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- Justice Aniruddha Bose’s Column Our Judicial System Remains The Guardian Of The Rights Of Citizens
कुछ ही क्षण पहले
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जस्टिस अनिरुध्द बोस सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश
क्या सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति को निर्देश दे सकता है कि वो किसी राज्य के कानून को एक तय समयसीमा में मंजूरी दे? कुछ अभिव्यक्तियों को गैरकानूनी ठहराने वाली भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 हमारे संविधान के साथ कितनी सुसंगत है? क्या पूजास्थलों का जो स्टेटस 15 अगस्त, 1947 को था, उसे बहाल रखने का कानून वैधानिक है? देश के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लम्बित ऐसे कुछ महत्वपूर्ण मसलों का फैसला निकट भविष्य में होने वाला है।
90 के दशक से संवैधानिक अदालतें देश के ढांचे में परिधि से केंद्र की ओर से खिसक रही हैं। उपरोक्त मामलों में उठाए जटिल प्रश्नों पर अदालती निर्देश न सिर्फ राज्य के विभिन्न अंगों के विशेष क्षेत्राधिकार को परिभाषित करेंगे, बल्कि इनका सीधा असर अब लोगों की रोजमर्रा के जीवन पर भी पड़ने लगा है।
मसलन, दिल्ली में आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ताजा निर्णय लें या ‘वैवाहिक दुष्कर्म’ का मामला- जो भारतीय परिवारों में अधिकारों और दायित्वों को लेकर हमारी समझ को नए सिरे से निर्धारित कर सकता है।
शुरुआती कुछ दशकों में दीवानी और फौजदारी मामलों की सुनवाई छोड़ दें तो देश के न्यायाधीश एक तरफ तो यह तय करने में व्यस्त थे कि कानूनी नजरिए से स्वतंत्रता का दायरा कहां तक सीमित हो सकता है, दूसरी ओर वे आजाद भारत में सम्पत्ति के अधिकार भी तय कर रहे थे। सम्पत्ति अधिकार का मामला तो मोटे तौर पर केशवानंद भारती मामले में तय हो गया, लेकिन स्वतंत्रता पर अंकुश की संवैधानिकता को लेकर अदालतों और उनके बाहर अब भी बहस जारी है।
मुकदमों की पेंडेंसी ऐसा मसला है, जिसका समाधान नीति निर्माताओं को करना होगा। 2025 की शुरुआत में भारत के विभिन्न न्यायालयों- जिनमें 21 हजार जज हैं- के समक्ष लम्बित मुकदमों की संख्या 4.5 करोड़ से अधिक थी। इनमें से 3.5 करोड़ आपराधिक मामले हैं। लेकिन महज इन आंकड़ों के आधार पर ही न्यायालयों की दक्षता को आंकना सरलीकरण करना होगा।
यदि हम एक मामले के निपटारे का औसत समय 3 वर्ष मानें तो इन 4.5 करोड़ मामलों में से 2.75 करोड़ अभी 3 वर्ष पुराने नहीं हुए हैं। पिछले साल दर्ज 2.46 करोड़ मामलों में से 2.35 करोड़ का निपटारा हो चुका है।
बीते दो दशकों में तो मामलों के जल्द निपटारे पर खासा जोर दिया गया है। लम्बित मुकदमों को कम करने का दूसरा तरीका वैकल्पिक विवाद समाधान प्रक्रिया अपनाना है। कई ऐसे विवाद होते हैं, जिन्हें अनौपचारिक तरीके से सुलझाया जा सकता है।
साधारण विवादों को हल करने में मध्यस्थता को खासा प्रोत्साहित किया भी गया है। लेकिन हाल-फिलहाल में मुख्य रूप से सिर्फ व्यावसायिक विवाद ही मध्यस्थता में जाते हैं। लोक अदालतों में भी कई मामले निपटाए जा रहे हैं।
हालांकि, एक प्रभावी न्यायिक प्रणाली की उपलब्धियों को महज आंकड़ों से नहीं आंका जा सकता। वर्षों से भारतीय न्यायाधीशों ने निर्णय की गुणवत्ता और उनकी तर्कशीलता पर जोर दिया है। हमारी न्यायपालिका सामान्य विधि न्यायशास्त्र में नई अवधारणाएं भी लाई है।
‘जनहित याचिका’ हमारे न्यायशास्त्र के दुनिया को मौलिक योगदानों में से एक है। हमारे सुप्रीम कोर्ट ने अनुचित प्रावधानों वाले किसी कानून को अमान्य करने के लिए ‘मैनिफेस्ट आर्बिट्रेरिनेस’ सिद्धांत भी विकसित किया, जो न्यायिक समीक्षा के दायरे को और बढ़ाता है।
न्याय तंत्र का कामकाज भी और अधिक पारदर्शी होता जा रहा है और यह केवल लाइव स्ट्रीमिंग की विजुअल-पारदर्शिता तक ही सीमित नहीं है। रोजाना के कामकाज का डेटा नियमित प्रकाशित होता है। राज्य के अंगों में यही एक अंग जनता के विचारों और जांच-पड़ताल के लिए सबसे ज्यादा खुला है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी परिवादियों को सुविधा हुई है। मुकदमों की ई-फाइलिंग संभव है। गवाह भी अदालत में आने के बजाय विभिन्न स्थानों से बयान दे सकते हैं।
राजनीतिक परिदृश्य में कुछ बहसें जारी हैं, जैसे विधायिका-कार्यपालिका के कार्यों की न्यायिक समीक्षा और उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली। जनता ने राज्य के विभिन्न अंगों के लिए सीमाओं से परे जाकर काम किया और मौजूदा समस्याओं के मौलिक समाधान दिए।
ये इसलिए टिक पाए, क्योंकि वे उस समय की जरूरतों के अनुरूप थे। आज इस पर सभी सहमत होंगे कि सीमाओं के बावजूद भारत के न्यायाधीश संवैधानिक मूल्यों व नागरिक अधिकारों के सबसे भरोसेमंद संरक्षक बने हुए हैं।
मामलों के जल्द निपटारे पर जोर दिया गया है और कामकाज अधिक पारदर्शी होता जा रहा है। इस पर सभी सहमत होंगे कि सीमाओं के बावजूद भारत के न्यायाधीश संवैधानिक मूल्यों व नागरिक अधिकारों के संरक्षक बने हुए हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








