रूमी जाफरी4 घंटे पहले
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पिछले रविवार यानी 8 मार्च को महिला दिवस था और उसी दिन गीतकार एवं शायर साहिर लुधियानवी की सालगिरह भी थी। लुधियानवी जी ने महिलाओं को समर्पित एक से बढ़कर एक गीत लिखे हैं। तो आज मेरे हिस्से के किस्से में बात साहिर जी की।
साहिर बचपन से ही महिलाओं और लड़कियों की बहुत इज्जत करते थे। जब उनमें इतनी समझ भी नहीं थी, तब भी उनके भीतर यह संवेदना मौजूद थी। साहिर साहब के पिता एक जागीरदार थे और उन्होंने कई शादियां की थीं। साहिर की मां सरदार बेगम की अपने पति से नहीं बनी। जब मैं साहिर साहब की मां सरदार बेगम के बारे में सोचता हूं तो यह खयाल आता है कि उनके माता-पिता की सोच कितनी प्रगतिशील रही होगी कि उन्होंने उस दौर में भी अपनी बेटी का नाम ‘सरदार’ रखा। सरदार एक फारसी शब्द है, जिसका मतलब होता है मुखिया, नेता या प्रधान। और सच कहें तो उनके भीतर इस नाम के गुण भी थे।
जब सरदार बेगम अपने पति से अलग हो गईं तो बेटे की कस्टडी के लिए साहिर के पिता कोर्ट पहुंच गए। लेकिन सरदार बेगम अपने इतने बड़े जागीरदार पति के सामने न डरीं और न झुकीं। उस समय ब्रिटिश कोर्ट में खड़े होकर उन्होंने अपने बेटे की कस्टडी के लिए पूरी मजबूती से लड़ाई लड़ी। एक दिन अदालत में जज ने कहा कि बच्चे को पेश किया जाए। उस समय साहिर का नाम अब्दुल हयी था। साहिर अदालत में आए तो जज ने सीधे उनसे पूछा, बेटे तुम किसके साथ रहना चाहते हो, अपनी मां के साथ या अपने पिता के साथ? साहिर ने तुरंत कहा, अपनी मां के साथ। जज ने पूछा क्यों। साहिर ने जवाब दिया, क्योंकि मेरी मां मुझे पढ़ाना-लिखाना चाहती है और मेरे अब्बा मुझे पढ़ाना-लिखाना नहीं चाहते। सोचिए, बचपन में ही साहिर ने मां को और पढ़ाई को चुना। इसी बात पर इफ्तिखार आरिफ का एक शेर याद आता है :
एक चराग और एक किताब और एक उम्मीद असासा उसके बाद तो जो कुछ है, वह सब अफसाना है।
साहिर के करीबी रहे साबिर दत्त ने मुझे बताया था कि साहिर साहब की सबसे बड़ी मोहब्बत उनकी मां थीं। वे हर मुशायरे में अपनी मां को साथ लेकर जाते, उन्हें सामने बिठाते और फिर अपना कलाम पढ़ते। यश चोपड़ा ने इसी से प्रेरित होकर फिल्म ‘हमराज’ में एक दृश्य रखा था, जिसमें सुनील दत्त विम्मी को हर शो में सामने खास कुर्सी पर बिठाते हैं और फिर परफॉर्म करते हैं।
जावेद अख्तर साहब ने मुझे बताया था कि साहिर साहब के घर में एक लंबा हॉल था। हॉल के आखिर में एक कमरा था, जहां उनकी मां रहती थीं। जब भी घर में दोस्तों की महफिल जमती और किसी बात पर बहस होती, तो साहिर सीधे मां के कमरे तक जाते, दरवाजे पर खड़े होकर कहते, अम्मी सुन रही हों, ये क्या कह रहे हैं और फिर पूरी बात बताते। उसके बाद यह भी सुनते कि उनकी मां उस बात से सहमत हैं या नहीं। शायद इसी वजह से महिलाओं की इज्जत, उनकी तकलीफ और समाज में उनके हक के लिए जो गाने साहिर साहब ने लिखे, वे बेमिसाल हैं। वे जिस्मफरोशी के बहुत खिलाफ थे और इस धंधे में धकेली गईं लड़कियों के लिए उनके दिल में गहरा दर्द था। इसलिए उन्होंने लिखा : औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया।
फिल्म ‘प्यासा’ के लिए लिखा उनका गीत भी इसी दर्द को बयान करता है ये कूचे ये नीलाम घर, दिलकशी के ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के कहां हैं, कहां हैं मुहाफिज खुदी के जिन्हें नाज है हिंद पर, वो कहां हैं।
कहा जाता है कि यह गीत सुनकर उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी असहज हो गए थे। लेकिन साहिर की कलम को कोई ताकत रोक नहीं सकी। यही वजह है कि साहिर की शायरी, उनके गीत और खासकर औरतों के हक में लिखी उनकी पंक्तियां आज भी अमर हैं और औरतों की आवाज बनकर जिंदा हैं। आज साहिर साहब की याद में फिल्म ‘साधना’ का यह गीत याद कीजिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए : औरत ने जन्म दिया मर्द को, मर्द ने उसको बाजार दिया।









