रसरंग में ट्रेवल:  वैकुंठ महोत्सव में यहां हर साल भाग लेते हैं 10 लाख भक्त
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रसरंग में ट्रेवल: वैकुंठ महोत्सव में यहां हर साल भाग लेते हैं 10 लाख भक्त

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पर्णश्री देवी1 घंटे पहले

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श्री रंगनाथस्वामी मंदिर परिसर में स्थित 1000 खंभों वाला विशालकाय सभागृह। - Dainik Bhaskar

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर परिसर में स्थित 1000 खंभों वाला विशालकाय सभागृह।

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर दुनिया के सबसे विशिष्ट और मनोहारी हिंदू मंदिरों में से एक है। यह तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के श्रीरंगम में स्थित है। इसे कई नामों जैसे थिरुवारंग तिरुपति, पेरियाकोइल, भूलोक वैकुंठम और भोगमंडपम से जाना जाता है। यह मंदिर भगवान विष्णु के शयन मुद्रा वाले रूप ‘भगवान रंगनाथ’ को समर्पित है और करोड़ों भक्तों के लिए आस्था का एक प्रमुख केंद्र है, साथ ही धार्मिक पर्यटन का मुख्य स्थल भी। यह भव्य द्रविड़ वास्तुकला का प्रतिनिधित्व करता है। यहां हर साल 21 दिन तक चलने वाला वार्षिक वैकुंठ एकादशी महोत्सव मनाया जाता है, जिसमें 10 लाख से भी अधिक भक्त भाग लेते हैं।

सबसे ऊंचा गोपुरम यह पूरा मंदिर परिसर 155 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। मंदिर का राजगोपुरम यानी मुख्य प्रवेश द्वार वास्तुकला और इंजीनियरिंग का जबरदस्त चमत्कार है। 237 फीट ऊंचा और 11 मंजिलों वाला यह गोपुरम दक्षिण भारत का सबसे ऊंचा गोपुरम माना जाता है। इसका निर्माण मूलत: 9वीं सदी में गंगा वंश द्वारा किया गया था। यह मंदिर कई बार आक्रमणों और प्राकृतिक आपदाओं के कारण नष्ट हुआ और फिर इसका पुनर्निर्माण भी हुआ। खासकर 14वीं सदी में इस्लामी और यूरोपीय आक्रांताओं के हमलों के बावजूद यह मंदिर आज भी अडिग खड़ा है और साहस तथा भक्ति की कहानियां सुनाता है।

एक परिसर में 81 मंदिर मंदिर परिसर में विभिन्न देवी-देवताओं के 81 मंदिर, 21 भव्य गोपुरम और 39 भव्य मंडपम (सभागृह) स्थित हैं। यहां के सबसे प्रसिद्ध आकर्षणों में एक है 1000 खंभों वाला सभागृह, जो पूरी तरह ग्रेनाइट से बना है। इन स्तंभों पर योद्धाओं और देवताओं की एक ही पत्थर से बनी मूर्तियां लगी हुई हैं। हॉल के केंद्र में स्थित जलकुंड धार्मिक और वास्तुशिल्पीय दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

आभा से आलोकित मुख्य प्रतिमा यहां भगवान रंगनाथ की जो शयन मुद्रा में मूर्ति है, वह पारंपरिक पत्थर की नहीं, बल्कि एक विशेष मिश्रण से बनी है, जिसे “थैलम’ कहा जाता है। इसमें केसर, कपूर, शहद, गुड़ और चंदन जैसे तत्व मिले हैं, जो मूर्ति को एक दिव्य आभा प्रदान करते हैं। मंदिर परिसर में 12 जलकुंड भी हैं, जिनमें सूर्य पुष्करणी और चंद्र पुष्करणी में 20 लाख लीटर पानी संगृहीत किया जा सकता है। ये धार्मिक कार्यों और पारिस्थितिकीय संतुलन दोनों के लिए उपयोगी हैं। त्योहारों के दौरान गरुड़ वाहन, सिंह वाहन, हनुमंथ वाहन और शेष वाहन में रथयात्राएं निकाली जाती हैं, जिन्हें देखने हजारों भक्तगण एकत्र होते हैं।

इतिहास का भी साक्षी यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल भर नहीं है, बल्कि एक तरह से ऐतिहासिक संग्रहालय भी है। यहां तमिल, संस्कृत, तेलुगु, मराठी, उड़िया और कन्नड़ में 800 से अधिक प्राचीन अभिलेख हैं, जो विभिन्न दक्षिण भारतीय राजवंशों जैसे चोल, पांड्य, होयसला और विजयनगर के दौर के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक जीवन पर प्रकाश डालते हैं। मंदिर की दीवारों पर बने भित्तिचित्रों में प्राकृतिक रंगों से बनी पौराणिक कथाओं और मंदिर का इतिहास दर्शाया गया है।

कैसे पहुंचें और कहां ठहरें? नजदीकी हवाई अड्डा तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो मंदिर से लगभग 15 किलोमीटर दूर है। यह रेल नेटवर्क से भी अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। तिरुचिरापल्ली में रेलवे स्टेशन है, जहां से मंदिर परिसर लगभग 8 किमी दूर है। यह तमिलनाडु के प्रमुख शहरों जैसे चेन्नई, मदुरै, तंजावुर, कोयंबटूर से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। तिरुचिरापल्ली में हर जेब के हिसाब से होटल और स्टे मिल जाएंगे, जो 800 से 2000 रुपए की रेंज में उपलब्ध हैं। यहां कई ट्रस्टों द्वारा संचालित धर्मशालाएं भी उपलब्ध हैं, जो सस्ते में साफ-सुथरे कमरे मुहैया करवाती हैं। कुछ जगहों पर मुफ्त में खाना भी उपलब्ध करवाया जाता है।



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