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- Bhishma Pitamah’s Teachings To The Pandavas, Mahabharata Story About Happiness In Life, How To Get Peace Of Mind, Krishna And Bhishma Pitamah Story
14 घंटे पहले
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कौरवों और पांडवों के बीच चल रहा महाभारत युद्ध अंतिम चरण में पहुंच चुका था। युद्ध का दसवें दिन अर्जुन ने इतने बाण चलाए कि भीष्म पितामह का पूरा शरीर बाणों से छलनी हो गया। वे धरती पर नहीं गिरे, बल्कि बाणों की शय्या पर लेट गए।
भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ था, इसलिए उस अवस्था में भी उन्हें मृत्यु नहीं आई। उन्होंने निश्चय कर रखा था कि जब युद्ध समाप्त हो जाएगा और सूर्य उत्तरायण होगा, तब ही वे अपने प्राण त्यागेंगे। इस घटना के बाद भीष्म पितामह के लिए उसी स्थान पर एक अलग शिविर बना दिया गया। युद्ध के समय और युद्ध के बाद, कौरव-पांडव दोनों पक्षों के लोग उनसे मिलने आते थे।
युद्ध समाप्त हुआ। पांडव विजयी हुए। जब पांडव भीष्म पितामह से मिलने पहुंचे, तो पांडवों ने देखा कि पितामह की आंखों से आंसू बह रहे हैं। ये दृश्य देखकर पांडव भी दुखी हो गए। उन्होंने विनम्रता से पूछा कि पितामह, आपकी आंखों में आंसू क्यों हैं?
भीष्म ने गहरी सांस लेते हुए कहा कि अब तुम लोग युद्ध जीत गए हो, पर इस जीत में तुम्हारे ही भाई, तुम्हारा ही वंश नष्ट हो गया। मेरे सामने मेरा पूरा कुल समाप्त हो गया। ये पीड़ा मेरे हृदय पर भारी बोझ बन गई है।
फिर उन्होंने आगे कहा कि मैं ये सोचकर भी रो रहा हूं कि जिन पांडवों के रथ की कमान स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने संभाली, जिन्हें ईश्वर का पूर्ण संरक्षण मिला हुआ है, उनके जीवन में भी इतने कष्ट आए। इससे मुझे ये सत्य और स्पष्ट रूप से समझ आ गया कि दुःख सभी के जीवन में आते-जाते रहते हैं। कोई भी दुखों से बच नहीं सकता।
भीष्म ने आगे कहा कि आज मैं रो रहा हूं, लेकिन इन आंसुओं से मेरा मन हल्का हो रहा है, बोझ कुछ कम हो गया है।
भीष्म की आंखों के आंसू जीवन की गहरी सीख दे रहे थे, भीष्म का संदेश है कि दुखों को दबाना नहीं चाहिए, बल्कि उसे स्वीकार करना चाहिए, तभी हम मजबूती से सही निर्णय ले पाते हैं।
- दुखों को दबाएं नहीं, स्वीकार करें
जीवन में दुख, असफलता और पीड़ा आना स्वाभाविक बात है। इन्हें नकारने या दबाने से मन और अधिक भारी हो जाता है। भीष्म पितामह की तरह दुख को स्वीकार करेंगे, तो मानसिक संतुलन बना रहेगा और मन शांत रहेगा।
- रोना कमजोरी नहीं, भावनात्मक सफाई है
आमतौर पर लोग मानते हैं कि रोना कमजोरी है, लेकिन ये सच्चाई नहीं है। आंसू से मन की सफाई होती हैं। जब मन बहुत भारी हो जाए, तो रो लेना आत्म-चिकित्सा का काम करता है। रोने से मन हल्का और मजबूत हो जाता है।
- हर परिस्थिति में सीख लें
पांडवों के जीवन में भगवान श्रीकृष्ण का साथ होने के बाद भी कष्ट आए। इससे हमें सीख मिलती है कि जीवन में कठिनाइयां स्थायी नहीं होती हैं, लेकिन उनसे मिलने वाली सीख हमें मजबूत बनाती है।
- भावनाएं करीबी लोगों से साझा करें
अपने दुख को भरोसेमंद और करीबी व्यक्ति से साझा करें। सब बातें अकेले सहते रहने से मानसिक तनाव बढ़ता है। करीबी लोगों के साथ बातचीत करने से समाधान नहीं भी मिले, तब भी मन हल्का जरूर हो जाता है।
- मानसिक मजबूती का अर्थ कठोर होना नहीं
मजबूत वही नहीं जो कभी रोए नहीं, बल्कि मजबूत वह है जो रोकर फिर खड़ा हो जाए। भावनाओं को समझना और संभालना जरूरी है। मुश्किल समय में कभी-कभी रो लेने से मन और अधिक मजबूत हो जाता है।
- स्वयं को समय दें
दुख से बाहर निकलने के लिए खुद को समय देना जरूरी है। जल्दबाजी में सब ठीक है दिखाने की कोशिश करने से बचना चाहिए। मन को भरने और खाली होने, दोनों का अधिकार देना चाहिए। जरूरत के समय मन हल्का करना भी जरूरी है।








