का था। उसके गलत आचरण से दुखी होकर राजा ने उसे राज्य से निकाल दिया। राज्य से निष्कासित होकर लुंभक वन में भटकने लगा। उसके पास खाना भी नहीं था। एक दिन पौष कृष्ण एकादशी के दिन वह भूख और प्यास से व्याकुल होकर जंगल में एक पेड़ के नीचे गिर पड़ा। उसे ये भी पता नहीं था कि वह दिन सफला एकादशी का है। वह पूरे दिन और रात कुछ खा-पी न सका। इस तरह अनजाने में उसका एकादशी व्रत हो गया।

सुबह जब उसे होश आया, तो उसके मन में अद्भुत परिवर्तन हो गया था। क्रोध, हिंसा और नकारात्मकता की जगह शांति और पश्चाताप ने ले ली। अनजाने में किए गए व्रत के प्रभाव से उसके पाप नष्ट हो चुके थे। वह अपने पिता के पास लौटा। राजा ने जब उसके बदले हुए स्वभाव को देखा तो उसे क्षमा कर राज्य सौंप दिया। इसके बाद लुंभक ने जीवनभर भगवान विष्णु की भक्ति की।

सफला एकादशी की पूजा-विधि

  • सफला एकादशी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है। स्नान के बाद माथे पर चंदन का लगाएं। घर में पूजा स्थल को साफ करें। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  • पंचामृत और गंगाजल से भगवान का अभिषेक करें। चंदन, इत्र, तिल, तुलसी दल, धूप-दीप अर्पित करें। फल, मिठाई का नैवेद्य चढ़ाएं। धूप-दीप जलाएं।
  • विष्णु सहस्रनाम और एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें। इसके बाद आरती करें। स्कंद पुराण के अनुसार, तुलसी दल के बिना विष्णु पूजा अधूरी मानी जाती है, इसलिए इस दिन तुलसी का विशेष ध्यान रखें।
  • एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि को किया जाता है। द्वादशी पर जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना, अन्न, वस्त्र और तिल का दान करना विशेष फलदायी है।

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