रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  सीढ़ियों से 11वें माले पर पहुंचे थे दिलीप कुमार
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: सीढ़ियों से 11वें माले पर पहुंचे थे दिलीप कुमार

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रूमी जाफरी4 घंटे पहले

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सुनील दत्त और दिलीप कुमार (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar

सुनील दत्त और दिलीप कुमार (फाइल फोटो)

वो कहते हैं न, इंसान जब पैदा होता है तो उसे सारे रिश्ते मिल जाते हैं, बस दोस्त नहीं मिलते। और सच्चे दोस्त, मोहब्बत करने वाले दोस्त, चाहने वाले दोस्त नसीब से ही मिलते हैं। ऐसे दोस्तों को, ऐसे दोस्ती वाले रिश्तों को हमेशा बहुत संभालकर रखना चाहिए। ऐसी दोस्ती के किस्से बहुत कम देखने को मिलते हैं। मेरे दिल में आया कि फिल्म इंडस्ट्री के ऐसे दोस्ती के किस्से आप लोगों से साझा करूं। तो आज मेरे हिस्से के किस्से में बात दिलीप कुमार और सुनील दत्त की दोस्ती की।

जब दत्त साहब का निधन हुआ तो शायद 11 या 11:30 का वक्त रहा होगा। मैं बांद्रा कुर्ला काम्प्लेक्स में अपनी फिल्म के लिए लोकेशन देख रहा था, तभी संजू का फोन आया कि दत्त साहब नहीं रहे। यह 25 मई 2005 की बात थी। मैं फौरन दत्त साहब के घर पहुंचा। गाड़ी से उतरा और बिल्डिंग की लिफ्ट की तरफ बढ़ा तो मैंने देखा, वॉचमैन की कुर्सी पर बैठे दिलीप साहब के छोटे भाई एहसान तेज-तेज सांस ले रहे थे और वॉचमैन उनको पानी पिला रहा था। मैं गया, सलाम किया और पूछा, एहसान भाई, सब खैरियत? क्या हुआ? तो वॉचमैन ने बताया कि ये लिफ्ट में थे और लिफ्ट टूट गई। अच्छा हुआ कि लिफ्ट तब टूटी, जब यह पूरी तरह से नीचे आ गई था। दत्त साहब का फ्लैट ग्यारहवें माले पर था। मैंने एहसान भाई से कहा, आप घर जाइए, मैं ऊपर जाता हूं। जैसे ही ये बोलकर मैं आगे बढ़ा तो इतने में सायरा बानो जी अपनी सर्वेंट के साथ आ गईं। उन्होंने भी एहसान भाई को देखा, उनकी खैरियत पूछी। फिर मैंने उन्हें बताया कि लिफ्ट टूट चुकी है, अब सीढ़ियों से ही ऊपर जाना पड़ेगा। मैंने सोचा कि वो वापस घर चली जाएंगी, मगर वो तो सीढ़ियों की तरफ बढ़ गईं। मुझे अच्छा नहीं लगा कि मैं पैदल उनसे आगे निकलूं। तो उन्होंने सीढ़ियां चढ़ना शुरू किया और मैं उनके पीछे-पीछे सीढ़ियां चढ़ने लगा।

सायरा जी बहुत अफसोस में और बहुत टेंशन में थीं। रूंधे गले से बोल रही थीं, या खुदा, ये तूने क्या कर दिया, नहीं-नहीं ये नहीं हो सकता। वो बोलती जा रही थीं और सीढ़ियां चढ़ती जा रही थीं। एक मंजिल, दो मंजिल, चार मंजिल के बाद मेरी भी सांस फूलने लगी, मगर सायरा जी तो रुकी नहीं। मैं उनके पीछे था। मैंने न तो उनसे आगे निकलना मुनासिब समझा और न ही रुकना। जब वो नहीं रुक रहीं तो मैं कैसे रुक सकता था। यकीन जानिए, वो बोलते-बोलते कहीं नहीं रुकीं और 11 मंजिल चढ़कर ऊपर आ गईं। खैर, उनकी भी सांस बहुत फूल रही थी। उनको किचन से लाकर पानी पिलाया गया। धर्मेंद्र जी भी सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आ गए, माजिद मेनन और विनोद चोपड़ा भी आ गए। तभी सायरा जी ने मुझसे कहा, बेटा, मेरी लड़की को बोल दो कि दिलीप साहब को फोन करके बता दे कि ऊपर न आएं, क्योंकि लिफ्ट टूट चुकी है और उनकी तबीयत भी ठीक नहीं है। 11 मंजिल चढ़ना उनकी सेहत के लिए अच्छा नहीं है। मैंने लड़की को बुलाया और वो फोन करने ही वाली थी कि तभी मैंने देखा कि दिलीप साहब भी 11 मंजिल चढ़कर चले आ रहे हैं। ऊपर आने के बाद उनको बैठाया गया और पानी पिलाया गया। ये जो दिलीप साहब की दत्त साहब के लिए मोहब्बत थी, ये जो जज्बा था, इसे देखकर मुझे हफीज होशियारपुरी का एक शेर याद आ रहा है:

दोस्ती आम है लेकिन ऐ दोस्त

दोस्त मिलता है बड़ी मुश्किल से

दिलीप साहब और दत्त साहब एक-दूसरे से इतनी मोहब्बत करते थे कि मुझे एक और किस्सा याद आ रहा है। आईफा हर साल लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड देता है। उनकी ज्यूरी ने लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दत्त साहब को देने का फैसला किया। वो दत्त साहब के पास गए और कहा कि आप ये अवार्ड एक्सेप्ट करेंगे? उन्होंने कहा, बिल्कुल करूंगा, लेकिन मैं एक ही शख्स के हाथ से अवार्ड लूंगा। उन्होंने पूछा- किसके हाथ से? दत्त साहब ने कहा, दिलीप कुमार के हाथ से। तो अवार्ड टीम ने कहा कि इसमें एक समस्या है। अवार्ड फंक्शन लंदन में है। दत्त साहब ने फिर भी कहा, देख लो, दिलीप साहब के हाथों से मिलेगा तो मुझे ज्यादा खुशी होगी। अवार्ड टीम ने कहा, ठीक है, हम कोशिश करते हैं।

तो वो लोग गए दिलीप साहब के पास और उन्हें बताया कि हम सुनील दत्त को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दे रहे हैं और उनकी ख्वाहिश है कि वो यह आपके हाथ से लें। दिलीप साहब ने कहा, हां-हां, क्यों नहीं, मैं जरूर दूंगा। तब उन्हें बताया गया कि फंक्शन लंदन में है। तो आपको अवार्ड देने लंदन आना पड़ेगा। दिलीप साहब बोले, ठीक है, सुनील की ख्वाहिश है, वो मेरा दोस्त है, तो मैं अवार्ड देने जरूर आऊंगा। यकीन जानिए, इतनी उम्र में इतना ट्रैवल करके वो लंदन गए। मुझे अभी तक याद है कि स्टेज पर जब उन्होंने दत्त साहब को अवार्ड दिया तो मजाक में कहा भी, ये मेरा दोस्त, मेरा अजीज, मेरा पड़ोसी भी है। हमारे घर की दीवार एक है, लेकिन इससे मिलने के लिए मुझे लंदन आना पड़ा।

आज दिलीप साहब और दत्त साहब की दोस्ती की याद में दत्त साहब की फिल्म ‘गबन’ का ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए:

एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों

ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों…



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