3 दिन पहले
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माघ महीने की गुप्त नवरात्रि आज (19 जनवरी) से शुरू हो गई है। देवी सती की दस महाविद्याओं की साधना का उत्सव 27 जनवरी तक चलेगा। यह समय साधना, ध्यान और मन की शुद्धि के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। गुप्त नवरात्रि आम नवरात्रि से अलग होती है और इसमें पूजा-पाठ के साथ-साथ ध्यान और साधना पर ज्यादा जोर दिया जाता है।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, साल में चार नवरात्रियां आती हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्रि को प्रकट नवरात्रि कहते हैं। इन नवरात्रियों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है, व्रत रखते हैं और इन्हें एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। जबकि, माघ और आषाढ़ महीने की नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहते हैं। गुप्त नवरात्रि खासतौर पर तंत्र-मंत्र से जुड़े साधकों के लिए होती है, इन दिनों में तंत्र साधना और आत्मिक शक्ति को जाग्रत करने के लिए तप किया जाता है।
गुप्त नवरात्रि की पूजा में माता की मूर्ति या चित्र पर फूलों की माला और नींबुओं की माला चढ़ाई जाती है। साथ ही देवी को इत्र अर्पित किया जाता है और पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है। माघ महीने की गुप्त नवरात्रि में की जाने वाली साधना गुप्त रखनी चाहिए। दस महाविद्याएं मां सती के ही दस अलग-अलग रूप हैं।
दस महाविद्याएं इस प्रकार हैं-
काली: समय और मृत्यु की देवी मानी जाती हैं।
तारा: करुणा और ज्ञान की देवी हैं।
त्रिपुर सुंदरी: प्रेम, सुंदरता और आध्यात्म की देवी हैं।
भुवनेश्वरी: पूरे संसार की अधिष्ठात्री देवी हैं।
छिन्नमस्ता: त्याग और बलिदान का प्रतीक हैं।
भैरवी: तपस्या और कठिन साधना की देवी हैं।
धूमावती: त्याग, वैराग्य और जीवन के कठोर सत्य की देवी हैं।
बगलामुखी: शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों पर विजय दिलाने वाली देवी हैं।
मातंगी: विद्या, कला और संगीत की देवी मानी जाती हैं।
कमला: धन, सुख और समृद्धि की देवी हैं।
दस महाविद्याओं से जुड़ी कथा
पौराणिक कथा के अनुसार देवी सती के पिता प्रजापति दक्ष भगवान शिव को पसंद नहीं करते थे और अक्सर उनका अपमान किया करते थे। एक बार दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ आयोजित किया। इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों को बुलाया, लेकिन जानबूझकर भगवान शिव और देवी सती को आमंत्रण नहीं दिया।
जब देवी सती को इस यज्ञ के बारे में पता चला तो वे अपने पिता के यहां जाने के लिए तैयार हो गईं। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि बिना बुलाए किसी के घर या आयोजन में नहीं जाना चाहिए। इस पर देवी सती ने कहा कि पिता के घर जाने के लिए किसी निमंत्रण की जरूरत नहीं होती। शिव जी ने फिर भी उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन देवी सती को क्रोध आ गया।
देवी सती के इसी क्रोध से दस महाविद्याएं प्रकट हुईं। इसके बाद देवी सती शिव जी की बात माने बिना यज्ञ स्थल पहुंच गईं। वहां प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव के लिए अपमानजनक शब्द कहे। शिव जी के अपमान से देवी सती बहुत आहत हुईं और अंत में उन्होंने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। गुप्त नवरात्रि में देवी सती की इन्हीं दस महाविद्याओं की कृपा पाने के लिए साधना की जाती है।
ऐसे कर सकते हैं देवी दुर्गा की पूजा
गुप्त नवरात्रि में आम लोगों को देवी दुर्गा के स्वरूपों की पूजा करनी चाहिए।
देवी मां की सामान्य पूजा के लिए स्नान के बाद घर के मंदिर में सबसे पहले गणेश पूजा करें। गणेश जी को स्नान कराएं। हार-फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें, भोग लगाएं। धूप-दीप जलाकर आरती करें।
गणेश पूजा के बाद देवी पूजा का संकल्प लें। देवी दुर्गा की मूर्ति का जल से अभिषेक करें। पहले जल से, फिर पंचामृत से और फिर जल से अभिषेक करें।
स्नान के बाद देवी मां को लाल चुनरी भेंट करें। आभूषण, हार-फूल से श्रृंगार करें। सुहाग का सामान अर्पित करें। इत्र अर्पित करें। कुमकुम से तिलक लगाएं।
चावल, नारियल और अन्य पूजन सामग्री भेंट करें। मिठाई का भोग लगाएं। धूप-दीप जलाएं, आरती करें। परिक्रमा करें।
माता दुर्गा की पूजा में दुं दुर्गायै नमः’ मंत्र का जप करना चाहिए।
पूजा के अंत में हुई गलतियों की क्षमा मांगे। खुद भी ग्रहण करें। छोटी कन्याओं को भोजन कराएं और दान करें।








