आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम:  आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम- ईरान अभी तक युद्ध क्यों नहीं हारा?
टिपण्णी

आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम: आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम- ईरान अभी तक युद्ध क्यों नहीं हारा?

Spread the love




ईरान युद्ध एक महीना पूरा कर चुका है। कइयों के द्वारा उम्मीद की जा रही थी कि ईरान अमेरिका और इजराइल की संयुक्त सैन्य ताकत का सामना नहीं कर पाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। ईरान ने युद्ध जीता नहीं है, लेकिन वह हारा भी नहीं है और यह भी संभव है कि वह हारे भी न। ईरान की मजबूती की वजह क्या है? इसके चार कारण हो सकते हैं। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी पहला कारण है। तेल बाजार में 150 डॉलर प्रति बैरल का खतरा मंडरा रहा है। अब तक सबसे ज्यादा कीमत 147.50 डॉलर प्रति बैरल रही है, जो जून 2008 में देखी गई थी। अगर कीमत फिर इतनी बढ़ती है, तो दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ेगा। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यापारिक जहाजों को रोकने की क्षमता ईरान को बहुत बड़ी ताकत देती है। दुनिया के तेल व्यापार का 20% और भारत का लगभग आधा तेल आयात होर्मुज से होकर गुजरता है। दुनिया के लगभग 20% प्राकृतिक गैस निर्यात भी यहीं से जाते हैं। भारत के लिए यह आंकड़े और महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि भारत के द्वारा आयात की गई एलएनजी का 60% और एलपीजी का लगभग 85-90% होर्मुज से आता है। इसका असर सिर्फ एशिया पर नहीं पड़ता। अमेरिका में लोग पश्चिमी यूरोप के लोगों की तुलना में लगभग दोगुनी दूरी तक गाड़ी चलाते हैं, इसलिए तेल की कीमतें वहां के घरों के बजट पर बड़ा असर डालती हैं। कुछ ही महीनों में मिड-टर्म चुनाव होने वाले हैं। ज्यादा तेल कीमतों का जोखिम कोई भी अमेरिकी सरकार नहीं लेना चाहती। यही कारण है कि अमेरिका ने अस्थायी रूप से रूसी तेल पर लगे प्रतिबंध हटाए हैं और सबसे विरोधाभासी बात यह कि ईरानी तेल पर भी राहत दी है। ईरान की मजबूती का दूसरा कारण हथियार हैं। ड्रोन ने आधुनिक युद्ध की प्रकृति बदल दी है। रूस-यूक्रेन युद्ध इस बदलाव का पहला उदाहरण था। ड्रोन पर निर्भर होकर यूक्रेन रूस जैसी बड़ी सेना का सामना कर सका, और चार साल बाद भी वह हारा नहीं है। ईरान भी कुछ ऐसा ही दिखा रहा है। ड्रोन ‘कमजोरों के हथियार’ हैं। एक ड्रोन की कीमत लगभग 15,000 से 30,000 डॉलर के बीच होती है। इसके मुकाबले, उन्हें रोकने वाली मिसाइल की कीमत 20 लाख से 40 लाख डॉलर तक होती है। मिसाइल का उत्पादन उसके आकार और दिखने की वजह से आसानी से रोका जा सकता है, लेकिन ड्रोन का उत्पादन आसानी से छिपाकर जारी रखा जा सकता है। ड्रोन का इस्तेमाल करके ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के देशों को निशाना बनाया है। अगर हमले बढ़ते हैं, तो एनर्जी की कीमतें और बढ़ेंगी। ड्रोन ‘दुबई की छवि’ को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिसने अरब दुनिया में एक नया रास्ता दिखाया है। वहां प्रवासियों को जगह मिली है, सामाजिक समावेश और शांति को बढ़ावा मिला है, जिससे दुनिया भर के निवेशक और कारोबारी आकर्षित हुए हैं। तीसरा कारण एक क्रांतिकारी शासन की संगठनात्मक व्यवस्था से जुड़ा है। 1980 के दशक में राजनीतिक वैज्ञानिक जीन किर्कपैट्रिक- जो अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की करीबी सलाहकार थीं- ने तानाशाही और सर्वसत्तावादी व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर बताया था। उन्होंने कहा कि तानाशाही व्यवस्था सिर्फ राजनीतिक जीवन को नियंत्रित करती है, जबकि सर्वसत्तावादी व्यवस्था राजनीति और समाज दोनों को नियंत्रित करती है और नागरिकों के जीवन के हर क्षेत्र में विरोध को दबा देती है। उन्होंने मिस्र और पाकिस्तान को तानाशाही व्यवस्था कहा, वहीं क्यूबा और सोवियत संघ जैसे देशों को सर्वसत्तावादी व्यवस्था बताया। 1979 में ईरान में धार्मिक क्रांति हुई और तब से वहां ऐसी ही एक सर्वसत्तावादी व्यवस्था है। समाज पर नियंत्रण और विरोध को दबाने के लिए दो तरह के संगठन बनाए गए : नागरिक और सैन्य। नागरिक संगठन विश्वविद्यालयों, मस्जिदों और बाजारों तक पहुंचे और सरकार के समर्थन वाले विचार फैलाए। सैन्य संगठनों में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स शामिल हैं, जो सीधे सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करता है। यह नियमित सेना से अलग है और इसमें लगभग 1,50,000 से 1,90,000 सैनिक हैं। इसका मुख्य काम क्रांति की रक्षा करना है। इसके सैन्य हिस्से देश के सभी राज्यों के शहरों और कस्बों में फैले हैं। इसके अलावा, 5 लाख से ज्यादा स्वयंसेवकों को जोड़कर बनाया गया बसीज, आईआरजीसी का अर्धसैनिक (पैरामिलिट्री) हिस्सा है। यह विरोध को कठोर तरीके से दबाने के लिए जाना जाता है। धार्मिक व्यवस्था से जुड़े इस बड़े क्रांतिकारी संगठन ने दो चीजें सुनिश्चित करने की कोशिश की है। पहला, अगर मौजूदा नेता मारे जाते हैं, तो नए नेता सामने आकर व्यवस्था संभाल लेंगे। दूसरा, अगर सरकार के खिलाफ आंदोलन उठते हैं, तो उन्हें दबा दिया जाएगा। व्यवस्था खुद कमजोर नहीं पड़ेगी। इस युद्ध में शासन बदलने की कोशिश ईरान की इस बहुत मजबूत संगठनात्मक व्यवस्था के कारण कमजोर पड़ती दिख रही है। ईरान के अभी तक नहीं हारने का चौथा कारण शिया मत के खास चरित्र से जुड़ा है, जो ईरान का आधिकारिक धर्म है। धार्मिक विद्वानों और जानकारों के बीच यह अच्छी तरह जाना जाता है कि शहादत शिया मत का एक बुनियादी विचार है। शिया मत के संस्थापक अली और उनके बेटे हुसैन, दोनों शहीद हुए थे। कर्बला की लड़ाई शिया इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है, जो समुदाय की सामूहिक यादों में दर्ज है। 680 ईस्वी में, उमय्यद खलीफा यजीद की बड़ी सेना ने हुसैन को घेरकर हमला किया था। कर्बला में हुसैन ने अपने भाइयों और बच्चों सहित अपने कई साथियों के साथ शहादत स्वीकार की, लेकिन अन्यायपूर्ण शासक के प्रति वफादारी की कसम खाने से इनकार कर दिया। मुहर्रम के महीने में बड़े जुलूस और मर्सिये शहादत की भावना को याद करते हैं। लखनऊ में मैंने बड़े जमावड़ों में मर्सिये पढ़े जाते देखे हैं। हर साल कर्बला की लड़ाई को लोगों की भागीदारी के साथ दोबारा याद किया जाता है, जिससे यह एक जीवित परम्परा बन गई है। इसके कारण शहादत की भावना लाखों शियाओं के मन में गहराई से बस गई है। शिया समाज में कष्ट सहने की क्षमता अधिक होती है। ऐसे में उनके नेताओं की हत्या और भारी बमबारी जरूरी नहीं कि हार और आत्मसमर्पण करवा दे। सही हो या गलत, यह तो स्पष्ट है कि ईरान वेनेजुएला नहीं है। ईरान की संगठनात्मक व्यवस्था बहुत मजबूत है…
अगर मौजूदा नेता मारे जाते हैं, तो नए नेता सामने आकर व्यवस्था संभाल लेंगे। अगर सरकार के खिलाफ आंदोलन उठते हैं, तो उन्हें दबा दिया जाएगा। इस युद्ध में शासन बदलने की कोशिशें ईरान की मजबूत संगठनात्मक व्यवस्था के कारण कमजोर पड़ती दिख रही हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *