नई दिल्ली23 मिनट पहले
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कांग्रेस ने सोशल मीडियो X पर रविवार को राहुल गांधी की गिग वर्कर्स के डिलीगेशन से मुलाकात का वीडियो शेयर किया। राहुल ने कहा कि राज्यों और केंद्र में सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी(BJP) की सरकार गिग वर्कर्स के साथ अन्याय कर रही है।
उन्होंने कहा कि BJP की सरकारें इस अन्याय को नजरअंदाज कर रही हैं। गिग कंपनियों के लिए कोई मजबूत कानून नहीं हैं, कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं है और कोई जवाबदेही नहीं है।
राहुल के मुताबिक ये मुलाकात कुछ दिन पहले हुई थी। उन्होंने कहा कि कुछ दिन पहले, मैं जन संसद में गिग वर्कर्स के एक डेलीगेशन से मिला। उन्होंने कहा कि गिग सेक्टर में वर्कफोर्स का एक बड़ा हिस्सा दलित और आदिवासी कम्युनिटी से है। इस सिस्टम में उनके साथ क्लास और जाति के आधार पर भेदभाव होता है।

राहुल ने और क्या कहा…
- गिग इकॉनमी में काम करने वालों के पास स्टेबल इनकम, सोशल सिक्योरिटी और मेडिकल केयर और इंश्योरेंस जैसी बेसिक सुविधाओं की कमी है।
- वर्क-लाइफ बैलेंस बिगड़ गया है, और बेसिक इंसानी इज्जत खत्म हो रही है। गिग सेक्टर में वर्कफोर्स का एक बड़ा हिस्सा दलित और आदिवासी कम्युनिटी से है। इसलिए उनके साथ भेदभाव होता है।
- कांग्रेस शासित राज्यों में सरकारें गिग वर्कर्स को सोशल सिक्योरिटी, मिनिमम वेज और बराबरी दिलाने के लिए अधिकारों पर आधारित कानूनों पर काम कर रही हैं।
- हम अपने राज्यों में एक मॉडल कानूनी ढांचा बना रहे हैं जिसे पूरे देश में लागू किया जा सके। गिग वर्कर्स की लड़ाई सिर्फ रोजगार के बारे में नहीं है – यह सम्मान, सुरक्षा और सामाजिक न्याय के बारे में है।
- कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने 10 मिनट डिलीवरी पर जो फैसला लिया है वो इंसानियत भरा और दूर की सोचने रखने वाला है।
मुलाकात की 3 तस्वीरें…



40% गिग वर्कर्स की कमाई ₹15 हजार से कम, इकोनॉमिक सर्वे में मिनिमम अर्निंग तय करने की सिफारिश
संसद में 29 जनवरी को पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे में गिग इकोनॉमी पर चिंता जताई गई है। सर्वे के मुताबिक, भारत में लगभग 40% गिग वर्कर्स यानी फूड डिलीवरी, क्विक कॉमर्स और अन्य प्लेटफॉर्म से जुड़े कर्मचारियों की महीने की कमाई 15 हजार रुपए से भी कम है।
रिपोर्ट में सरकार से सिफारिश की गई है कि गिग वर्कर्स के लिए प्रति घंटा या प्रति टास्क के आधार पर ‘मिनिमम अर्निंग’ तय की जानी चाहिए। इसके अलावा, काम के इंतजार के दौरान लगने वाले समय के लिए भी पेमेंट दिए जाने का सुझाव सर्वे में दिया गया है।
आय में उतार-चढ़ाव सबसे बड़ी चुनौती, लोन मिलने में दिक्कत
इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि गिग वर्कर्स की फिक्स्ड इनकम न होने के कारण इन्हें बैंक से लोन मिलने या अन्य फाइनेंशियल सर्विस का फायदा उठाने में मुश्किल आती है। सरकार का मानना है कि पॉलिसी ऐसी होनी चाहिए कि लोग अपनी मर्जी से गिग वर्क चुनें, न कि मजबूरी में।

एल्गोरिदम से बढ़ा वर्क प्रेशर, बर्नआउट का खतरा
सर्वे में उन प्लेटफॉर्म्स की भी आलोचना की गई है जो एल्गोरिदम के जरिए काम बांटते हैं। ये एल्गोरिदम ही तय करते हैं कि किसे कितना काम मिलेगा, परफॉरमेंस कैसी है और कमाई कितनी होगी। इस कंट्रोल की वजह से वर्कर्स पर काम का दबाव बढ़ रहा है। वे थकान और तनाव का शिकार हो रहे हैं।
4 साल में 55% बढ़े वर्कर्स, 1.2 करोड़ हुई संख्या
देश में गिग वर्कफोर्स बहुत तेजी से बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2021 में गिग वर्कर्स की संख्या 77 लाख थी, जो वित्त वर्ष 2025 में 55% बढ़कर 1.2 करोड़ पहुंच गई है।
फिलहाल कुल वर्कफोर्स में इनकी हिस्सेदारी 2% से ज्यादा है। अनुमान है कि साल 2029-30 तक नॉन-एग्रीकल्चर सेक्टर की कुल नौकरियों में गिग वर्क की हिस्सेदारी 6.7% हो जाएगी।
कंपनियों को ट्रेनिंग और एसेट्स में निवेश करने की सलाह
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि डिलीवरी कंपनियों और अन्य प्लेटफॉर्म्स को अपने वर्कर्स की ट्रेनिंग और एसेट्स (जैसे वाहन या अन्य जरूरी उपकरण) में निवेश करना चाहिए। अक्सर पैसों की कमी और संसाधनों के अभाव में ये वर्कर्स स्किल्ड जॉब्स की तरफ नहीं बढ़ पाते।
GDP में 2.35 लाख करोड़ का योगदान होगा
आने वाले समय में गिग इकोनॉमी देश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा होगी। 2030 तक इसका भारत की GDP में योगदान लगभग 2.35 लाख करोड़ रुपए होने की उम्मीद है।
बीते दिनों जोमैटो, स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म के वर्कर्स ने बेहतर वेतन और वर्किंग कंडीशन को लेकर प्रदर्शन भी किए थे। इसे देखते हुए सर्वे की ये सिफारिशें महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
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