जोसेफ स्टिगलिट्ज का कॉलम:  असमानता की ‘महामारी’ हमारी चुनौतियां बढ़ाती है
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जोसेफ स्टिगलिट्ज का कॉलम: असमानता की ‘महामारी’ हमारी चुनौतियां बढ़ाती है

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12 घंटे पहले

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जोसेफ स्टिगलिट्ज अर्थशास्त्र के नोबेल विजेता - Dainik Bhaskar

जोसेफ स्टिगलिट्ज अर्थशास्त्र के नोबेल विजेता

रोगों से लड़ने का विज्ञान मनुष्यता के इतिहास में कभी भी इतना सशक्त नहीं रहा था, जितना कि आज है। हमारे पास महामारियों का तत्काल पता लगाने, कुछ ही दिनों में रोगाणुओं की सीक्वेंसिंग करने और महीनों के भीतर नई वैक्सीनें विकसित कर लेने के साधन हैं। फिर भी हमने कोविड-19 की त्रासदी का सामना किया।

1 जनवरी 2020 से 31 दिसंबर 2021 के बीच यह महामारी अनुमानित रूप से 1.82 करोड़ लोगों की मौत का कारण बनी। वहीं अरबों लोगों पर इसकी आर्थिक मार पड़ी। सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों ने पहले ही महामारी के प्रति चेतावनी दे दी थी और बराक ओबामा ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में महामारी-तत्परता कार्यालय भी स्थापित कर दिया था। किंतु उनके बाद राष्ट्रपति बनने वाले ट्रम्प ने उसे समाप्त कर दिया ​था।

एक बार फिर, सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी चेतावनी दे रहे हैं कि अगली महामारी को लेकर इकलौता सवाल यही है कि यह कब फैलेगी, यह नहीं कि यह फैलेगी या नहीं। लेकिन दुनिया इससे आंखें मूंदे हुए है। ग्लोबल काउंसिल ऑन इनइक्वैलिटी, एड्स एंड पैंडेमिक ने हाल ही में इस खतरे पर एक रिपोर्ट जारी की, जो जोहान्सबर्ग में स्वास्थ्य मंत्रियों की जी20 बैठक के साथ जारी की गई।

कोविड-19, एड्स, इबोला और एमपॉक्स के साक्ष्यों का उपयोग करते हुए रिपोर्ट बताती है कि असमानता और उससे जुड़ी समस्याएं महामारियों के अंदेशे को और बढ़ाती हैं और उनके प्रभावों को गहरा करती हैं। वहीं महामारियां भी विषमता में अपना योगदान देती हैं और खासतौर पर निम्न-आय वर्गों पर विनाशकारी प्रभाव डालती हैं।

कोविड के मामले में, कम वेतन वाले अग्रिम पंक्ति के कर्मियों ने कहीं अधिक कष्ट झेला। उनमें बीमारी और अस्पताल में भर्ती होने की दर अधिक रही, क्योंकि वे जूम-बैठकों के सहारे घर में नहीं रह सकते थे। और जब वे बीमार पड़े, तो उनके पास अपनी बचत खत्म कर देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

महामारियों का सवाल केवल मेडिकल प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं होता। हमें इनके सामाजिक-आर्थिक फैक्टर्स पर भी नजर डालनी होगी। भीड़भाड़ वाली परिस्थितियां, फ्रंटलाइन के व्यवसाय और गरीबी महामारी के प्रसार में योगदान करते हैं। कुपोषण और बुनियादी स्वास्थ्य स्थितियां भी।

यही कारण है कि सार्वभौमिक हेल्थकेयर प्रणाली वाले देशों ने कोविड-19 संकट के दौरान उन देशों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया, जहां ऐसी व्यवस्था नहीं थी। ऐसी प्रणालियों के अभाव में आर्थिक विषमता, स्वास्थ्यगत विषमता में परिवर्तित हो जाती है।

कोविड-19 ने हमें यह भी बताया था कि जब दुनिया के किसी भी क्षेत्र को टीकों, उपचारों और सुरक्षात्मक उपकरणों तक पहुंच नहीं मिलती, तो बीमारी फैलती और म्यूटेट होती है, जिससे सभी के लिए नए खतरे उत्पन्न होते हैं।

विकसित अर्थव्यवस्थाओं द्वारा अपनाया गया ‘मी-फर्स्ट’ वाला सिद्धांत न केवल नैतिक रूप से घृणित था; बल्कि वह खुद उनके लिए नुकसानदेह सिद्ध हुआ था। महामारी के चरम पर अफ्रीका में निर्मित टीके भी यूरोप और अमेरिका भेज दिए गए थे, जबकि खुद अफ्रीकी आबादी उनसे वंचित रह गई थी।

कोविड के दौरान, समृद्ध देशों ने संकट से निपटने के लिए अपनी विशालकाय जीडीपी का 8% व्यय किया था, जबकि निम्न-आय वाले देशों ने मात्र 2%। और अब, विकासशील देश 31 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं, जो कि दो दशकों से अधिक समय में सर्वाधिक स्तर है।

अनेक निम्न-आय वाले देशों के पास एड्स जैसी वर्तमान महामारियों से निपटने के लिए भी संसाधन नहीं हैं, अगली महामारी की तैयारी तो दूर की बात है। यह स्पष्ट करता है कि किस प्रकार महामारियां देशों के बीच असमानता को भी गहरा कर सकती हैं।

सार्वभौमिक हेल्थकेयर प्रणाली वाले देशों ने कोविड-19 संकट के दौरान उन देशों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया, जहां ऐसी व्यवस्था नहीं थी। ऐसी प्रणालियों के अभाव में आर्थिक विषमता, स्वास्थ्यगत विषमता में परिवर्तित हो जाती है। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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