बच्ची पर हमला करने वाली नैनी पुलिस हिरासत में:  4 साल की बच्ची को पीटने का मामला, साइकोलॉजिस्ट ने कहा-टीचर्स, स्कूल स्टाफ का साइकोमैट्रिक टेस्ट हो
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बच्ची पर हमला करने वाली नैनी पुलिस हिरासत में: 4 साल की बच्ची को पीटने का मामला, साइकोलॉजिस्ट ने कहा-टीचर्स, स्कूल स्टाफ का साइकोमैट्रिक टेस्ट हो

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11 घंटे पहले

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हैदराबाद में चार साल की मासूम बच्ची पर हमला करने की आरोपी नैनी को पुलिस ने हिरासत में लेकर मामले की जांच शुरू कर दी है। पुलिस ने कहा कि आरोपी महिला का नाम लक्ष्मी है। लक्ष्मी और बच्ची की मां के बीच अच्छे संबंध नहीं थे।

लक्ष्मी को यह डर भी था कि बच्ची की मां की वजह से उसकी नौकरी जा सकती है क्योंकि वह युवा है। शिक्षा विभाग ने स्कूल प्रबंधन से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। विभाग ने संकेत दिए हैं कि यदि लापरवाही साबित होती है तो स्कूल के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल बच्ची का इलाज चल रहा है और पुलिस आरोपी से पूछताछ कर रही है।

इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। वीडियो में स्कूल की अटेंडेट या नैनी 4 साल की मासूम बच्ची पर हमला करती नजर आ रही है। कभी वो उसे जमीन पर पटकती है तो कभी उसका गला दबाती दिख रही है। वो बच्ची के बाल पकड़कर उसका सिर जमीन पर पटक देती है और कुछ देर बाद बच्ची को लात भी मारती दिख रही है।

बच्ची की मां उसी स्कूल में बस कंडक्टर है

बच्ची की मां उसी स्कूल में बस कंडक्टर का काम करती है। स्कूल की छुट्टी होने के बाद वो स्कूल के बाकी बच्चों को छोड़ने के लिए गई हुई थी। इस दौरान बच्ची स्कूल परिसर में ही थी।

घटना के बाद बच्ची की हालत बिगड़ी तो परिवार वाले उसे अस्पताल लेकर गए। डॉक्टरों ने जांच कर बताया कि बच्ची के शरीर पर कई निशान हैं, जो शारीरिक हिंसा की ओर इशारा करते हैं। वीडियो देखने के बाद बच्ची के माता-पिता ने स्कूल की नैनी लक्ष्मी के खिलाफ पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई।

पहले भी आए हैं स्कूलों में मारपीट के मामले

केस 1- महाराष्‍ट्र के पालघर जिले के एक प्राइवेट स्कूल में कक्षा 6 की छात्रा अंशिका की 15 नवंबर को मौत हो गई। छात्रा पिछले एक सप्‍ताह से अस्‍पताल में थी। दरअसल, एक सप्‍ताह पहले उसे 10 मिनट देर से पहुंचने पर स्‍कूल में सिटअप्‍स यानी उठक-बैठक लगाने की सजा दी गई थी। छात्रा की मां का कहना है कि उसके बाद से ही बेटी उठ भी नहीं पा रही थी। छात्रा की मौत के बाद प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कर दी।

केस 2- हिमाचल प्रदेश के शिमला में एक सरकारी स्‍कूल के 3 टीचर्स ने मिलकर कक्षा 1 के बच्‍चे को जमकर पीटा। इतना ही नहीं, उसकी पैंट में बिच्‍छू तक डाल दिया। पीटने वाले टीचर्स में स्‍कूल का हेडमास्‍टर भी शामिल है।

छात्र दलित समुदाय से है और शिमला के रोहरू सब डिवीजन के गवर्नमेंट प्राइमरी स्‍कूल का स्‍टूडेंट है। बच्‍चे के पिता ने कहा कि हेडमास्‍टर देवेंद्र के साथ-साथ टीचर बाबूराम और कृतिका ठाकुर लगभग 1 साल से बच्‍चे के साथ मारपीट कर रहे थे। शिकायत के अनुसार, लगातार पिटाई से बच्‍चे के कान से खून बहने लगा और कान के पर्दे में भी चोट आईं।

केस 3- शिमला के शिक्षा विभाग ने रोहरू सब-डिविजन में पोस्टेड सरकारी टीचर को सस्पेंड कर दिया है। दरअसल, कुछ ही दिन पहले इन्हीं टीचर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था जिसमें वो एक स्टूडेंट को कांटे वाली छड़ी से बेरहमी से पीटती नजर आ रही थीं।

टीचर का नाम रीना राठौड़ है और वे रोहरू ब्लॉक के गवाना प्राइमरी स्कूल में हेड टीचर के तौर पर तैनात थीं। टीचर ने पहले छात्र की शर्ट उतारी और उसे कांटे वाली छड़ी से पीटने लगी। इसका एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें स्टूडेंट रोता हुआ नजर आ रहा है।

केस 4- हरियाणा के पानीपत के एक स्कूल टीचर का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में टीचर बच्चों के साथ मारपीट और खराब व्यवहार करती नजर आ रही है। कथित वीडियो पानीपत के सृजन पब्लिक स्कूल का है। वीडियो की शुरुआत में बच्चा मैट पर बैठा हुआ है। तभी टीचर उसे अपने पास बुलाती है और थप्पड़ लगाना शुरू कर देती है। वीडियो में आगे टीचर बच्चे का कान खींचती है और लगातार थप्पड़ जड़ रही है। एक अन्य वीडियो में सजा के तौर पर एक बच्चे को टीचर ने खिड़की से उल्टा लटका दिया।

इतने नियम-कानूनों के बाद भी बच्चों के साथ मारपीट के मामलों में कमी नहीं आई है। इसके पीछे एक बड़ा कारण है कि नियमों का सही से पालन हो रहा है या नहीं, यह सुनिश्चित करने के लिए कोई नहीं है। इसके अलावा बच्चों के साथ मारपीट हमारे समाज में अपनाई गई चीज है, इसलिए इसके खिलाफ लोगों में उतना गुस्सा भी नहीं देखा जाता।

प्यार से समझाने के पक्ष में पेरेंट्स

दिल्ली पेरेंट्स असोसिएशन की अपराजिता गौतम कहती हैं, ‘कॉर्पोरल पनिशमेंट पूरी तरह से घरों और स्कूलों से खत्म नहीं है। लेकिन आज बहुत से पेरेंट्स इसे लेकर सेंसिटिव हो गए हैं। वे नहीं चाहते कि जैसे उन्हें बचपन में स्कूल में मारा गया, उनके बच्चों के साथ भी ऐसा ही हो। ऐसे पेरेंट्स चाहते हैं कि बच्चों को मारने-पीटने के बजाय बैठाकर प्यार से समझाया जाना चाहिए।’ इसके अलावा अपराजिता कहती हैं कि आज कई स्कूलों में एक क्लास में 50-60 बच्चे भी पढ़ते हैं। ऐसे में टीचर के लिए उन्हें हैंडल करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे बच्चों के साथ मारपीट करें।

शैतानी करने पर या बच्चों को अनुशासन सिखाने के लिए उन्हें समझाया जाना चाहिए। उन्हें काउंसलर के पास भेज सकते हैं। अपराजिता कहती हैं, ‘बच्चे यह चाहते हैं कि कोई उनकी बात सुन ले, उनका पक्ष समझ ले।’

पेरेंट्स को लेकर उन्होंने कहा, ‘पेरेंट्स और टीचर्स दोनों को सेंसेटाइज करने की जरूरत है। अब माहौल बदल चुका है। मारपीट बच्चों की समस्याओं का हल नहीं है।’

‘टीचर्स की साइको-मैट्रिक टेस्टिंग हो’

स्कूल में टीचर्स द्वारा बच्चों के साथ दुर्व्यवहार करने को लेकर साइकोलॉजिस्ट अदिति सक्सेना कहती हैं, ‘आजकल स्कूलों में स्टाफ को एप्टीट्यूड टेस्ट के आधार पर भर्ती किया जाता है। यानी उनकी सब्जेक्ट नॉलेज चेक की जाती है। कोई टीचर मैथ्स में कितना अच्छा है, इंग्लिश में कितना अच्छा या हिंदी सब्जेक्ट का कितना ज्ञान है, केवल यही देखा जाता है। कोई भी स्कूल टीचर्स या अन्य स्टाफ को रिक्रूट करते हुए यह नहीं देखता कि उस टीचर का बच्चों के साथ व्यवहार कैसा है, उनसे कैसे बात करता है। वो बच्चों के साथ कनेक्ट कर पाता है या नहीं।’

अदिति कहती हैं कि टीचर्स और अन्य स्टाफ को भर्ती करते हुए एप्टीट्यूड के साथ-साथ साइको-मैट्रिक और पर्सनैलिटी टेस्टिंग भी की जानी चाहिए। वो कहती हैं कि अभी जो स्टाफ स्कूलों में हैं उनके पास बच्चों के साथ डील करने को लेकर किस तरह की ट्रेनिंग है, कोई नहीं जानता।

स्कूल में बच्चों को मारने-पीटने, उनके साथ दुर्व्यवहार या उनसे गलत तरीके से बात करने से बच्चे जिंदगी भर के लिए डैमेज हो जाते हैं। उनका आत्मविश्वास कम हो सकता है। कई बार इससे बच्चे इंट्रोवर्ट हो जाते हैं। इसके अलावा वो गुस्सैल और हिंसक भी हो सकते हैं। आप बच्चों को मारेंगे तो उन्हें लगेगा यही सॉल्यूशन है। वो भी अपने से कम उम्र के बच्चों को आगे चलकर मारेंगे।

अगर बच्चों को कोई बात समझानी है या अनुशासन फॉलो करवाना है, तो इस बारे में बच्चों से प्यार से बात करें। इसके अलावा अगर आप चाहते हैं कि बच्चा कोई नियम अपनाए तो सबसे पहले पेरेंट्स और टीचर्स को वह नियम अपने ऊपर लागू करना होगा।

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