नई दिल्ली4 घंटे पहले
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सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने मंगलवार को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा से जुड़े मामले पर सुनवाई शुरू की। कोर्ट तय करेगा कि सरकारी विभाग, अस्पताल, स्कूल और NGO जैसी संस्थाएं ‘उद्योग’ की कैटेगरी में आएंगी या नहीं और उन पर श्रम कानून लागू होंगे या नहीं।
मंगलवार को मामले की सुनवाई शुरू हुई। सुनवाई के दौरान पक्षकारों ने 1978 के बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा फैसले में दी गई ‘उद्योग’ की परिभाषा पर शुरुआती दलीलें रखीं। सुनवाई 18 मार्च को खत्म हो जाएगी।
बेंच ने इस बात पर विचार शुरू किया कि क्या उस फैसले में दी गई व्यापक परिभाषा सही है या उसके दायरे को सीमित करने की जरूरत है। मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।
9 जजों की बेंच सुन रही मामला
बेंच की अध्यक्षता CJI सूर्यकांत कर रहे है। बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 16 फरवरी को तय किया था कि ‘उद्योग’ की परिभाषा, सरकारी संस्थाओं की स्थिति, NGO और चैरिटी संस्थाओं की भूमिका तथा 1978 के पुराने फैसले की समीक्षा जैसे मुद्दों पर यह बड़ी बेंच सुनवाई करेगी।
इस मामले के फैसले से यह तय होगा कि किन-किन संस्थाओं पर श्रम कानून लागू होंगे। इससे कर्मचारियों के अधिकार जैसे छंटनी, वेतन, यूनियन बनाने का अधिकार और सेवा शर्तों पर भी असर पड़ सकता है।
उद्योग शब्द पर विवाद क्यों…
1978 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने ‘बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड’ मामले (1978) में उद्योग की विस्तृत परिभाषा दी थी। फैसले के पैराग्राफ 140 से 144 में कहा गया था कि जहां नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध है और कोई सेवा/काम होता है, वह उद्योग हो सकता है। इस परिभाषा की वजह से सरकारी विभाग, अस्पताल, स्कूल, NGO भी उद्योग माने जाने लगे और उन पर लेबर कानून लागू हो गए।
मई 2005 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(j) में उद्योग शब्द की परिभाषा की व्याख्या से जुड़े इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया था। बेंच ने कहा था कि बड़ी बेंच को सभी कानूनी सवालों के हर पहलू और गहराई पर विचार करना होगा।
इसके बाद 2017 में तत्कालीन CJI टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बेंच ने कहा था कि उसकी राय में, उसके सामने आई अपीलों को नौ जजों की बेंच के सामने रखा जाना चाहिए, क्योंकि इस मुद्दे के गंभीर और दूरगामी असर हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट इन मुद्दों पर देगा फैसला…
- उद्योग की सही परिभाषा क्या हो: क्या हर तरह की संगठित गतिविधि को उद्योग माना जाए। या परिभाषा को सीमित किया जाए।
- क्या सरकारी विभाग भी उद्योग हैं: क्या सरकार के विभाग जैसे नगरपालिका, अस्पताल, शिक्षा संस्थान) भी उद्योग माने जाएंगे, या इन्हें अलग रखा जाए।
- गैर-लाभकारी संस्थाएं NGO उद्योग हैं या नहीं: क्या NGO, चैरिटी, ट्रस्ट जैसी संस्थाएं उद्योग की कैटेगरी में आएंगी।
- श्रमिक-नियोक्ता संबंध: क्या केवल वही जगह उद्योग होगी जहां साफ तौर पर नियोक्ता-कर्मचारी में संबंध हो, या विस्तृत परिभाषा लागू होगी।
- सॉवरेन फंक्शन का दायरा: सरकार के कौन-कौन से काम जैसे पुलिस, रक्षा उद्योग से बाहर रहेंगे।
- 1978 के फैसले की समीक्षा: क्या 1978 में बेंगलुरु वाटर सप्लाई केस की व्यापक परिभाषा सही है, या उसे संबदला जाए, या उसका दायरा छोटा किया जाए।









