महाभारत में अर्जुन ने किया था सुभद्रा का हरण:  श्रीकृष्ण की बलराम को सीख- रिश्तों में कभी कोई निर्णय क्रोध में नहीं, बल्कि दूरदृष्टि और विवेक के साथ लेना चाहिए
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महाभारत में अर्जुन ने किया था सुभद्रा का हरण: श्रीकृष्ण की बलराम को सीख- रिश्तों में कभी कोई निर्णय क्रोध में नहीं, बल्कि दूरदृष्टि और विवेक के साथ लेना चाहिए

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8 घंटे पहले

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श्रीकृष्ण, बलराम और इनकी बहन सुभद्रा से जुड़ा किस्सा है। बलराम चाहते थे कि सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से हो। वे मानते थे कि ये गठबंधन कौरवों और यादवों के बीच मित्रता को मजबूत करेगा, लेकिन सुभद्रा अर्जुन से विवाह करना चाहती थीं।

अर्जुन उस समय वनवास में थे, अर्जुन द्वारका आए और श्रीकृष्ण से मिले। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मन की बात जान ली। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि पार्थ। सुभद्रा भी तुमसे विवाह करना चाहती है। तुम उसका हृदय जीत चुके हो। अब तुम्हें उसका हाथ भी जीतना होगा।

श्रीकृष्ण ने समझाया कि परिस्थिति मुश्किल है, लेकिन सच्चे प्रेम और योग्य निर्णय में साहस की आवश्यकता होती है। श्रीकृष्ण की अनुमति पाकर अर्जुन ने सुभद्रा का अपहरण किया।

जब ये बात यदुवंशियों को मालूम हुई तो बलराम क्रोधित हो गए। उन्होंने आदेश दिया कि युद्ध की तैयारी करो। अर्जुन ने हमारे कुल का अपमान किया है।

बलराम का आदेश मानकर यदुवंश के सभी योद्धा शस्त्र संभालने लगे, लेकिन श्रीकृष्ण मौन बैठे रहे।

श्रीकृष्ण को मौन देखकर बलराम ने पूछा कि कृष्ण। तुम मौन क्यों हो? तुम्हारे कहने पर हमने अर्जुन का सत्कार किया और आज उसने जिस थाली में खाया, उसी थाली में छेद कर दिया है।

श्रीकृष्ण बोले कि भैया, क्रोध में निर्णय कभी सही नहीं होता। सोचिए, अर्जुन को मार देंगे तो सुभद्रा विधवा हो जाएगी और अर्जुन कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। वह कुंतीपुत्र, महान धनुर्धर और धर्म का रक्षक है। क्या अपनी बहन का जीवन ऐसे व्यक्ति के साथ बंधना बुरा है?

उन्होंने आगे कहा कि रिश्तों का निर्णय केवल वर्तमान देखकर नहीं करना चाहिए। विवाह एक ऐसा बंधन है, जिसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य, तीनों का संतुलन देखना चाहिए। दुर्योधन का भविष्य तो अंधकारमय है; वह अहंकार में डूबा हुआ है, लेकिन अर्जुन का भविष्य उज्जवल है। वह धर्म के मार्ग है। सुभद्रा जैसी पवित्र आत्मा के लिए वही उचित है। इस समय अर्जुन के पास मेरा ही रथ है। मेरे ही अद्भुत घोड़े हैं। उससे युद्ध करना आसान नहीं है। हमें तो उसका स्वागत करना चाहिए कि हमारी बहन ने एक योग्य व्यक्ति को अपना जीवन साथी बनाया है।

श्रीकृष्ण की बातें सुनकर बलराम का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने कहा कि अर्जुन और सुभद्रा का रिश्ता स्वीकार कर लिया।

श्रीकृष्ण की सीख

श्रीकृष्ण का ये प्रसंग हमें संदेश दे रहा है कि क्रोध में कभी कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। केवल भावनाओं या परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेने से बचना चाहिए, बल्कि जरूरी निर्णय दूरदृष्टि और विवेक के साथ लेना चाहिए।

  • वर्तमान के साथ ही भविष्य पर भी ध्यान दें

कई बार हम किसी निर्णय में केवल वर्तमान को देखते हैं। जैसे पैसा, स्थिति या सुविधा, लेकिन सफल निर्णय वही होता है जो भविष्य में स्थिरता और संतोष लेकर आता है। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन की शक्ति नहीं, बल्कि उसके स्वभाव और कर्मों को देखा, जो उसे आगे चलकर विनाश की ओर ले जाने वाले थे। हमें भी वर्तमान के साथ ही भविष्य पर ध्यान देते हुए निर्णय लेना चाहिए।

  • भावनाओं में आकर नहीं, सोच-विचार कर निर्णय लें

क्रोध, अहंकार या आवेश में लिया गया निर्णय हमें अक्सर पछतावा देता है। बलराम क्षणिक क्रोध में युद्ध करना चाहते थे, लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें संयम और समझदारी का मार्ग दिखाया। हमें जरूरी निर्णय भावनाओं में आकार या क्षणिक आवेश में नहीं लेना चाहिए, बल्कि शांत मन से सोच-विचार करके निर्णय लेने से भविष्य में सफलता मिलने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।

  • रिश्तों में योग्यता और संस्कार पर भी ध्यान दें

विवाह हो या कोई साझेदारी, रिश्तों से जुड़े निर्णय लेते समय व्यक्ति का चरित्र, सोच, संस्कार और दृष्टिकोण भी ध्यान दें। योग्यता केवल बाहरी नहीं होती, बल्कि वह संस्कारों से भी झलकती है।

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