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बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने जा रहे चुनाव में तीन ताकतें मैदान में हैं। पहली, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार, जिसे पाकिस्तान से जुड़े इस्लामिक समूहों का समर्थन है। दूसरी, बीएनपी, जिसकी कमान पिछले ही माह दिवंगत हुई खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के हाथों में है। तीसरी, वो विदेशी ताकतें, जो बांग्लादेश की अस्थिरता में अपने हित साध रही हैं। इनमें चीन और पाकिस्तान भारत-विरोधी तत्वों का समर्थन करते हैं। फिर अमेरिका है, जो हसीना सरकार की जगह अपने अनुकूल शासन चाहता है। शेख हसीना सरकार ने वर्षों तक अमेरिका को बंगाल की खाड़ी स्थित सेंट मार्टिन द्वीप तक पहुंच बनाने से रोके रखा था। म्यांमार से केवल पांच किलोमीटर दूर इस द्वीप का गहरा भू-रणनीतिक महत्व है। गए साल शेख हसीना के पलायन के बाद से भारत ने यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार के साथ सीधे टकराव के बजाय शांत कूटनीति को प्राथमिकता दी। लेकिन हसीना को शरण देने से इस्लामवादी नियंत्रण वाली यूनुस सरकार भारत से नाराज हो गई। हसीना का 15 वर्ष का शासन भारत-बांग्लादेश संबंधों में सबसे उत्पादक और सौहार्दपूर्ण रहा है। इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा उन्हें जबरन हटाया जाना भारत के लिए बड़ा झटका था। हालांकि, ब्रह्मपुत्र और गंगा के जल प्रवाह पर नियंत्रण और बांग्लादेश को पावर ग्रिड से बिजली सप्लाई के चलते भारत आज भी बांग्लादेश पर दबाव बनाए रखने की हैसियत में है। चुनाव नजदीक आते ही हसीना मुखर हो गई हैं। ढाका छोड़ने के बाद पिछले सप्ताह अपने पहले सार्वजनिक भाषण में उन्होंने बांग्लादेशियों से यूनुस सरकार और उनके कट्टरपंथी समर्थकों को उखाड़ फेंकने की अपील की। भारत बीएनपी की जीत की उम्मीद कर रहा है। ओपिनियन पोल्स में बीएनपी को 70% से अधिक समर्थन मिल रहा है। बीएनपी अतीत में भारत-विरोधी रही है, लेकिन रहमान के नेतृत्व में पार्टी ने धर्मनिरपेक्ष, बहुलतावादी, आर्थिक विकास पर केंद्रित और भारत से सहयोग रखने वाली सरकार चलाने की प्रतिबद्धता जाहिर की है। बीएनपी की मुख्य प्रतिद्वंदी जमात-ए-इस्लामी (जेईआई) है। बीएनपी और जमात के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें शुरू हो चुकी हैं। हसीना की अवामी लीग के खिलाफ पहले दोनों ही दल सहयोगी थे, लेकिन अब लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। जहां बीएनपी कट्टर इस्लामवाद से मध्यमार्गी विचारधारा की ओर आई है, वहीं जमात विषैले कट्टरपंथ की ओर बढ़ी है। जमात के संयोजक नाहिद इस्लाम ने टी-20 विश्व कप में भारत में मैच नहीं खेलने संंबंधी सरकारी फैसले में अहम भूमिका निभाई थी। नतीजतन, बांग्लादेश की जगह स्कॉटलैंड की टीम को शामिल किया गया। बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावना तब चरम पर आ गई, जब आईपीएल से तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को हटा दिया गया। भारत-विरोधी गुस्सा इतना गहरा था कि इससे बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड को भारी वित्तीय नुकसान तक उठाना पड़ा। मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार ‘जो टीमें टूर्नामेंट में दूसरे दौर से आगे नहीं बढ़तीं, उन्हें भी 3,82,500 डॉलर की इनामी राशि मिलती है। 9वें से 12वें स्थान पर रहने वाली टीमों को 2,47,500 डॉलर मिलते हैं। 13वें से 20वें स्थान पर रहने वाली टीमों को 2,25,000 डॉलर मिलते हैं। मैच जीतने पर हर टीम को 31,154 डॉलर अतिरिक्त मिलते हैं। हिस्सा लेने वाली टीमों को आईसीसी तीन से पांच लाख डॉलर तक की फीस भी देता है, जो स्थानीय क्रिकेट बोर्ड को जाती है।’ आम चुनाव से पहले भारत ने बांग्लादेश के साथ तनाव घटाने की कोशिश की है। लेकिन चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री पद संभालने वाले किसी भी व्यक्ति के प्रति भारत को सख्त रवैया अपनाने की जरूरत होगी। यहां दांव पर बहुत कुछ लगा है। हमारे यहां पश्चिम बंगाल और असम में लाखों बांग्लादेशी शरणार्थी रह रहे हैं। इस बीच, पाकिस्तान बांग्लादेश में नया भारत-विरोधी ‘पूर्वी पाकिस्तान’ बनाने की कोशिश में है। चीन बांग्लादेश में बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओं की तैयार कर रहा है। अमेरिका ने भी बांग्लादेश में सक्रियता बढ़ा दी है। क्या रहमान की बीएनपी वास्तव में एक समावेशी और सुधारवादी सरकार बना पाएगी? शेख हसीना इस पर आश्वस्त नहीं हैं। लेकिन भारत उम्मीद करेगा कि निर्वासन में बिताए एक दशक ने बीएनपी के रहमान का रुख नरम किया होगा। जमात जैसे कठोर इस्लामवादी विपक्ष के सामने रहमान को चरमपंथ के बजाय मध्यमार्गी विचारधारा से शासन चलाने पर मजबूर होना पड़ेगा। भारत बीएनपी की जीत की उम्मीद कर रहा है। यह अतीत में भारत-विरोधी पार्टी रही है, लेकिन हाल में इसने धर्मनिरपेक्ष, बहुलतावादी, विकास पर केंद्रित और भारत से सहयोग रखने वाली सरकार चलाने की प्रतिबद्धता जाहिर की है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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