आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम:  चीन अब ज्यादा जरूरी, पर अमेरिका-विरोध जल्दबाजी
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आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम: चीन अब ज्यादा जरूरी, पर अमेरिका-विरोध जल्दबाजी

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4 घंटे पहले

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आशुतोष वार्ष्णेय ब्राउन यूनिवर्सिटी, अमेरिका में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर - Dainik Bhaskar

आशुतोष वार्ष्णेय ब्राउन यूनिवर्सिटी, अमेरिका में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर

जब मैं यह कॉलम बोस्टन से लिख रहा था, तब अमेरिका के बड़े अखबारों में मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग की तियानजिन बैठक की तस्वीरें प्रमुखता से प्रकाशित हुई थीं। तस्वीरों में तीनों नेता मुस्करा रहे थे और गर्मजोशी से मिल रहे थे। कहा गया कि ट्रम्प की नीतियां इन्हें करीब ला रही हैं और भू-राजनीति में अमेरिका- विरोधी एकता का रास्ता खोल रही हैं।

अमेरिका-विरोधी एकता की बात जल्दबाजी होगी। चीन व भारत के अमेरिका से अहम संबंध हैं, जिन्हें तोड़ना एक बड़ी कीमत पर ही संभव होगा। अमेरिका आज भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। 2024 के अंत तक उसकी जीडीपी 29.18 ट्रिलियन डॉलर थी, जो विश्व अर्थव्यवस्था (111.33 ट्रिलियन) की 26.2% है। इतना बड़ा बाजार नकारा नहीं जा सकता।

लेकिन इसमें शक नहीं कि अमेरिका की शीतयुद्धोत्तर विदेश नीति से बिल्कुल अलग ट्रम्प की नीतियां नए भू-राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य बना रही हैं। देशों को अपनी विदेश नीतियों में बदलाव करते समय इन तब्दीलियों को ध्यान में रखना होगा।

हालांकि, तीन चीजें स्थिर रहेंगी : व्यापार शुल्क का इस्तेमाल, इमिग्रेशन का विरोध और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा में अमेरिकी निवेश घटना। बड़े बदलाव केवल तभी हो सकते हैं, जब इन नीतियों का असर ट्रम्प के समर्थकों के लिए विनाशकारी हों।

ट्रम्प के व्यापार शुल्क से बुरी तरह झटका खाने के बाद भारत को अपने आगे का रास्ता कैसे सोचना चाहिए? मेरा मानना है कि चीन भारत की विदेश नीति में हाल के वर्षों से भी अधिक केंद्रीय भूमिका निभाएगा। लेकिन भारत अपने हितों को चीन के साथ कैसे आगे बढ़ाएगा?

पहली जटिलता यह है कि अब भारत चीन के सामने काफी कमजोर स्थिति से काम करेगा। जब अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ मजबूत किला मानता था- कम से कम इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में- तो अमेरिकी समर्थन ने दिल्ली की ताकत बढ़ाई थी।

अगर हम मान लें कि अगले कुछ साल के लिए इंडो-पैसिफिक में शक्ति- संतुलन का असर नहीं रहेगा, तो भारत चीन से केवल एक अकेली ताकत के रूप में निपटेगा, न कि अमेरिका के समर्थन वाली ताकत के रूप में।

फिर भी, चीन के साथ संबंध बनाने में भारत का हित है। यह आज दुनिया की दूसरी महाशक्ति है, जो आर्थिक और रणनीतिक शक्ति दोनों रखती है। अगर भारत की अर्थव्यवस्था पिछले तीस साल में सालाना 8-9% की दर से बढ़ती, तो यह कुछ हद तक चीन के बराबर हो सकता था। भारत की आर्थिक वृद्धि 1991 के बाद बढ़ी, लेकिन यह चीन के स्तर तक नहीं पहुंची।

कहा जाता है कि भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन यह भारत और चीन के बीच के अंतर के बारे में कुछ नहीं बताता। 2024 के अंत तक भारत की जीडीपी 3.9 ट्रिलियन डॉलर थी (हाल ही में यह 4 ट्रिलियन को पार कर गई)।

यह यूके (3.6 ट्रिलियन) और फ्रांस (3.2 ट्रिलियन) से अधिक है, लेकिन यह चीन की जीडीपी (18.7 ट्रिलियन) का लगभग पांचवां हिस्सा था। कुल अर्थव्यवस्था का आकार देखें, तो जर्मनी (4.7 ट्रिलियन) और जापान (4 ट्रिलियन) भी उस समय चीन से काफी पीछे थे।

यह अंतर भारत के लिए गंभीर नतीजे रखता है। ट्रम्प के टैरिफ के बाद अमेरिकी बाजारों में लगभग 65-70% भारतीय निर्यात के खरीदार खो गए हैं। बाजार विविधीकरण रणनीति जरूरी है। दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में अवसर तलाशना भी समझदारी होगी।

जहां भारत दुनिया की अर्थव्यवस्था का केवल 3.5% है, चीन का आंकड़ा 16.8% है। चीन का भारत के मुकाबले व्यापार में ज्यादा फायदा है। अमेरिकी बाजारों के कम होने के कारण भारत को इस घाटे को कम करने के लिए चीनी बाजारों की तलाश करनी होगी।

चाइना प्लस वन रणनीति का मूल विचार यह था कि अमेरिका-चीन तनाव से बचने के लिए अमेरिकी निवेशक धीरे-धीरे चीन से बाहर आएंगे और वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड और भारत में निवेश करेंगे। एपल ने भारत को चुना, जबकि कई अन्य कंपनियों ने वियतनाम में निवेश किया।

एपल का भारत से निर्यात फिलहाल अमेरिकी टैरिफ से बच गया है, लेकिन अन्य निवेशकों के लिए ऐसा जरूरी नहीं है। इसलिए, भारत में अमेरिकी निवेश लगभग निश्चित रूप से घटेगा। चीन इस अंतर को पाट सकता है। एक और गैर-अमेरिकी बाजार है, जो चीन के बराबर है।

अगर ईयू को एक आर्थिक इकाई के रूप में देखें, तो इसकी जीडीपी 19.4 ट्रिलियन है। लेकिन भारत का चीन से सुरक्षा संबंध कठिन है। आर्थिक संबंध के तर्क से सुरक्षा तर्क कैसे प्रभावित होंगे, इस प्रश्न का समाधान करना चीन नीति के लिए बड़ी चुनौती होगी।

अमेरिका-विरोधी एकता की बात जल्दबाजी होगी। चीन व भारत के अमेरिका से अहम संबंध हैं, जिन्हें तोड़ना बड़ी कीमत पर ही संभव होगा। अमेरिका आज भी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इतने बड़े बाजार को नकारा नहीं जा सकता। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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