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- Thomas L. Friedman’s Column The End Of This War Won’t Be Determined By The Battlefront Alone
7 घंटे पहले
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थॉमस एल. फ्रीडमैन तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड विजेता एवं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में स्तंभकार
मध्य पूर्व के युद्धों को समझने के लिए एक साथ कई पहलुओं पर गौर करना पड़ता है। इसकी जटिलताओं में धर्म, तेल, कबायली राजनीति, महाशक्तियों की कूटनीति एक-दूसरे से गुंथी होती हैं।
मैं निजी तौर पर तो चाहता हूं कि तेहरान की धर्मतांत्रिक सत्ता को हटाने की यह कोशिश सफल हो। यह ऐसा शासन है जो अपने लोगों को कुचलता है, पड़ोसियों को अस्थिर करता है और एक प्राचीन सभ्यता को भीतर से खोखला कर चुका है। मध्य पूर्व को अधिक उदार और समावेशी दिशा में मोड़ने के लिए इससे बड़ा घटनाक्रम शायद ही कोई हो सकता है- बशर्ते तेहरान में ऐसा नेतृत्व आए, जो ईरानियों को अपने भविष्य को लेकर वास्तविक अवसर दे।
लेकिन यह आसान नहीं होगा। इस हुकूमत की जड़ें गहरी हैं और यह सिर्फ हवाई हमलों से गिरने वाला नहीं। इजराइल दो साल से अधिक समय की भीषण हवाई और जमीनी लड़ाई के बाद भी गाजा में हमास को खत्म नहीं कर सका- जबकि वह उसके ठीक बगल में है।
फिर भी, अगर अमेरिका-इजराइल का यह हमला ईरानी जनता के उस आंदोलन में न भी बदले, जिसकी अपील ट्रम्प ने की है, तो भी इसके कुछ अप्रत्याशित सकारात्मक असर जरूर हो सकते हैं। मसलन ऐसा इस्लामिक रिपब्लिक 2.0, जो अपने नागरिकों और पड़ोसियों के लिए कम आक्रामक हो। लेकिन उतनी ही संभावना यह भी है कि इसे खतरनाक नतीजे हों- जैसे कि ईरान का एक भौगोलिक इकाई के रूप में विखंडन।
इस युद्ध का अंत सिर्फ लड़ाई के मोर्चे से तय नहीं होगा। तेल और वित्तीय बाजार भी उतने ही निर्णायक होंगे। ईरान पहले से आर्थिक पतन की कगार पर है। उसकी मुद्रा की हालत खस्ता है। रूस से गैस आयात कम करने के बाद यूरोप अब फारस की खाड़ी से आने वाली एलएनजी पर अधिक निर्भर है। ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल से महंगाई बढ़ेगी और यह ट्रम्प के समर्थकों को नाराज कर सकता है- जिनमें से कई पहले ही मध्य पूर्व में एक और युद्ध में उलझने के पक्ष में नहीं हैं।
बहुत से ताकतवर लोग चाहेंगे कि यह युद्ध छोटा रहे। यही फैक्टर्स तय करेंगे कि ट्रमप और तेहरान के बीच बातचीत कब और कैसे आगे बढ़ती है। ईरान में लोकतंत्र और कानून का राज कायम करने के नाम पर चल रहे इस युद्ध को हम अमेरिका और इजराइल के भीतर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर मंडरा रहे खतरों से ध्यान भटकाने का बहाना नहीं बनने दे सकते।
ट्रम्प तेहरान में लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करते हैं, जबकि उसी दौरान उनके प्रशासन की घरेलू नीतियां सवालों के दायरे में हैं। इजराइल में भी स्थिति कम जटिल नहीं है। ऐसे में क्या यह युद्ध नेतन्याहू को इस वर्ष प्रस्तावित चुनावों में राजनीतिक बढ़त दिलाएगा? ईरान ने प्रॉक्सी नेटवर्क खड़े कर चार अरब देशों- सीरिया, लेबनान, इराक और यमन पर प्रभाव जमाया और इन सभी में उदारवादियों को कमजोर करने के लिए सांप्रदायिक विभाजन को हवा दी।
पिछले दो वर्षों में इजराइल और अमेरिका के लगातार दबाव ने तेहरान की पकड़ को कमजोर किया है। इसका असर यह हुआ कि सीरिया में ईरान-समर्थित असद हुकूमत गिर गई और लेबनान हिजबुल्ला की पकड़ से बाहर निकल सका। यह भी याद रखना चाहिए कि ईरानी समाज स्वाभाविक रूप से पश्चिम के प्रति सबसे अधिक सकारात्मक रुझान रखने वाले समाजों में रहा है।
यदि उस प्रवृत्ति को उभरने और फैलने दिया गया और वह ईरानी शासन द्वारा फैलाए गए विभाजनकारी कट्टरपंथी इस्लामी एजेंडे की जगह लेती है, तो मध्य पूर्व के लिए अधिक समावेशी भविष्य की संभावना बन सकती है। यह अकारण नहीं है कि ईरान में शासन-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान सबसे लोकप्रिय नारों में से एक रहा है : न गाजा, न लेबनान, ईरान के लिए मेरी जान।
ईरान की आबादी में फारसी लोग सिर्फ 60 प्रतिशत हैं। बाकी 40 प्रतिशत अल्पसंख्यकों का एक समूह है, जिसमें ज्यादातर अजेरी, कुर्द, लूर, अरब और बलूच हैं। हर किसी का ईरान के बाहर की जमीनों से कनेक्शन है, खासकर अजेरी का अजरबैजान से और कुर्द का कुर्दिस्तान से। तेहरान में लंबे समय तक अफरा-तफरी मची रही तो इनमें से कोई भी अलग हो सकता है और ईरान असल में विखंडित भी सकता है।
- मध्य पूर्व में तानाशाही का उलटा हमेशा लोकतंत्र नहीं होता। अकसर वह अराजकता होती है। इस क्षेत्र की तानाशाही व्यवस्थाओं का अंत होता है, तो या तो वे टूट जाती हैं, जैसे लीबिया, या वे बिखरती हैं, जैसे सीरिया।
(द न्यूयॉर्क टाइम्स से)









