पेरेंटिंग- 9 साल की बेटी अलग कमरे में नहीं सोती:  डरती और रोती है, उसे इंडीपेंडेंट कैसे बनाएं, हमसे अलग सोने की आदत कैसे डालें
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पेरेंटिंग- 9 साल की बेटी अलग कमरे में नहीं सोती: डरती और रोती है, उसे इंडीपेंडेंट कैसे बनाएं, हमसे अलग सोने की आदत कैसे डालें

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8 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल

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सवाल- मैं इंदौर का रहने वाला हूं। मेरी 9 साल की बेटी है। वह रात में अकेले सोने से डरती है। वह अक्सर कहती है कि उसे अंधेरे से डर लगता है और वह सपना देखती है कि हम कहीं चले गए हैं। हमारा मानना है कि अब वह बड़ी हो गई है और उसे अलग कमरे में सोने की आदत डालनी चाहिए ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके।

हम उसकी भलाई चाहते हैं। लेकिन हमारे लिए यह तय कर पाना मुश्किल हो गया है कि आखिर किस उम्र में बच्चे को अकेले सोने के लिए तैयार करना चाहिए। हमारा डर यह भी है कि कहीं उसे अकेलापन न महसूस हो या यह बदलाव उसके आत्मविश्वास को नुकसान न पहुंचा दे। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें।

एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

जवाब- आपकी चिंता स्वाभाविक है। बहुत से पेरेंट्स को इस स्थिति का सामना करना पड़ता है। हालांकि इसमें बहुत चिंता करने की बात नहीं है।

आपकी बेटी 9 साल की उम्र में भी आपके साथ ही सो रही है या रात में अकेले सोने से डरती है तो इसका मतलब है कि वह बचपन से ही आपके पास सोती आ रही है। यह उसके लिए सुरक्षा, सुकून और प्यार का प्रतीक बन चुका है, जो एक स्वाभाविक और सुंदर अनुभव है। लेकिन अब समय है कि प्यार के साथ-साथ उसमें धीरे-धीरे स्वतंत्रता के बीज भी बोए जाएं।

हेल्दी पेरेंटिंग का मतलब है ‘प्यार और स्वतंत्रता का संतुलन’

बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, खुद से खाना सीखते हैं, पॉटी-सुसु बताने लगते हैं, स्कूल जाते हैं और पानी की बोतल से खुद पानी पीना सीखते हैं। ये छोटी-छोटी चीजें आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता के संकेत हैं। वह समय के साथ छोटे-छोटे काम खुद से करना सीखते हैं, जबकि बचपन में ये सारे काम कोई बड़ा उनके लिए कर रहा था। इसी तरह से अकेले सोना भी उस स्वतंत्रता की दिशा में एक कदम है।

बच्चे को बचपन से ही आत्मनिर्भर बनाना जरूरी

अगर बच्चे बढ़ती उम्र में भी हर काम के लिए पेरेंट्स पर निर्भर रहते हैं तो इसका मतलब है कि अब तक के पालन-पोषण में कुछ कमी रह गई है।

कुल मिलाकर इस समय उन्हें स्वतंत्रता देने की जरूरत है। छोटे-छोटे कामों से इसकी शुरुआत करें। बच्चे की क्षमता के अनुसार जितने काम उसके दायरे में आते हैं, वे काम करने के लिए उसे प्रेरित करें। चाहे वह घर के काम हों या उसके खुद के काम। जैसेकि ‘पानी का गिलास ला दो’, ‘अखबार दे दो‘ और ‘ये पैकेट डस्टबिन में फेंक दो’ वगैरह-वगैरह।

ये काम देखने में छोटे लग सकते हैं, लेकिन इनसे बच्चा महसूस करता है कि वह परिवार का एक अहम हिस्सा है। जब वह कोई काम खुद करता है तो उसकी तारीफ करें और कहें, “वाह! अब तो तुम बड़े हो गए हो।” इससे वह स्वाभाविक रूप से जिम्मेदारी लेना शुरू करता है। बच्चे में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए कुछ और कदम उठा सकते हैं।

बच्चे को बचपन से बनाएं स्वावलंबी

कई बार माता-पिता प्यार में ऐसा व्यवहार करने लगते हैं, जो अनजाने में बच्चे को बहुत ज्यादा डिपेंडेंट बना देता है। जैसेकि- खाना भी मां ही खिलाएं, कपड़े भी मां ही पहनाएं, सामान भी कोई और उठाए, जिस चीज की जरूरत हो उसे बोलने से पहले ही पूरा कर दिया जाए। ऐसे में बच्चा हर छोटी-बड़ी चीज के लिए दूसरों पर निर्भर रहना सीख जाता है।

इससे वह न जिम्मेदारी सीखता है, न निर्णय लेना, न धैर्य, न आत्मविश्वास। वह हर काम में किसी और की मदद ढूंढ़ने लगता है। इसलिए पेरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चे को बचपन से ही अपने छोटे-छोटे फैसले लेने दें, उसे अपने काम खुद करना सिखाएं। याद रखें कि हर बार आगे बढ़कर मदद करने से ज्यादा जरूरी उसे यह भरोसा देना है कि वह ये काम खुद भी कर सकता है।

बच्चे को धीरे-धीरे अकेले सोने के लिए करें प्रेरित

इन छोटे-छोटे कामों और बदलावों से बच्चे में जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है, जो उसे अकेले सोने के लिए प्रेरित करती है। इसके साथ ही माता-पिता को यह समझना चाहिए कि अकेले सोना भी आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनने की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है।

यह कोई सजा नहीं, बल्कि बच्चे के लिए खुद पर भरोसा करना सीखने का एक अवसर है। इसलिए जरूरी है कि पहले उसे मानसिक रूप से तैयार करें, प्यार और स्नेह के साथ प्रेरित करें और समय आने पर धीरे-धीरे सोने की यह स्वतंत्रता उसे सौंपें। इसके लिए धीरे-धीरे कोशिश करें और इस दौरान कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें।

बच्चे को अचानक खुद से न करें दूर

बच्चे को अचानक अलग करना सही तरीका नहीं है। अगर उसे अचानक अकेले सोने के लिए मजबूर किया जाता है तो वह खुद को असुरक्षित, असहाय और अस्वीकृत महसूस कर सकता है। यह बदलाव उसके आत्मविश्वास को मजबूत करने के बजाय कमजोर कर सकता है। ऐसे में बच्चा या तो हर वक्त माता-पिता की छाया में रहना चाहेगा या फिर भीतर ही भीतर डर और चिंता को दबाकर जीना शुरू कर देगा। इसलिए जरूरी है कि यह बदलाव धीरे-धीरे, प्यार और समझदारी से किया जाए ताकि वह न सिर्फ अलग सोना सीखे, बल्कि खुद पर भरोसा करना भी।

अंत में यही कहूंगी कि बच्चों को स्वतंत्र बनाना है तो पहले उन्हें सुरक्षित महसूस कराना होगा क्योंकि आत्मनिर्भरता वहीं पनपती है, जहां विश्वास और भावनात्मक जुड़ाव की जड़ें गहरी हों। इससे उसमें धीरे-धीरे अलग सोने की आदत विकसित होगी।

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