डेरेक ओ ब्रायन का कॉलम:  हम कई तरह के संवैधानिक मानकों से दूर भटक आए हैं
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डेरेक ओ ब्रायन का कॉलम: हम कई तरह के संवैधानिक मानकों से दूर भटक आए हैं

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कुछ दिन पहले जैसे ही चांद दिखा, हमारी मोबाइल स्क्रीन पर रमजान मुबारक के संदेश उभर आए। लेकिन शुभकामनाओं के बीच दो क्लिप ऐसी भी थीं, जिन्हें एल्गोरिदम नीचे नहीं धकेल सका। पहली, असम के मुख्यमंत्री का एक समुदाय को इस हद तक प्रताड़ित करने का आह्वान कि वे न केवल राज्य, बल्कि देश तक छोड़ने को मजबूर हो जाएं। दूसरी, 28 सेकंड का एक वीडियो, जिसमें बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़े एक प्रश्न के उत्तर में धार्मिक पृथक्करण का आह्वान करते हैं। सचमुच, हम संवैधानिक नैतिकता से कितने दूर भटक आए हैं! अब जब पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं तो सियासी बयानबाजी और अधिक विषैली ही होती चली जाएगी। मुस्लिम समुदाय अक्सर साम्प्रदायिक हमलों का टारगेट रहा है। लेकिन आज मैं इस समुदाय के एक उप-सम्प्रदाय- दाऊदी बोहरा शिया इस्माइली मुसलमानों पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं। भारत में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ है। इनमें से पांच लाख दाऊदी बोहरा हैं। ऐसा समुदाय, जो स्वयं मुस्लिम समुदाय का भी मात्र 0.25% है, दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के लिए क्यों मायने रखता है? हमेशा की तरह, असली बात बारीकियों में छिपी है। ‘बोहरा’ शब्द गुजराती के ‘वोहरवु’ या ‘व्यवहार’ से निकला है, जिसका अर्थ है ‘व्यापार करना’। बोहरा मुख्यतः व्यापारिक समुदाय है। विश्वभर में उनके सदस्यों की साक्षरता दर लगभग 100 प्रतिशत है। अपनी कम संख्या के बावजूद वे एक प्रगतिशील समुदाय हैं। उनकी प्रति व्यक्ति आय अन्य मुस्लिम समुदायों की तुलना में अधिक है। भारत के बोहराओं में से लगभग आधे गुजरात में रहते हैं। प्रधानमंत्री उनकी भाषा गुजराती बोलते हैं। जब संसद में विवादास्पद वक्फ संशोधन विधेयक पारित हुआ था तो उसके कुछ ही दिनों बाद प्रधानमंत्री ने बोहरा समुदाय के सदस्यों के साथ एक भेंटवार्ता की थी। इसमें बोहरा समुदाय के प्रतिनिधिमंडल ने वक्फ कानून की प्रशंसा की थी। इसके जरिए यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि भारत के मुसलमान इस कानून का समर्थन कर रहे हैं। जबकि बोहरा 20 करोड़ की मुस्लिम आबादी में से मात्र पांच लाख ही हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 मूलतः संघीय ढांचे और अल्पसंख्यकों के हितों के प्रतिकूल है। गैर-एनडीए दलों (जिनमें टीएमसी, कांग्रेस, एआईएमआईएम, सपा, द्रमुक, राजद शामिल हैं) के मुस्लिम और गैर-मुस्लिम सांसदों ने विधेयक को उसके मूल आधार पर चुनौती दी है। यहां रोचक बात यह है कि दाऊदी बोहराओं के प्रतिनिधियों ने 1923 में ही मुसलमान वक्फ अधिनियम से उन्हें बाहर रखे जाने की बात कही थी। उनका तर्क था कि बोहरा समुदाय अल-दाई अल-मुतलक में आस्था रखता है, जो समुदाय की सभी सम्पत्तियों के एकमात्र न्यासी हैं। समुदाय चाहता है कि उसके सदस्यों को अपनी मान्यताओं के अनुरूप सम्पत्तियों की स्थापना और उनके प्रबंधन की अनुमति दी जाए। वक्फ संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावित वक्फ बोर्ड इस स्वायत्तता को चुनौती देता है। ऐसे में पूछा जा सकता है कि समुदाय का प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिलने और उस विधेयक का समर्थन करने के लिए क्यों सहमत हुआ, जिसका वे ऐतिहासिक रूप से विरोध करते रहे हैं? अल्पसंख्यकों के प्रति खुलेआम प्रदर्शित की जाने वाली कट्टरता, पक्षपात और पूर्वग्रह की तुलना में भाजपा की यह रणनीति अधिक सूक्ष्म कही जा सकती है। पिछले एक दशक की घटनाओं का बारीकी से मुआयना करें तो एक बात समझ में आती है कि भाजपा चुपचाप अल्पसंख्यकों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना चाहती है। वह इन समूहों के अंदरूनी मामलों में विसंगतियों की पहचान करती है और उनमें अपनी मदद की पेशकश करती है, ताकि व्यापक रूप से विवादास्पद मुद्दों पर उनका समर्थन हासिल किया जा सके। भारत में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार यह समुदाय देश की कुल आबादी का 15% है। लेकिन भाजपा के पास एक भी ऐसा मुस्लिम सांसद नहीं है, जो उसके चुनाव-चिह्न पर निर्वाचित हुआ हो। गुलाम अली राज्यसभा में ‘नामांकित’ श्रेणी के अंतर्गत 12 सदस्यों में से एक थे। छह महीने की समय-सीमा के भीतर उन्होंने सभापति को पत्र लिखकर स्वयं को भाजपा सदस्य के रूप में शामिल किए जाने का अनुरोध किया था। यूपी में चार करोड़ मुसलमान हैं, फिर भी 403 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा का एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है। दूसरी तरफ 8% हिंदू आबादी वाले बांग्लादेश को देखें, जिसने हाल ही में हिंदू समुदाय से एक मंत्री का चुनाव किया है! इंडोनेशिया व पाकिस्तान के बाद भारत में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी है। लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के पास एक भी ऐसा मुस्लिम सांसद नहीं है, जो उसके चुनाव-चिह्न पर निर्वाचित हुआ हो। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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