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ट्रम्प द्वारा पेरिस जलवायु समझौते से हटने का निर्णय अब औपचारिक रूप से प्रभावी हो चुका है। इसी महीने उन्होंने यह घोषणा भी की थी कि अमेरिका 66 अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों से भी बाहर निकलेगा। इनमें यूएन की 31 संस्थाएं और 35 गैर-यूएन संगठन हैं। इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि किसी राष्ट्रीय नेता ने मात्र एक महीने के भीतर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इतने व्यापक रूप से संबंध तोड़ लिए हों। न ही किसी नेता ने इतनी स्पष्टता से पहले कभी ये कहा था कि मुझे अंतरराष्ट्रीय कानूनों की जरूरत नहीं है। न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में ट्रम्प ने ऐसा ही कहा है। उन्होंने यह भी कहा कि वे स्वयं तय करेंगे कि अमेरिका पर नियम-कायदे कब लागू होंगे। अमेरिका की क्रूर नीतियों के कारण पहले ही नुकसान होने लगा है। पिछले एक वर्ष में ट्रम्प प्रशासन ने वैश्विक मानवीय सहायता और स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए दी जाने वाली धनराशि में भारी कटौती की है, जिसके परिणामस्वरूप- सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट के अनुसार- प्रति वर्ष लगभग दस लाख अतिरिक्त मौतें होने की आशंका है। बार्सीलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ और अन्य संगठनों के एक अध्ययन में पाया गया है कि अमेरिका और यूरोप द्वारा सहायता में की गई कटौतियां मिलकर 2030 तक विकासशील देशों में 2.26 करोड़ अतिरिक्त मौतों का कारण बन सकती हैं- जिनमें पांच वर्ष से कम आयु के 54 लाख बच्चे शामिल हैं। हालिया घटनाक्रम संकेत देते हैं कि अंतरराष्ट्रीय सहायता में और कटौतियां की जाएंगी। ट्रम्प के बारे में यह तो हम पहले से जानते थे कि उनका प्रशासन यूनेस्को, विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी, निकट पूर्व में फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी और संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष जैसे वैश्विक संस्थानों को निशाना बनाएगा। लेकिन अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका जलवायु परिवर्तन पर समझौते तक पहुंचने के फ्रैमवर्क को छोड़ने वाला भी पहला देश बन जाएगा। ट्रम्प के नए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का कार्यक्षेत्र भी दूरगामी प्रभाव डालेगा। यूएन की शांति की स्थापना की कोशिशों के विकल्प के रूप में इसे खड़ा करने का प्रयास एक बड़े बदलाव को दर्शाता है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के प्रति प्रतिबद्ध विधि आयोग, यूरोप परिषद का वेनिस आयोग, लोकतंत्र और निर्वाचन सहायता संस्थान, न्याय और विधि के शासन का संस्थान जैसी एजेंसियों पर प्रहार भविष्य की अमेरिकी कार्रवाइयों की वैधता के लिए अशुभ संकेत है। इसके लिए ट्रम्प प्रशासन की यह दलील भी बेबुनियाद प्रतीत होती है कि इन कदमों का उद्देश्य खर्च में कटौती करना और वोक एजेंडा का मुकाबला करना है। महिलाओं की समानता और लड़कियों के अधिकारों की रक्षा करने वाली एजेंसियों से बाहर निकलने का क्या अर्थ है? यूएन वुमन जैसी एजेंसी को अनावश्यक और फिजूलखर्च कैसे माना जा सकता है, जबकि उसने 80 से अधिक देशों की जेंडर-संवेदनशील बजट तैयार करने में मदद की है? उसकी सहयोगी एजेंसी यूएनएफपीए मातृ स्वास्थ्य का समर्थन करती है। एजुकेशन कान्ट वेट (जिसकी मैं पहले अध्यक्षता कर चुका हूं) लाखों शरणार्थी और विस्थापित बच्चों को शिक्षा तक पहुंच प्रदान करता है। यदि इस तरह के संगठनों को पर्याप्त वित्तपोषण नहीं मिला, तो दुनिया की सबसे असुरक्षित महिलाओं और लड़कियों पर हिंसा और मातृ मृत्यु का खतरा और बढ़ जाएगा। ट्रम्प प्रशासन को गलतफहमी है कि अमेरिकी नागरिक भी अंतरराष्ट्रीय संगठनों को खत्म करने की उनकी नीतियों का समर्थन करते हैं। इसके उलट हकीकत यह है कि बहुसंख्य अमेरिकी चाहते हैं कि दुनिया के देश साझा समस्याओं से निपटने के लिए मिलकर काम करें। हाल ही में 34 देशों में किए गए एक जनमत सर्वेक्षण में 90 प्रतिशत से अधिक उत्तरदाताओं ने कहा था कि वैश्विक स्वास्थ्य, मानवाधिकारों की रक्षा और संघर्षों की रोकथाम के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य है। विश्व स्वास्थ्य संगठन पर वैश्विक स्तर पर 60 प्रतिशत भरोसा जताया गया। संयुक्त राष्ट्र पर भी 58 प्रतिशत उत्तरदाताओं का विश्वास कायम था। अमेरिका इस सबको नजरअंदाज नहीं कर सकता। ट्रम्प प्रशासन को गलतफहमी है कि अमेरिकी नागरिक भी अंतरराष्ट्रीय संगठनों को खत्म करने की उनकी नीतियों का समर्थन करते हैं। जबकि बहुसंख्य अमेरिकी चाहते हैं कि दुनिया के देश मिलकर काम करें।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)
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