प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम:  समृद्धि का अमृत तो मिला पर प्रदूषण का विष कौन पीएगा?
टिपण्णी

प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम: समृद्धि का अमृत तो मिला पर प्रदूषण का विष कौन पीएगा?

Spread the love




पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवों और असुरों ने अमृत की प्राप्ति के लिए समुद्र-मंथन किया था तो अमृत से पहले हलाहल नामक भीषण विष निकला था। उस विष से समस्त सृष्टि के विनाश का संकट खड़ा हो गया था। तब भगवान शिव ने करुणावश उसे अपने कंठ में धारण किया और नीलकंठ कहलाए। आज के युग में हम एक बार फिर मंथन कर रहे हैं। यह प्रकृति के संसाधनों का मंथन है। हम अपनी सुख-सुविधाओं और अंतहीन इच्छाओं की पूर्ति के लिए पृथ्वी के गर्भ से आकाश तक, हर प्राकृतिक संसाधन को मथ रहे हैं। इससे हमें आर्थिक समृद्धि और तकनीक का अमृत तो मिल रहा है, पर इससे प्रदूषण का विष भी निकल रहा है। विकास की हमारी अंधी दौड़ ने न केवल हवा को जहरीला और जल को प्रदूषित किया है, बल्कि मिट्टी को भी बहुत हद तक बंजर बना दिया है। धरती का बढ़ता तापमान और अनियंत्रित जलवायु परिवर्तन हमारे अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं। विडम्बना यह है कि हम प्राकृतिक संसाधनों को इतनी निर्दयता और तेजी से मथ रहे हैं कि प्रकृति को स्वयं को सम्भालने और पुनर्जीवित करने का अवसर ही नहीं मिल रहा है। आज मानवता पृथ्वी की क्षमता से कहीं अधिक उपभोग कर रही है। यह अतिरिक्त उपभोग ही वह विष है, जो पर्यावरण में कार्बन उत्सर्जन और कचरे के रूप में घुल रहा है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आज के इस विष को कौन पीएगा? क्या हम किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करें कि कोई आएगा और हमारे द्वारा फैलाए गए इस प्रदूषण को सोख लेगा? विज्ञान और तकनीक की अपनी सीमाएं हैं। कोई भी टेक्नोलॉजी या नीति तब तक सफल नहीं हो सकती, जब तक हम धरती की सीमाओं में न जीएं और विष पैदा करना बंद न कर दें। मुझे लगता है कि आज हर व्यक्ति को अपने हिस्से का थोड़ा-थोड़ा हलाहल पीना होगा। यह विष किसी प्याले में नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली में है। हमें अपनी अधिक पाने की लालसा को अपने कंठ में ही रोकना होगा ताकि वह धरती के भीतर तक न पहुंचे। जब समाज का हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी का यह विष पीएगा, तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए अमृत सुरक्षित रह पाएगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि पृथ्वी सीमित है और यह हमेशा सीमित ही रहेगी, चाहे हमारा विज्ञान और हमारी अर्थव्यवस्था कितनी भी प्रगति क्यों न कर ले। हकीकत में, संसाधनों की कमी को समझना मनुष्यों के लिए बहुत ही सहज और स्वाभाविक है। जब हमारी आय सीमित होती है, तो हम अपने खर्चों को स्वतः ही सीमित कर लेते हैं। यदि हमारे पास पांच सीटों वाली कार है, तो हम उसमें दस लोगों को बैठने के लिए आमंत्रित नहीं करते। हम हर दिन क्षमता के आधार पर निर्णय लेते हैं, फिर पृथ्वी के संदर्भ में हम इस बुनियादी सत्य को क्यों भूल जाते हैं? हमें समझना होगा कि पृथ्वी का आकार निश्चित है और यह समय या तकनीक के साथ नहीं बढ़ रहा है। इसके संसाधन भी सीमित हैं। फिर ऐसा कैसे है कि हमारा उपभोग और मांग लगातार बढ़ती जा रही है? यह अहसास कि हम एक सीमित धरती पर रह रहे हैं, समाधान की दिशा में पहला कदम है। जब हम अपनी सीमाओं को पहचान लेंगे, तभी हम सही मायने में समाधान की ओर बढ़ पाएंगे। यहां यह समझना भी अनिवार्य है कि यह समस्या हम सभी के उपभोग से पैदा हुई है, इसलिए समाधान का हिस्सा भी हम सभी को बनना होगा। यदि हम अपनी आदतों को सुधार लें और “अफोर्ड’ करने की क्षमता होने के बावजूद प्रकृति के लिए “अवॉइड’ करना सीख जाएं, तो हम इस विष को फैलने से रोक सकते हैं। विकास का अर्थ विनाश नहीं, बल्कि संतुलन होना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *