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यूं तो मैं नई दिल्ली की सड़कों, प्रतिमाओं और इमारतों में सरकार द्वारा किए गए हर परिवर्तन का समर्थन नहीं करता हूं। मिसाल के तौर पर, मुझे समझ नहीं आता कि राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ क्यों किया गया। न ही मैं यह समझ पाया हूं कि मुगल गार्डन्स का नाम बदलकर अमृत उद्यान क्यों किया गया, क्योंकि वह उद्यान मुगल शैली में ही निर्मित है। लेकिन इस महीने जब राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति भवन में एडविन लुटियन्स की प्रतिमा के स्थान पर सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा का अनावरण किया, तो इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। लुटियन्स बेशक एक प्रतिभाशाली आर्किटेक्ट रहे होंगे, लेकिन वे असंदिग्ध नस्लवादी थे। भारतीयों के प्रति उनके मन में गहरी अवमानना की भावना थी, जिसे उन्होंने कभी नहीं छिपाया। इसका अकाट्य प्रमाण 1985 में प्रकाशित पुस्तक ‘द लेटर्स ऑफ एडविन लुटियन्स टु हिज वाइफ लेडी एमिली’ में मिलता है। भारत का कुछ भी लुटियन्स को प्रभावित नहीं कर सका था- न वास्तुकला, न दर्शन, न संस्कृति और यहां के लोगों की चमड़ी का रंग तो हरगिज नहीं। इंदौर के डेली कॉलेज में उन्होंने छात्रों को एक नस्लवादी शब्द से सम्बोधित किया था। बनारस में उन्होंने पाया कि यहां ‘हर तरह के काले लोग, हर तरह का काम करते’ हैं। मद्रास के लोगों के लिए तो उन्होंने और अभद्र टिप्पणी की। एक अन्य प्रसंग में उन्होंने लिखा कि ‘भारत के लोगों से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती’। भारतीय धर्मों में उन्हें कोई बौद्धिकता नजर नहीं आई। अपने निजी स्टाफ के नामों पर भी वे फब्ती कसने से नहीं चूके। उन्होंने कहा, ‘ये लोग वो तमाम हरकतें करते हैं, जो किसी भी गोरे साहब को ऊबा सकती हैं।’ भारतीय वास्तुकला भी उन्हें प्रभावित नहीं कर पाई। बनारस के घाटों के किनारे स्थित मंदिर उन्हें ‘बच्चों के खिलौने वाले पेड़ों’ जैसे प्रतीत हुए। कुतुब मीनार की गढ़न उनके अनुसार बेपरवाह और बेढंगी थी। मुम्बई में होलकर का महल उन्हें अभद्र और उदयपुर का राजप्रासाद उन्हें आदिम लगा था। ताजमहल को भी उन्होंने खारिज करते हुए कह दिया कि वह यूनानियों और रोमनों की कृतियों के आसपास भी नहीं ठहरता। उनके साथ काम करने वाले भारतीय शिल्पकारों के बारे में उनकी टिप्पणी थी कि ‘इन्हें भद्दे पैटर्न्स और अनगढ़ देवप्रतिमाएं बनाने के सिवा कुछ नहीं आता’। एक निर्माण के अंतिम चरणों में काम का निरीक्षण करते हुए उन्होंने लिखा कि ‘लापरवाह भारतीय हमेशा की तरह चीजें बरबाद कर रहे थे और बेतरतीबी फैला रहे थे’। वे अपनी पत्नी के लिए बुद्ध प्रतिमा खरीदना चाहते थे, पर उन्हें कुछ भी मानक के अनुरूप नहीं लगा। उन्होंने लिखा- ‘हे भगवान, यहां सबकुछ कितना कुरूप है।’ यहां तक कि राष्ट्रपति भवन के भव्य गुम्बद को भी लुटियन्स ने इस प्रकार कल्पित किया था कि वह ‘ब्रिटिश सैनिक, अधिकारी, मिशनरी या वायसराय के टोपीधारी सिर की छवि’ उत्पन्न करे, जबकि इसे लुटियन्स के समर्थक भारतीय वास्तुकला से प्रेरित बताते हैं। इन तमाम उद्धरणों से स्पष्ट है कि हम भारतीयों और हमारी महान सभ्यता के प्रति लुटियन्स का रवैया एक कुपढ़, बददिमाग और नस्लवादी व्यक्ति का था। ऐसे में स्वयं राष्ट्रपति भवन में लुटियन्स की प्रतिमा का होना हमारी औपनिवेशिक विस्मृति का दयनीय प्रतीक था। यह पूर्णतः उपयुक्त है कि अब लुटियन्स की प्रतिमा को हटाकर उन चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रतिमा को स्थापित किया गया है, जो स्वतंत्र भारत के प्रथम और एकमात्र गवर्नर-जनरल थे। राजाजी एक सच्चे गांधीवादी और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें मद्रास प्रेसिडेंसी के प्रीमियर, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में व्यापक राजनीतिक-प्रशासनिक अनुभव प्राप्त था। वे चिंतक और लेखक भी थे। उनका साहित्यिक योगदान- जिसमें रामायण और महाभारत के अनुवादों से लेकर संस्कृति और राजनीति पर चिंतनपरक निबंध तक शामिल हैं- भारतीय बौद्धिक परम्परा को और समृद्ध बनाते हैं। हम ऐसे गणराज्य हैं, जो अपनी सार्वजनिक स्मृति को अपनी ही मिट्टी में रोपना चाहता है। हमें सरकार को इस निर्णय के लिए बधाई देनी चाहिए, जो औपनिवेशिक इमारतें बनाने वाले के बजाय राष्ट्र की अंतश्चेतना के निर्माण में योगदान देने वाले व्यक्ति की स्मृति को समर्पित है। यह पूर्णतः उपयुक्त है कि अब लुटियन्स की प्रतिमा को हटाकर उन सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा को स्थापित किया गया है, जो स्वतंत्र भारत के प्रथम और एकमात्र गवर्नर-जनरल थे। वे एक सच्चे गांधीवादी व स्वतंत्रता सेनानी थे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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