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7 घंटे पहले
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प्रियदर्शन लेखक और पत्रकार
वर्चस्ववाद के रूप बड़े सूक्ष्म होते हैं। कई बार वे अवचेतन में इतने धंसे होते हैं कि लोगों को पता तक नहीं चलता वे किसी वर्चस्ववादी प्रवृत्ति के शिकार हैं। इसकी एक मिसाल दुनिया का बनाया वह नक्शा है, जिस पर अब अफ्रीका के मुल्कों को ऐतराज हो रहा है।
यह नक्शा 16वीं सदी में गेरार्डस मेर्काटर नाम के एक नक्शानवीस ने बनाया था। दुनिया का नक्शा बनाना आसान काम नहीं है- खासकर तब जब इस गोल धरती को आयताकार शक्ल देनी हो। लेकिन मेर्टाकर ने मेहनत से यह काम किया और मोटे तौर पर वही नक्शा इस सदी तक चला आया है। लेकिन अब पता चल रहा है कि इस नक्शे में अफ्रीका को छोटा और दबा हुआ दिखाया गया है, जबकि यूरोप को अपने आकार से बड़ा दिखाया है।
मेकार्टर की अपनी मुश्किलें थीं, जिनको हल करने की कोशिश में उसने एक सपाट रास्ता खोजा। तब यूरोप का साम्राज्यवादी विस्तार शुरू नहीं हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे इस नक्शे को मिली मान्यता के पीछे अवचेतन में बसा यूरोप का बड़ा होता कद भी रहा हो तो हैरानी की बात नहीं।
लेकिन अब अफ्रीकी देश जाग रहे हैं। उनका कहना है इस नक्शे को बदलना होगा। ‘अफ्रीका नो फिल्टर’ और ‘स्पीक-अप अफ्रीका’ जैसे संगठनों ने एक मुहिम चलाई है- ‘करेक्ट द मैप’- जिसे अफ्रीकी यूनियन भी समर्थन दे रही है। उनके लिए ये वास्तविक पहचान का मामला है।
उनका कहना है नक्शे में हेरफेर की वजह अफ्रीका के प्रति पूर्वग्रह और यूरोप की श्रेष्ठता ग्रंथि है। नक्शे में जितना अफ्रीका दिखता है, उसके मुकाबले वास्तविक अफ्रीका तीन गुना बड़ा है, जबकि जो यूरोप दिखता है, वह असल में तीन गुना छोटा है। उत्तर अमेरिका और ग्रीनलैंड भी अनुपात से बड़े हैं।
इसके पीछे यह मानसिकता है कि अफ्रीका हाशिए पर पड़ा महादेश है, जबकि सच्चाई ये है कि उसमें 54 देश हैं और दुनिया की एक अरब से ज्यादा आबादी बसती है। नक्शे में संशोधन की इस मुहिम ने इसलिए भी जोर पकड़ा है कि अब दुनिया के सामने एक वैकल्पिक नक्शा सुलभ है, जिसमें देशों और महादेशों को उचित अनुपात के साथ प्रतिनिधित्व मिला है। यह 2018 में तैयार किया गया इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन है, जिसे हर जगह इस्तेमाल करने की मांग हो रही है।
लेकिन यह टिप्पणी नक्शों के बारे में नहीं, उन पूर्वग्रहों के बारे में है, जो हम सरलीकृत धारणाओं के आधार पर बना लेते हैं। इनमें लैंगिक पूर्वग्रह भी होते हैं- जैसे मर्द मजबूत होता है, औरत कमजोर। नागरिक पूर्वग्रह भी होते हैं- जैसे शहर सभ्य होते हैं, गांव गंवार।
कुछ शैक्षणिक पूर्वग्रह भी होते हैं- जैसे पढ़े-लिखे लोग योग्य होते हैं, अनपढ़ अयोग्य। कुछ पूर्वग्रह देशों और महादेशों को लेकर भी होते हैं, जिसका प्रमाण इस नक्शा प्रकरण से मिलता है। पर ये पूर्वग्रह बनते कैसे हैं? जाहिर है, इन्हें वर्चस्वशाली तबके ही बनाते हैं।
भारतीय समाज भी ऐसे पूर्वग्रहों से पटा पड़ा है- हमारा धर्म श्रेष्ठ, हमारी बोली श्रेष्ठ, हमारी जाति श्रेष्ठ- जैसे पूर्वग्रह आक्रामक ढंग से सामने आ रहे हैं- उनका राजनीतिक इस्तेमाल करने की कोशिश हो रही है- बल्कि उन्हीं के दम पर राजनीति की जा रही है।
ध्यान से देखें तो दुनिया में देश और महादेश जितने वास्तविक और स्थायी दिखते हैं, उतने वे हैं नहीं। सारी रेखाएं काल्पनिक हैं और मनुष्यों द्वारा खींची हैं। कुंवर नारायण की एक कहानी है, जिसमें दो देशों के बीच की सीमारेखा गायब हो जाती है।
अब सब परेशान हैं कि रेखा कहां गई। उनके लिए सारी दुनिया उलट-पुलट गई है। नेता-अफसर-सिपाही सब सीमा रेखा की तलाश में लगे हैं। कहानी के अंत में बस बच्चे सीमारेखाओं के गुम होने से बेखबर और खुश खेल रहे हैं।
नक्शे हों, सीमारेखाएं हों, धारणाएं हों- उनमें हमारे पूर्वग्रह झांकते हैं, वर्चस्ववाद चला आता है। कोशिश करें हम इनसे मुक्त हों, इन्हें अटल और अंतिम सत्य न मानें, समझें कि उन्हें बदला जा सकता है, बदला जाना चाहिए।
अब दुनिया के सामने एक वैकल्पिक नक्शा सुलभ है, जिसमें देशों और महादेशों को उचित अनुपात के साथ प्रतिनिधित्व मिला है। यह इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन है, जिसे हर जगह इस्तेमाल करने की मांग हो रही है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








