गौरव पाठक2 घंटे पहले
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भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में पैनोरमिक सनरूफ और उनसे जुड़े फीचर्स की मांग तेजी से बढ़ी है। कभी सिर्फ प्रीमियम गाड़ियों तक सीमित रहने वाला यह फीचर अब मिड-सेगमेंट कारों में भी उपलब्ध कराया जा रहा है और इसे लग्जरी व सुविधा का प्रतीक बनाकर बेचा जा रहा है। लेकिन इसकी बढ़ती लोकप्रियता के साथ उपभोक्ता शिकायतों की भी बाढ़-सी आ गई है, जैसे पानी का रिसाव, लगातार आने वाली आवाज आदि। इससे यहां एक अहम कानूनी सवाल भी खड़ा होता है: किन मामलों में यह समस्या उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट (निर्माण-दोष) मानी जाएगी?
क्या है लीगल फ्रेमवर्क?
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(10) में ‘दोष’ को गुणवत्ता, प्रदर्शन या मानक में किसी भी तरह की कमी के रूप में इस तरह से परिभाषित किया गया है, जिसे कानून या अनुबंध के तहत पूरा किया जाना चाहिए। धारा 2(11) ‘सेवा में कमी’ की परिभाषा देती है। धारा 39 के तहत उपलब्ध उपायों में रिफंड, रिप्लेसमेंट, मरम्मत और मुआवजा शामिल हैं।
अदालतों ने बार-बार यह जोर दिया है कि सामान्य मरम्मत योग्य समस्याओं और वास्तविक दोषों में फर्क किया जाना चाहिए। सुशील कुमार गबगौत्रा मामले में (2006) सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वाहन के रिप्लेसमेंट के आदेश केवल तभी दिए जा सकते हैं, जब कोई गंभीर निर्माण-दोष साबित हो। सिर्फ बार-बार आने वाली शिकायतों के आधार पर ऐसे आदेश नहीं दिए जा सकते। या तो दोष स्वयंसिद्ध हो या फिर ऐसे मामलों में दोष को साबित करने के लिए आमतौर पर विशेषज्ञ की गवाही जरूरी होती है।
बार-बार वर्कशॉप जाने की जरूरत पर मुआवजा
मिताली अग्रवाल (2014) मामले में उपभोक्ता ने एक कार की सनरूफ से पानी टपकने, स्टीयरिंग में शोर और स्पॉइलर के फीके पड़ने की शिकायत की थी। आयोग ने पाया कि प्रत्येक शिकायत वारंटी सेवा के दौरान तुरंत ठीक कर दी गई थी। चूंकि कोई समस्या स्थायी नहीं थी, इसलिए निर्माण-दोष साबित नहीं हुआ। फिर भी चूंकि उपभोक्ता को बार-बार वर्कशॉप जाना पड़ा और इससे होने वाली असुविधा के लिए कार कंपनी को उपभोक्ता को एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
कंट्रोल मॉड्यूल्स खराब, 10 लाख का मुआवजा
एच.जी. जैन (2025) का प्रकरण शायद सबसे गंभीर मामला था, जिसमें एक कार की सनरूफ से पानी का रिसाव हुआ और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल मॉड्यूल्स खराब हो गए। बार-बार कोशिशों के बावजूद समस्या ठीक नहीं हो पाई और लग्जरी कार पूरी तरह अनुपयोगी हो गई। आयोग ने इसे स्पष्ट निर्माण-दोष माना और यह कहते हुए 10 लाख रुपए का एकमुश्त मुआवजा दिया गया कि प्रीमियम कार खरीदने वाले उपभोक्ताओं को ट्रबल-फ्री परफॉर्मेंस की उचित उम्मीद होती है।
सेकंड-हैंड कार के खरीदार को पूरी राहत नहीं
एक सेकंड-हैंड कार के खरीदार (2018 का मामला) ने सनरूफ समेत बार-बार आने वाली समस्याओं की शिकायत की। आयोग ने वाहन के डेप्रीशिएशन को ध्यान में रखते हुए खरीद रकम का केवल 50 फीसदी रिफंड करने का आदेश दिया। चूंकि उपभोक्ता सेकंड-हैंड खरीदार था और गाड़ी पहले से पुरानी थी, इसलिए उसे पूरी राहत नहीं दी गई।
फैसलों से निकलकर आए ये बड़े सिद्धांत
1. छोटे और बड़े दोष का फर्क: अगर सनरूफ की समस्या केवल मरम्मत योग्य है (जैसे सील बदलना या एडजस्टमेंट करना) तो इसे सेवा में कमी (सर्विस डेफिशिएंसी) माना जाता है। लेकिन अगर रिसाव लगातार हो या सुरक्षा पर असर डाले तो इसे निर्माण-दोष (मैन्युफैक्चिंग डिफेक्ट) माना जाएगा।
2. लग्जरी कारों से अपेक्षाएं: महंगी गाड़ियों के मामले में उपभोक्ता फोरम अधिक सख्त रुख अपनाते हैं। जैसा कि एच.जी. जैन मामले में देखा गया, लाखों रुपए खर्च करने वाले खरीदार न सिर्फ बुनियादी कार्यक्षमता चाहते हैं, बल्कि भरोसेमंद और पीस ऑफ माइंड प्रदर्शन की अपेक्षा रखते हैं।
3. विशेषज्ञ साक्ष्य की भूमिका: स्वतंत्र तकनीकी रिपोर्टें अक्सर फैसले को प्रभावित करती हैं। प्रिंस बंसल (2019) मामले में आयोग ने विशेषज्ञ निरीक्षण पर भरोसा किया था।
4. निर्माता की जवाबदेही: डीलर अक्सर जिम्मेदारी से बचते हैं, लेकिन अंततः जिम्मेदारी निर्माता पर ही आती है। अगर दोष प्रणालीगत (सिस्टेमिक) है तो वे किसी डिस्क्लैमर की आड़ नहीं ले सकते।
(लेखक सीएएससी के सचिव भी हैं।)








