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बहुत समय पहले की बात है। एक राजा के पास अपार संपत्ति, विशाल सेना और आज्ञाकारी प्रजा थी, लेकिन इन सबके साथ-साथ उसके मन में गहरा अहंकार भी बस गया था। उसे अपने धन, पद और शक्ति पर बहुत घमंड था। उसे लगता था कि दुनिया में ऐसा कोई काम नहीं है, जो वह नहीं कर सकता है। राजा का जब जन्मदिन आया, तो राजमहल में भव्य कार्यक्रम हुआ। पूरे राज्य की प्रजा वहां आई हुई थी। राजा ने घोषणा की कि अपने जन्मदिन के अवसर पर वह राज्य के किसी एक व्यक्ति की सारी इच्छाएं पूरी करेगा। राजा चाहता था कि सबको उसकी महानता का पता चले, इसलिए उसने ऐसी घोषणा की। प्रजा के साथ-साथ एक संत भी राजमहल पहुंचे। संत सादे गेरूए वस्त्र धारण किए हुए थे और उनके चेहरे पर शांति थी। संत ने राजा को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। राजा की नजर संत पर पड़ी और उसने गर्व से कहा कि मैं आज आपकी सभी इच्छाएं पूरी करना चाहता हूं। जो चाहें मांग लीजिए, मैं राजा हूं और मैं आपकी सभी इच्छाएं पूरी कर सकता हूं। संत ने शांत स्वर में कहा कि महाराज, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं जैसे हूं, वैसे ही संतुष्ट हूं। राजा को यह सुनकर अच्छा नहीं लगा। उसका अहंकार आहत हो गया। उसने बार-बार आग्रह किया कि संत उससे कुछ न कुछ अवश्य मांगें। संत समझ गए कि राजा को अहंकार हो गया है। उन्होंने कहा कि यदि आप सच में देना चाहते हैं तो इस छोटे से बर्तन को सोने के सिक्कों से भर दीजिए। राजा हंस पड़ा। उसे यह काम बहुत आसान लगा। उसने अपने पास रखे सिक्के बर्तन में डाल दिए, लेकिन वे सिक्के अचानक गायब हो गए। राजा चौंक गया। उसने खजाने से और सिक्के मंगवाए। जैसे-जैसे सिक्के डाले जाते, वैसे-वैसे वे गायब होते गए। धीरे-धीरे पूरा खजाना खाली हो गया, लेकिन बर्तन फिर भी खाली रहा। थक-हारकर राजा ने संत से पूछा कि कृपया इस बर्तन का रहस्य क्या है? संत बोले कि महाराज, यह बर्तन मन का प्रतीक है। मन कभी भी धन, पद और ज्ञान से नहीं भरता। जब तक अहंकार है, संतोष नहीं हो सकता। संत की बात सुनकर राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने अहंकार त्यागने का संकल्प लिया और संत से क्षमा मांगी। प्रसंग की सीख सफलता मिलने पर घमंड आना स्वाभाविक है, लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए। घमंड आगे बढ़ने से रोकता है। विनम्रता व्यक्ति को सीखने के लिए प्रेरित करती है। धन, पद, प्रशंसा या प्रतिष्ठा से अस्थायी खुशी मिलती है। स्थायी शांति अंदर से आती है, बाहरी उपलब्धियों से नहीं। हमारे मन को शांति और प्रसन्नता बाहरी चीजों से नहीं, संतोष से मिलती है। जितना अधिक मिलता है, उतना ही अधिक पाने की चाह बढ़ती है। इसलिए जीवन में आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच अंतर समझना जरूरी है। जो व्यक्ति अपने पास मौजूद चीजो में संतोष करना सीख लेता है, वह तनाव और चिंता से दूर रहता है, ऐसे लोगों के जीवन में प्रसन्नता बनी रहती है। समय-समय पर खुद से सवाल करें कि क्या मैं सच में खुश हूं? या क्या मैं सिर्फ दूसरों को दिखाने के लिए जी रहा हूं? जब हम इस सवालों पर चिंतन करते हैं तो हमें समझ आता है कि जीवन में प्रसन्नता पाने के लिए क्या करना चाहिए। किसी उच्च उद्देश्य, सेवा, ध्यान या भक्ति से जुड़ने पर मन की अशांति कम होती है और जीवन संतुलित बनता है। अपने साधनों का इस्तेमाल अच्छे कार्यों के लिए करें, न कि दूसरों से खुद को बड़ा साबित करने के लिए। जीवन जितना सरल होगा, मन उतना ही हल्का रहेगा। अनावश्यक संग्रह से बचें। विचारों में सकारात्मकता बनाए रखें। यह न सोचें कि आप सब कुछ जानते हैं। सीखने की भावना जीवन को आगे बढ़ाती है, इसलिए दूसरों से कुछ न कुछ सीखते रहने की आदत बनाएं। शांत मन, संतुलित सोच और सकारात्मक दृष्टिकोण- यही सुखी और सफल जीवन का आधार है।
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