मेंटल हेल्थ– कभी एक दाना चीनी नहीं:  तो कभी आइसक्रीम का पूरा डिब्बा, स्ट्रेस में खाती हूं बहुत सारा, क्या ये मेंटल हेल्थ इश्यू है
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मेंटल हेल्थ– कभी एक दाना चीनी नहीं: तो कभी आइसक्रीम का पूरा डिब्बा, स्ट्रेस में खाती हूं बहुत सारा, क्या ये मेंटल हेल्थ इश्यू है

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6 घंटे पहले

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सवाल– क्या इमोशनल ईटिंग भी कोई मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर है? मेरी उम्र 31 साल है और मैं कोटा, राजस्थान से हूं। फूड के साथ मेरा रिश्ता बहुत कॉम्प्लिकेटेड है।

कभी तो मैं एक्स्ट्रीम हेल्थ कॉन्शस रहती हूं। कार्ब, शुगर बिल्कुल नहीं खाती, और कभी इतने ज्यादा एक्स्ट्रीम में पहुंच जाती हूं कि आधा किलो आइसक्रीम की पूरी बकेट एक साथ खा जाती हूं। ढेर सारी चॉकलेट एक साथ खा लेती हूं। दो-तीन दिन तक रोज सिर्फ पिज्जा ही ऑर्डर कर रही होती हूं।

ऐसा तब होता है, जब मैं इमोशनली स्ट्रेस्ड होती हूं। हालांकि कई बार समझ में भी नहीं आता कि स्ट्रेस है या नहीं, लेकिन मैं बहुत ज्यादा शुगर, कार्ब्स खा रही होती हूं। मुझे पता है कि इसका असर मेरी हेल्थ पर भी पड़ता है। मैं सिर्फ ये समझना चाहती हूं कि क्या ये कोई मेंटल हेल्थ इशु है। क्या मुझे काउंसलर के पास जाने या थेरेपी लेने की जरूरत है। प्लीज, गाइड मी।

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर

सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आपने जिस तरह से अपने सवाल को फ्रेम किया है, उससे समझ में आता है कि आप खुद इस समस्या को लेकर सजग हैं और सही सवाल पूछ रही हैं ताकि और क्लैरिटी हासिल कर सकें। तो चलिए, ईटिंग डिसऑर्डर के सभी पहलुओं को समझने की कोशिश करते हैं।

क्या यह मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम है?

आपके सवाल की शुरुआत ही इस सवाल के साथ होती है कि “क्या इमोशनल ईटिंग भी कोई मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर है?”

देखिए, हमारा भोजन और फीलिंग्स, दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। भोजन के साथ प्यार, खुशी, दुख, गुस्सा, नाराजगी, बचपन की, घर की यादें जुड़ी होती हैं। लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि हर इमोशनल ईटिंग किसी मेंटल हेल्थ से जुड़ी नहीं होती और न ही मेंटल हेल्थ इशुज का कारण बनती है।

आपने जो लिखा है, उसमें तीन संभावनाएं दिखती हैं:

1. इमोशनल ईटिंग (एक कॉमन बिहेवियर पैटर्न)

  • स्ट्रेस, अकेलेपन, बोरियत या निराशा की स्थिति में ज्यादा खाने लगना। भोजन की मात्रा बढ़ना।
  • इमोशनल ईटिंग में खाने की मात्रा बढ़ती है, पर लेकिन खाने पर से कंट्रोल पूरी तरह खत्म नहीं होता।
  • ज्यादा खाने के बाद थोड़ा पछतावा जरूर होता है, लेकिन यह गिल्ट बहुत ज्यादा नहीं होता।
  • यहां पर इमोशनल ईटिंग एक तरह की कोपिंग हैबिट होती है।
  • यह मानसिक बीमारी नहीं है, लेकिन एक तरह का अनहेल्दी कोपिंग स्टाइल जरूर है।

2. हैबिचुअल ओवरईटिंग (आदत के कारण ओवरईटिंग)

  • लंबे समय से बनी एक आदत, जैसे रात में मिठाई खाना, टीवी देखते हुए कुछ-न-कुछ स्नैक्स खाते रहना।
  • इस ईटिंग पैटर्न में इमोशंस का ज्यादा रोल नहीं होता।
  • यह ज्यादातर रूटीन और लाइफस्टाइल हैबिट की बात है।
  • हैबिचुअल ओवरईटर होने पर ओवरईटिंग के एपिसोड नहीं होते।
  • व्यक्ति रोज और हमेशा एक ही पैटर्न में ओवरईटिंग या अनहेल्दी ईटिंग कर रहा होता है।

3. बिंज ईटिंग डिसऑर्डर (BED)

यह एक मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर है। इसकी इस रूप में मनोवैज्ञानिकों के द्वारा पहचान की गई है। बिंज ईटिंग डिसऑर्डर को आइडेंटीफाई करना जरूरी है क्योंकि ट्रीटमेंट और काउंसलिंग के जरिए इसे ठीक किया जा सकता है।

BED के लक्षण कुछ इस तरह दिखते हैं-

  • कम समय में असामान्य रूप से बहुत ज्यादा खाना।
  • खाने पर से कंट्रोल बिल्कुल खत्म हो जाना। जैसेकि “एक बार खाना शुरू किया तो रुका ही नहीं गया, बस खाते ही चले गए।”
  • खाने के बाद बहुत शर्म, अपराधबोध महसूस होना।
  • खाने के बाद शरीर में अपने भीतर असंतुष्टि महसूस होना।
  • इस तरह का एपिसोड हफ्ते में कम-से-कम एक बार होना।
  • 3 महीने से ज्यादा समय तक बार-बार यह एपिसोड रिपीट होना।
  • अपना यह ईटिंग पैटर्न दूसरों से छिपाना। इस बारे में बात न करना।
  • बिंज ईटिंग एपिसोड के दौरान बहुत तेज स्पीड में खाना।

आपने अपने सवाल में लिखा है-

  • “मैं आइसक्रीम की पूरी की पूरी बकेट खा जाती हूं।”
  • “बार-बार पिज्जा ऑर्डर करती हूं।”
  • “मीठे पर कंट्रोल नहीं रहता।”
  • “यह अक्सर तब होता है, जब मैं इमोशनली स्ट्रेस्ड होती हूं।”

ये सारे संकेत इमोशनल ईटिंग के ऊपर जाकर बिंज ईटिंग पैटर्न की ओर इशारा कर रहे हैं। लेकिन इसे पूरी तरह से BED तभी कहा जा सकता है, जब आपकी कंडीशन ऊपर लिखे आठों मानदंडों को पूरा करती हो।

क्या आपका ईटिंग पैटर्न हेल्दी है?

एक सेल्फ असेसमेंट टेस्ट

यहां आपको एक टेस्ट करना है। नीचे ग्राफिक में एक एसेसमेंट टेस्ट है। टेस्ट के तीन हिस्से हैं-

A. इमोशनल ईटिंग

B. हैबिट ईटिंग

C. बिंज ईटिंग पैटर्न

टेस्ट में कुल 12 सवाल हैं। आपको इन सवालों को ध्यान से पढ़ना है और 0 से 3 के स्केल पर इसे रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल का आपका जवाब अगर ‘नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘हमेशा’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें।

A, B और C सेक्शन के अलग-अलग स्कोर इंटरप्रिटेशन नीचे दिए हैं। अगर तीसरे सेक्शन C में आपका स्कोर 12 से ज्यादा है तो इसका मतलब है कि आपको किसी प्रोफेशनल काउंसलर से हेल्प लेने की जरूरत है।

क्या आपको थेरेपिस्ट की जरूरत है?

आपके पैटर्न में दो बातें महत्वपूर्ण हैं-

1. कभी बहुत ज्यादा कंट्रोल, कभी बहुत ज्यादा ओवरईटिंग।

यह ‘All-or-nothing eating style’ कहलाता है यानी या तो कुछ भी गलत न खाना या फिर बिना लिमिट के सबकुछ बस खाते जाना।

यह पैटर्न BED (बिंज ईटिंग डिसऑर्डर) और इमोशनल ईटिंग, दोनों में दिखता है।

2. आपने लिखा है- “कई बार समझ में भी नहीं आता कि स्ट्रेस है या नहीं।”

यह संकेत देता है कि आप इमोशनल सिगनल्स को आइडेंटीफाई नहीं कर पा रही हैं। इसे “इमोशनल मिसलेबलिंग” कहा जाता है।

मेरी प्रोफेशनल राय ये है कि-

  • यह काउंसलर/कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपिस्ट (CBT) से बात करने का सही समय है।
  • अभी स्थिति “शुरुआती स्टेज” में है। यह अपने बिहेवियर पैटर्न को समझने, बदलने और सुधारने का सबसे अच्छा समय है।

4 सप्ताह का CBT आधारित सेल्फ हेल्प प्लान

सप्ताह 1

जागरूक होना, पैटर्न ब्रेक करना

उद्देश्य: ट्रिगर को पहचानना, एक स्थाई रूटीन बनाना

1. ईटिंग लॉग बनाएं। दिन में 3 बार एक डायरी में ये चीजें नोट करें-

  • भूख का स्तर (0 से 10 पर रेट करें।)
  • ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर में क्या खाया।
  • इमोशन (एक शब्द में अपना इमोशन लिखें। जैसे- तनाव/थकान/अकेलापन/बोरियत/कुछ नहीं)
  • खाने के बाद कैसा महसूस हुआ?

2. 3 मील + 2 स्नैक्स का स्ट्रक्चर बनाएं।

  • यानी पहले से तय करें कि ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर में क्या खाएंगे।
  • इसके अलावा दो बार स्नैक्स कब लेंगे और उसमें क्या खाएंगे।
  • लंबे गैप न छोड़ें।
  • इसका मकसद है ब्लड शुगर लेवल को स्थिर करना और खाने की इच्छा को कम करना।

3. हर बार क्रेविंग होने पर जरा ठहरें और देखें। खाने की क्रेविंग होने पर अपने इमोशन को आइडेंटीफाई करें। इसका नाम है HALT टेस्ट।

H: Hungry (भूख)

A: Angry/Anxious (गुस्सा, चिंता)

L: Lonely (अकेलापन)

T: Tired (थकान)

→ H का मतलब है कि खाना है।

→ अगर कोई और इमोशन है तो 10 मिनट रुककर सोचना है।

सप्ताह 2:

इमोशनल स्किल ट्रेनिंग

उद्देश्य: भावनाओं को पहचानना, कोपिंग के दूसरे तरीके ढूंढना

  • जब भी भूख से इतर किसी अन्य इमोशनल ट्रिगर के कारण खाने की इच्छा हो तो उससे निपटने के लिए दूसरे विकल्प ढूंढें।
  • इसका मकसद फूड की इच्छा (Urge) को कम करना है।
  • यह इच्छा एक लहर की तरह आती और जाती है। इसकी अवधि 10 से 20 मिनट की होती है।
  • एक बार यह वेव खत्म हो जाए तो खाने की इच्छा नहीं होती।

नीचे 5 ऐसे विकल्पों की लिस्ट दे रहे हैं। जब खाने का मन हो तो इनमें से कोई भी एक काम करें।

  • 5 मिनट वॉक करें
  • ठंडा पानी पिएं
  • लंबी, गहरी सांस लें।
  • किसी दोस्त को मैसेज करें।
  • कोई पसंदीदा म्यूजिक सुनें।

इन वैकल्पिक कामों का मकसद उस तात्कालिक अर्ज से निपटना है। जैसे फर्ज करिए कि आपका मिठाई खाने का मन कर रहा है तो अपने मन में आ रहे विचारों पर ध्यान दीजिए और उन्हें रिकॉर्ड करिए-

ऑटोमैटिक विचार- “मिठाई खाने का मन है। मुझे अभी मिठाई चाहिए।”

बैलेंस्ड विचार- “मुझे बहुत थकान हो रही है। मुझे थोड़ा आराम और सूदिंग फीलिंग चाहिए, मिठाई नहीं।”

सप्ताह 3

All-or-Nothing Rule को तोड़ना

उद्देश्य: “100% कंट्रोल vs 0% कंट्रोल” का साइकल खत्म करना।

1. मीठे से पूरी तरह परहेज न करें। चीनी खाएं, लेकिन संतुलन में।

रोज खुद को थोड़ी सी शुगर खाने की परमिशन दें। जैसे-

  • दो क्यूब चॉकलेट
  • आधा कप आइसक्रीम
  • एक छोटा टुकड़ा मिठाई

नोट- जब कोई चीज पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं रहती तो उसे खाने की इच्छा भी कम हो जाती है।

2. भोजन की थाली को संतुलित करें। 1-2-3 का रूल अपनाएं।

1- एक हिस्सा प्रोटीन

2- दो हिस्सा सब्जियां

3- एक छोटा हिस्सा कार्ब और हेल्दी फैट

3. पॉजिटिव ईटिंग स्टेटमेंट

खुद से रोज कुछ ऐसे सकारात्मक वाक्य कहें-

“मैं खाने को पनिशमेंट या रिवॉर्ड नहीं बनाऊंगी।”

“मैं बैलेंस्ड खाना खाकर अपने शरीर का सम्मान कर रही हूं।”

सप्ताह 4

रिलैप्स को रोकना + लॉन्ग टर्म प्लान

उद्देश्य: इस पैटर्न को स्थायी बनाना

1. हर हफ्ते रिव्यू करें।

  • कौन सा इमोशनल ट्रिगर स्ट्रांग था।
  • कौन सी कोपिंग स्ट्रेटजी ज्यादा प्रभावी रही।

2. 3 स्टेप्स का इमरजेंसी प्लान बनाएं।

  • स्टेप 1- खाने की इच्छा को 5 मिनट डिले करें।
  • स्टेप 2- एक गिलास पानी पिएं और थोड़ा वॉक करें।
  • स्टेप 3- किसी दोस्त को मैसेज या कॉल करें।

3. सेल्फ कंपैशन का अभ्यास करें। खुद से कहें-

“ये बिंज ईटिंग एपिसोड कोई नकारात्मक बात नहीं है। ये मेरे लिए सीखने का मौका है।”

4. कब थेरेपिस्ट से मिलना चाहिए-

✔ अगर बिंज ईटिंग एपिसोड हफ्ते में 1–2 बार हो रहा हो।

✔ अगर शर्म/गिल्ट की भावना बढ़ रही हो।

✔ अगर बॉडी वेट में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव हो।

✔ अगर खाना पूरी तरह नियंत्रण से बाहर महसूस हो।

निष्कर्ष

ऊपर जो चार हफ्तों का सेल्फ हेल्प प्लान दिया है, उसे अगले एक महीने फॉलो करके देखें। मुझे उम्मीद है कि आपको मदद जरूर मिलेगी।

……………………

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