रूमी जाफरी6 घंटे पहले
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मजरूह सुल्तानपुरी जैसा महान गीतकार और शायर जिसने उर्दू अदब में भी उतना ही बड़ा मुकाम हासिल किया था, को दुनिया से गए 25 साल हो गए हैं। बीती 24 मई को उनकी पच्चीसवीं पुण्यतिथि थी। आज इस कॉलम में उन्हीं की जिंदगी से जुड़े कुछ किस्से।
मजरूह साहब की पैदाइश उप्र के सुल्तानपुर की थी। उनके वालिद पुलिस में थे। उनका एडमिशन एक मदरसे में कराया गया था, जहां से उन्होंने उर्दू, अरबी और फारसी की तालीम हासिल की। बचपन से गानों का शौक था, इसलिए उन्होंने गाने की क्लास भी जॉइन कर ली थी। मगर उनके पिता बहुत सख्त थे। उन्होंने उनका गाना छुड़वाकर उन्हें यूनानी डॉक्टर बनाने की सोची और उनका यूनानी कॉलेज में दाखिला भी करवा दिया। उसके बाद वो यूनानी डॉक्टर यानी हकीम बन गए, मगर उनको शौक शायरी का था। शायरी उन्होंने बचपन से ही शुरू कर दी थी। पहले उन्होंने अपना तखल्लुस (पेन नेम या उपनाम) रखा ‘नासेह’। इसका मतलब होता है नसीहत देने वाला। बाद में उन्हें ये तखल्लुस रास नहीं आया। फिर उनके एक दोस्त ने कहा कि तुम अपना उपनाम ‘मजरूह’ रख लो। और फिर उनका तखल्लुस मजरूह हो गया। मजरूह का मतलब होता है घायल और फिर वे मजरूह नाम से मुशायरे पढ़ने लगे। हकीम की प्रैक्टिस कम कर दी। पूरा ध्यान मुशायरों में लगाने लगे और हिंदुस्तान घूमने लगे।
एक बार वो मुशायरा पढ़ रहे थे। वहीं पर जिगर मुरादाबादी भी थे। मजरूह साहब को सुनकर मुरादाबादी साहब ने पूछा कि ये इतनी कम उम्र का बच्चा इतनी अच्छी शायरी कर रहा है। कौन है ये! तो उन्हें बताया गया कि इसका नाम मजरूह है और फिर जिगर साहब से मुलाकात करवाई गई। इस तरह जिगर साहब ने मजरूह को अपनी छत्र-छाया में ले लिया। पूरी दुनिया ये बात जानती है कि जिगर मुरादाबादी, मजरूह साहब के उस्ताद रहे हैं, मगर सचिन पिलगांवकर जी ने मुझे बताया था कि मुरादाबादी, मजरूह साहब के केवल उस्ताद नहीं, एक मेंटर थे। यह बात उन्हें स्वयं मजरूह साहब ने बताई थी। उस्ताद वो होता है, जो केवल आपकी लिखी हुई रचनाओं को दुरुस्त करता है, आपके लेखन में आपको गाइड करता है। लेकिन मंेटर आपके लिखे हुए को दुरुस्त करने के साथ-साथ जिंदगी में भी राह दिखाता है।
बकौल सचिन जी, मजरूह साहब ने उन्हें बताया था कि जब वे जवान थे, किसी बड़े शायर की जमीन पर और उन्हीं की बेहर लेकर कुछ शेर लिखे और जिगर साहब को सुनाए। जिगर साहब ने सुनते ही कहा कि ये तो उस शायर की जमीन और बेहर है। तो मजरूह साहब ने पूछा कि इसमें क्या हर्ज है? जिगर साहब ने कहा कि दूसरों की जमीन पर लिखो, मगर अपना कलाम कहने के बाद। खुद अपने आप को जब एक शायर के तौर पर स्थापित कर लो, उसके बाद कहो, उससे पहले नहीं। शुरुआत में इस तरह का काम तुम्हारा नाम खराब कर देगा। मजरूह साहब ने सचिन जी को बताया कि इससे फायदा यह हुआ कि बचपन से ही मेरे मेंटर ने मुझे समझा दिया तो मैंने स्वयं को दूसरों से प्रेरित होना या उनके विचारों को लेने से रोक दिया।
एक बार एक मुशायरे में जिगर साहब और मजरूह साहब दोनों थे, साथ ही फिल्म इंडस्ट्री के बहुत बड़े प्रोड्यूसर कारदार साहब भी थे। कारदार साहब ने जिगर साहब से कहा कि मैं एक फिल्म बना रहा हूं शाहजहां और चाहता हूं कि आप उसमें गाने लिखें। तो जिगर साहब बोले कि देखो, ये फिल्मी गाने लिखना मेरे बस की बात नहीं है। ये नौजवान शायर है मजरूह। इसको तुम मुशायरे में सुन चुके हो। फिर जिगर साहब ने कारदार साहब से यह भी पूछा कि तुम तो खुमार बाराबंकवी से लिखवा रहे थे? तो वो बोले कि खुमार साहब दो गाने लिख भी चुके हैं, लेकिन उनको धुन पर लिखने में तकलीफ आती है। इस पर जिगर साहब ने मजरूह साहब कहा कि तुम कोशिश करो। मजरूह साहब बोले, आप खुद तो मना कर रहे हैं और मुझे लिखने को बोल रहे हैं। मैं भी आपकी तरह साहित्य में, अदब में खुद को बड़ा शायर बनाना चाहता हूं, फिल्मी गीतकार नहीं। तो जिगर साहब एक मेंटर की तरह समझाते हुए बोले- देखो, तुम अभी नौजवान हो। 24-25 साल के हो। कल तुम्हारी शादी होगी, बीवी-बच्चे होंगे, जिम्मेदारियां बढ़ेंगी। मैं अपने तजुर्बे से कह रहा हूं कि सिर्फ शायरी से घर नहीं चलेगा। तो जिगर साहब के समझाने के बाद मजरूह साहब ने हां कर दी और नौशाद साहब के म्यूजिक पर उन्होंने शाहजहां फिल्म के गाने लिखे। इसी बात पर मुझे अल्ताफ हुसैन हाली का एक शेर याद आ रहा है-
मां बाप और उस्ताद सब हैं खुदा की रहमत है रोक-टोक उन की हक में तुम्हारे नेमत
मजरूह साहब ने ‘शाहजहां’ फिल्म में जो गाने लिखे, वो सुपरहिट हुए। एक गाना था- वो था गम दिए मुस्तकिल, कितना नाजुक है दिल, ये न जाना, हाय हाय ये जालिम जमाना। और दूसरा गाना लिखा- जब दिल ही टूट गया, हम जी कर क्या करेंगे। यह गाना सहगल साहब को इतना पसंद आया कि उन्होंने कहा कि जब मैं इस दुनिया से जाऊं और मेरी अंतिम यात्रा हो रही हो तो यही गाना बजना चाहिए। और यही हुआ। सहगल साहब की अंतिम यात्रा में यही गाना बजा।
मजरूह साहब की जितनी तारीफ की जाए, वो कम है क्योंकि 25 साल की उम्र में वो लिखते हैं ‘जब दिल ही टूट गया हम जी कर क्या करेंगे’ और 75 साल की उम्र में लिखते हैं ‘रात शबनमी भीगी चांदनी’। मजरूह साहब की याद में फिल्म ‘जो जीता वही सिकंदर’ का ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए, खुश रहिए।
पहला नशा, पहला खुमार…








