मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:  अमेरिका अब हमें भी भविष्य का प्रतिस्पर्धी मानने लगा है
टिपण्णी

मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम: अमेरिका अब हमें भी भविष्य का प्रतिस्पर्धी मानने लगा है

Spread the love




पिछले हफ्ते हुए रायसीना डायलॉग में अमेरिका के डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट क्रिस्टोफर लैंडाउ ने भारत को ‘असीमित संभावनाओं वाला देश’ बताया, लेकिन एक चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा, ‘भारत को समझना चाहिए कि हम वो भूल नहीं दोहराएंगे, जो हमने 20 साल पहले चीन के साथ की थी। हम जानते हैं कि आप व्यावसायिक चीजों में हमसे आगे निकल रहे हैं।’ उनकी बात का लब्बोलुआब ये था कि अमेरिका अब भारत को भी भविष्य का प्रतिस्पर्धी मानने लगा है। 1980 और 1990 के दशक में शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने सोवियत संघ का सामना करने के लिए चीन की तकनीकी क्षमताएं विकसित करने में मदद की थी। इसका उद्देश्य इन दोनों कम्युनिस्ट ताकतों के बीच दूरी पैदा करना भी था। 1980 तक चीन एक गरीब देश था। उसकी जीडीपी 0.19 ट्रिलियन डॉलर और प्रति व्यक्ति आय 195 डॉलर ही थी। तब अमेरिका ने सोचा भी नहीं था कि कुछ ही दशकों में चीन उसके दबदबे लिए सोवियत संघ से भी बड़ा खतरा बन जाएगा। चीन को लेकर यही गलत आकलन अमेरिका को आज भी खटकता है। अमेरिका ने तब अत्याधुनिक वाणिज्यिक और सैन्य तकनीकों पर काम कर रहीं अपनी प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों में चीनी वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों को बेरोकटोक पहुंच दे दी थी। 1980 के दशक में चीनी नेता देंग शियाओपिंग ने अपने नागरिकों से कहा था कि ‘अपनी ताकत छिपाकर रखो और सही समय का इंतजार करो।’ और वो समय अमेरिका की अपेक्षा से कहीं पहले आ गया। 2014 तक चीन की जीडीपी 10.48 ट्रिलियन डॉलर हो गई, जिसमें 1980 की तुलना में 54 गुना वृद्धि हुई। इससे हैरान अमेरिका ने वही पुरानी रणनीति अपनाई- चीन के सामने भी एक संतुलनकारी ताकत खड़ी करना। भारत तब सबसे स्वाभाविक विकल्प था। उसकी आबादी चीन के बराबर थी, अर्थव्यवस्था सालाना 7% से अधिक की दर से बढ़ रही थी। भारत अपनी अर्थव्यवस्था खोल चुका था। उसका उपभोक्ता बाजार बड़ा था। अमेरिका समेत अन्य पश्चिमी देशों के हथियारों से भारतीय सेना आधुनिक हो रही थी। भारत के साथ एक अतिरिक्त फायदा यह भी था कि उसकी व्यापार, विज्ञान और न्याय व्यवस्था की भाषा अंग्रेजी थी। भारत, अमेरिका के लिए हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में वही उद्देश्य पूरे करता था, जैसे उत्तरी अटलांटिक में नाटो। इन दोनों अहम क्षेत्रों में रूस-चीन धुरी का मुकाबला करना अमेरिकी विदेश नीति का मुख्य आधार बन गया। ऐसे में भारत अमेरिका की भू-राजनीतिक रणनीति में फिट बैठा। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी रक्षा तकनीक की मांग की और वे क्वाड के समर्थक थे- जो हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका की सदस्यता वाली सुरक्षा संरचना है। लेकिन मोदी को दोनों ओर सावधानी बरतना पसंद है। वे समझ गए थे कि अमेरिका चाहता है भारत चीन के सामने संतुलनकारी की भूमिका निभाए, लेकिन वे अपने विकल्प खुले रखना चाहते थे। 2014 से 2019 के बीच मोदी तीन अनौपचारिक समिटों में शी जिनपिंग से मिले, ताकि अमेरिका और चीन से त्रिकोणीय रिश्ते में भारत की रणनीति तय कर सकें। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि फिलहाल तो दोनों महाशक्तियों से समान दूरी बनाए रखना ही हितकर होगा। लेकिन चीन बिल्कुल अलग निष्कर्ष पर पहुंचा। शी को मोदी का दोनों से समान दूरी बनाने का रवैया अस्वीकार था। इसके बाद गलवान का संघर्ष हुआ। भारत के विकल्प अब सीमित थे। चीन ऐसा दुश्मन था, जिसके पाकिस्तान से करीबी सैन्य रिश्ते थे। शी की आक्रामकता ने भारत को अमेरिका के और करीब ला दिया। अपने पहले कार्यकाल में ट्रम्प ने मोदी से घनिष्ठता दिखाई। 2019 में ह्यूस्टन में ‘हाउडी मोदी’ रैली हुई और 2020 में ट्रम्प भारत भी आए। लेकिन दूसरे कार्यकाल में बदलाव आया। ट्रम्प पाकिस्तान की ओर झुके और भारत पर टैरिफ लगाया गया। 1970 और 80 के दशक में जब अमेरिका सोवियत संघ के खिलाफ चीन को लुभा रहा था तो वह पाकिस्तान को भी हथियार दे रहा था। वह दौर कभी खत्म नहीं हुआ था, बस रणनीतिक कारणों से उस पर थोड़ा परदा डाल दिया गया था। आज वही दौर फिर से सामने है। जैसे-जैसे भारत की आर्थिक, तकनीकी और सैन्य ताकत बढ़ रही है, अमेरिका को लग रहा है कि 20 साल बाद भारत भी अमेरिका के लिए आज के चीन जैसा बड़ा प्रतिस्पर्धी होगा। जैसे-जैसे भारत की आर्थिक, तकनीकी और सैन्य ताकत बढ़ रही है, अमेरिका को लग रहा है कि 20 साल बाद भारत भी अमेरिका के लिए प्रतिस्पर्धी होगा। अतीत में भी अमेरिका चीन को लेकर इस स्थिति का सामना कर चुका है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *