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- Borea Majumdar Column: Team Trust Boosts Player Performance | Abhishek Sharma
38 मिनट पहले
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बोरिया मजुमदार सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा के सहलेखक और खेल पत्रकार
टी-20 विश्व कप फाइनल से पहले अभिषेक शर्मा किन भावनाओं से गुजर रहे होंगे? नाकामियों की शृंखला के बाद उनकी मनोदशा कैसी होगी? बढ़ते दबाव से वे कैसे निपटे होंगे? उन्होंने फाइनल को किस नजर से देखा होगा और उनकी रणनीति क्या रही होगी?
विश्व कप से पहले वे ऐसे खिलाड़ी लग रहे थे, जिनसे कुछ भी गलत नहीं हो सकता। हर बार जब वे क्रीज से निकलकर प्रहार करते, गेंद सीधे स्टैंड्स में जा गिरती। हर तरफ उन्हीं की चर्चा थी और इस टूर्नामेंट में भारत के तुरुप के पत्ते के रूप में उन्हें देखा जा रहा था। लेकिन जब उनके खाते में लगातार तीन शून्य जुड़ गए, तो दबाव में आना स्वाभाविक था।
खुद पर संदेह भी जरूर पैदा हुआ होगा। ऐसे में यह दौर उनके लिए एक कठिन परीक्षा जैसा रहा होगा। लेकिन खेल की प्रकृति ही ऐसी होती है कि यहां किसी को भी सब कुछ आसानी से नहीं मिलता। विश्व कप का यह अनुभव अंततः अभिषेक को एक बेहतर खिलाड़ी बनाएगा और मानसिक रूप से भी अधिक दृढ़ इंसान बनाएगा।
विश्व कप में दबाव असाधारण होता है। ऐसे में किसी युवा खिलाड़ी के लिए- जिस पर सबका फोकस हो- यह दबाव और अधिक होता है। खेल ने सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों की भी परीक्षा ली है और आगे भी लेता रहेगा। ऐसे में अभिषेक शर्मा के लिए जरूरी था कि वे जमीनी हकीकत को समझें, समझदारी से स्थिति का सामना करें, दबाव से निपटें और उसे अपने ऊपर हावी न होने दें।
यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही कठिन। और यहीं पर गौतम गम्भीर और टीम प्रबंधन की बड़ी भूमिका सामने आती है। उन्हें बाहर हो रहे शोर और सोशल मीडिया के हंगामे से अभिषेक को सुरक्षित रखना था, ताकि वे इन सब में उलझे बिना वर्तमान में बने रहें। भारत को भी अभिषेक का पूरा समर्थन करना था, क्योंकि उनमें निर्णायक प्रदर्शन करने की क्षमता है।
और फाइनल में यही हुआ। अभिषेक ने संयम से शुरुआत की, लेकिन पारी के तीसरे ओवर से उन्होंने हाथ खोलना शुरू कर दिया। उन्होंने प्रहारों की झड़ी लगा दी। विश्व कप फाइनल में उन्होंने मात्र 19 गेंदों में अपना अर्धशतक पूरा किया और पावरप्ले में भारत का स्कोर 75 से ऊपर पहुंचा दिया। उसी क्षण मैच लगभग आधा जीत लिया गया था। अभिषेक ने दबाव पर विजय पाई और भारत के लिए तब सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया, जब उसकी सबसे अधिक आवश्यकता थी।
अपने पाठकों को मैं सचिन तेंदुलकर का एक उदाहरण देना चाहूंगा। 2003 के एक-दिवसीय विश्व कप से पहले भारत न्यूजीलैंड दौरे पर गया था और सचिन ने तीन मैचों में 0, 1 और 1 रन बनाए थे। तब उनकी पत्नी अंजलि ने उनसे कहा था कि उनके स्कोर दिल्ली के एसटीडी कोड जैसे लग रहे हैं। लेकिन विश्व कप आते-आते हमने बिल्कुल अलग सचिन को देखा। उन्होंने दबाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया, सबसे कड़ी मेहनत से अभ्यास किया और वही सब किया, जो वे हमेशा करते आए थे।
अभिषेक को भी ठीक यही करने की जरूरत थी- सहज बने रहना और अपने खेल में कुछ भी बदलने की कोशिश न करना। आत्म-संशय हर खिलाड़ी के मन में आता है और शायद वे यह सोच रहे होंगे कि थोड़ा समय लेकर कुछ सिंगल्स ले लिए जाएं। फैसला पूरी तरह से उनका था। अगर इससे उन्हें सहजता मिलती, तो यही ठीक था; वरना उन्हें उसी अंदाज में खेलना जारी रखना था, जैसा कि वे खेलते आए हैं।
न्यूजीलैंड ने अभिषेक के खिलाफ ऑफ-स्पिन की रणनीति अपनाई। उन्होंने शुरुआत ग्लेन फिलिप्स से कराई और सोचा कि इस तरह उन्हें काबू में रखा जा सकता है। क्योंकि पाकिस्तान ने उन्हें सलमान अली आगा से आउट कराया था और नीदरलैंड्स ने भी पहले ओवर में आर्यन दत्त की मदद से सफलता पाई थी। लेकिन इस बार अभिषेक तैयार थे। उन्होंने धैर्य दिखाया और मौके का इंतजार किया। आक्रमण शुरू करने से पहले उन्हें खेल की परिस्थितियों का अंदाजा हो गया था।
सच तो यह है कि खिलाड़ियों को समर्थन की जरूरत होती है। क्षमतावान खिलाड़ी देर-सवेर अच्छा प्रदर्शन जरूर करते हैं। लेकिन इसके लिए धैर्य रखना पड़ता है और उन पर अनावश्यक दबाव नहीं डालना होता है। उन्हें सोशल मीडिया की चर्चाओं से बचाना भी जरूरी है।
खिलाड़ियों को समर्थन की जरूरत होती है। क्षमतावान खिलाड़ी देर-सवेर अच्छा प्रदर्शन जरूर करते हैं। लेकिन इसके लिए धैर्य रखना पड़ता है और उन पर अनावश्यक दबाव नहीं डालना होता है। सोशल मीडिया से बचाना भी जरूरी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)









