3 घंटे पहले
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दिवाली का त्योहार खुशियों से भरा होता है। घर सजते हैं, मिठाइयां बनती हैं और चारों तरफ रोशनी की चमक दिखती है। लेकिन इस खुशी में पटाखों की आवाज और धुआं सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है।
पटाखों से निकला धुआं हमारे फेफड़ों को और पूरे शरीर को प्रभावित करता है। अमेरिकन लंग एसोसिएशन के मुताबिक, पटाखों से निकलने वाले पार्टिकल पॉल्यूशन फेफड़ों की बीमारियों को बदतर बना सकते हैं और हार्ट अटैक, स्ट्रोक या लंग कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं।
बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस की समस्या वाले लोगों के लिए यह और भी खतरनाक होता है। पटाखों से निकलने वाले PM2.5 जैसे महीन कण फेफड़ों में गहराई तक घुस जाते हैं और खून में मिलकर पूरे शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। NYU लैंगोन की रिसर्च के मुताबिक, पटाखों में लेड, कॉपर जैसे टॉक्सिक मेटल्स होते हैं जो इंसानी सेल्स और फेफड़ों के टिशू को डैमेज करते हैं।
इसलिए ‘फिजिकल हेल्थ’ में आज पटाखों के नुकसान की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-
- पटाखों का फेफड़ों पर क्या असर पड़ता है?
- किन लोगों को ज्यादा रिस्क है और बचाव कैसे करें?
पटाखों में कौन से केमिकल्स होते हैं?
पटाखे सिर्फ धमाके और चमक नहीं देते, बल्कि उनके अंदर कई केमिकल्स मिले होते हैं जो जलने पर जहरीली गैस और कण छोड़ते हैं। ये केमिकल्स पटाखों को रंग-बिरंगा बनाने और धमाका पैदा करने में मदद करते हैं, लेकिन हमारे शरीर के लिए ये जहर की तरह काम करते हैं। ग्राफिक में देखिए-

ये केमिकल्स जलने पर हवा में मिल जाते हैं और सांस के जरिए हमारे शरीर में पहुंचते हैं। सल्फर डाइऑक्साइड गैस फेफड़ों की लाइनिंग को इरिटेट करती है, जिससे खांसी और सांस फूलने जैसी समस्या होती है। अगर आप दिवाली की रात बाहर पटाखे फोड़ते हैं तो ये कण नाक और गले से होते हुए फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं।
पटाखों के केमिकल्स का पूरे शरीर पर क्या असर होता है?
ये केमिकल्स सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं रहते। वे पूरे शरीर को प्रभावित करते हैं। कॉपर सांस से जुड़ी दिक्कत पैदा कर सकता है, जबकि लेड नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है।

ये असर तुरंत दिख सकते हैं या लंबे समय में भी असर देखने को मिल सकते हैं। अगर कोई बच्चा पटाखों के धुएं में ज्यादा समय बिताता है, तो उसे सिरदर्द या जलन महसूस हो सकती है। ये मेटल्स लंग टिशू को डैमेज करते हैं और जानवरों पर टेस्ट में भी यही देखा गया है।
पटाखे फेफड़ों को कैसे प्रभावित करते हैं?
पटाखे फोड़ने से हवा में PM2.5 और PM10 जैसे महीन कण फैल जाते हैं। ये कण इतने छोटे होते हैं कि फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं। साथ ही, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसें फेफड़ों को इरिटेट करती हैं। इससे अस्थमा अटैक ट्रिगर हो सकता है, COPD जैसी बीमारियां बदतर हो सकती हैं और लंबे समय में फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है।
पटाखों से फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने का तरीका कुछ ऐसा है: जलने पर जहरीले पदार्थ हवा में मिलते हैं, जो गले और नाक को जलाते हैं। इससे सूजन आ जाती है और सांस लेना मुश्किल हो जाता है। अगर पहले से अस्थमा है, तो हमला हो सकता है। ब्रोंकाइटिस या निमोनिया का खतरा बढ़ जाता है। बार-बार एक्सपोजर से फेफड़ों की क्षमता कम हो सकती है। बच्चे और बुजुर्ग ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि उनके फेफड़े कमजोर होते हैं।
पटाखों से क्या हेल्थ रिस्क होते हैं?
दिवाली की रात हवा इतनी प्रदूषित हो जाती है कि सांस लेना दूभर हो जाता है। ये प्रभाव सिर्फ फेफड़ों तक नहीं, बल्कि पूरे शरीर पर पड़ता है।

ये प्रभाव तुरंत जैसे खांसी, छींक या जलन के रूप में दिखते हैं। हार्ट पेशेंट्स में प्रदूषण से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और स्ट्रेस रिस्पॉन्स ट्रिगर हो सकता है। आंखों में कण घुसने से जलन होती है, जबकि तेज धमाकों से कान प्रभावित हो सकते हैं। टाइम मैगजीन की रिपोर्ट कहती है कि पटाखों से रेस्पिरेटरी इश्यूज के अलावा विजन और हियरिंग डैमेज भी हो सकता है। गर्भवती महिलाओं में प्रदूषण से प्रीमैच्योर बर्थ या कम वजन के बच्चे का रिस्क बढ़ता है।
क्या ये नर्वस सिस्टम को भी प्रभावित करते हैं?
फेफड़ों के अलावा, पटाखे हार्ट, नर्वस सिस्टम, आंखें और स्किन को भी प्रभावित करते हैं। धमाकों से अचानक स्ट्रेस होता है, जिससे हार्ट रेट बढ़ता है और पल्पिटेशन हो सकता है। जहरीले केमिकल्स जैसे लेड और आर्सेनिक कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं। अपोलो 247 की रिपोर्ट में कहा गया है कि पटाखों से बर्न्स या आई इंजरी का खतरा भी है। इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, जिससे इन्फेक्शन बढ़ते हैं। न्यूरोलॉजिकल स्ट्रेस से सिरदर्द या चक्कर आ सकते हैं। कुल मिलाकर, पटाखे खुशी के साथ सेहत का बोझ भी लाते हैं।
किन लोगों को ज्यादा खतरा है?
ये प्रभाव हर किसी पर अलग-अलग पड़ते हैं, लेकिन कुछ लोग ज्यादा कमजोर होते हैं। बच्चे, क्योंकि उनके फेफड़े विकसित हो रहे होते हैं। बुजुर्गों में पहले से कमजोर लंग फंक्शन होता है। अस्थमा, COPD या हार्ट प्रॉब्लम वाले लोगों को अटैक का रिस्क ज्यादा है। गर्भवती महिलाएं और नवजात शिशु भी संवेदनशील होते हैं। सल्फर डाइऑक्साइड जैसे पॉल्यूटेंट्स फेफड़ों को सीधा डैमेज करते हैं।
धुएं के नुकसान से बचने के लिए सेफ्टी टिप्स क्या हैं?
सबसे बड़ा सेफ्टी टिप तो पटाखों के धुएं से यथासंभव दूरी बरतना है। पटाखे न जलाएं, जहां जल रहे हों, वहां न जाएं, घर के अंदर की हवा को साफ रखने की कोशिश करें और अपने फूूड में उन चीजों की मात्रा बढ़ा दें, जो फेफड़ों को टॉक्सिन्स से प्रोटेक्ट करने का काम करते हैं।

प्रदूषण से फेफड़ों को बचाएंगे ये फूड
दुनिया की सभी मुसीबतों का हल प्रकृति के पास है। प्रदूषण बढ़ने पर भोजन में साइट्रस फूड बढ़ाने चाहिए। ये प्रदूषण से हमारे फेफड़ों को बचाते हैं। इसके अलावा फूलगोभी, ब्रॉकली और हल्दी-अदरक भी प्रदूषण से बचाते हैं। इस दौरान हमारे भोजन में किन चीजों की मात्रा अधिक होनी चाहिए, ग्राफिक में देखिए-

पटाखों से जुड़े कुछ कॉमन सवाल और जवाब
सवाल: पटाखों का असर कितने समय तक रहता है?
जवाब: तुरंत दिखने वाले लक्षण जैसे खांसी, जुकाम 1-2 दिन में ठीक हो सकते हैं, लेकिन बार-बार एक्सपोजर से लंबे समय में फेफड़ों की क्षमता कम हो सकती है। स्टडीज बताती हैं कि दिवाली के बाद हवा 2-3 दिन तक प्रदूषित रहती है।
सवाल: क्या ग्रीन पटाखे सुरक्षित हैं?
जवाब: ये कम केमिकल्स वाले होते हैं, लेकिन फिर भी धुआं छोड़ते हैं। पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, इसलिए कम यूज करें।
सवाल: अगर लक्षण दिखें तो क्या करें?
जवाब: आराम करें, पानी पिएं और डॉक्टर दिखाएं। अगर सांस फूल रही हो तो इमरजेंसी में जाएं। ये टिप्स अपनाकर आप दिवाली को हेल्दी तरीके से मना सकते हैं। याद रखेंकि खुशी सेहत से आती है, पटाखों से नहीं। छोटी सावधानी से बड़ा नुकसान टाल सकते हैं।
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