12 घंटे पहले
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सवाल: मेरी शादी को चार साल हो गए हैं। हसबैंड अच्छी सरकारी नौकरी करते हैं, तो हमने मिलकर फैसला लिया था कि वे जॉब करेंगे और मैं घर के काम संभाल लूंगी। हम सभी फैसले मिलकर करते हैं, लेकिन मेरे पति फाइनेंशियल डिसीजन्स में मुझे कभी इन्वॉल्व नहीं करते। चाहे सेविंग्स की बात हो या कोई बड़ा खर्चा, वो अकेले ही फैसला लेते हैं।
जब मैं इस बारे में पूछती हूं, तो कहते हैं कि तुम्हें टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। मुझे लगता है कि शायद वो इस मामले में मेरे ऊपर पर भरोसा नहीं करते हैं। क्या ये नॉर्मल है या मुझे इस पर बात करनी चाहिए? अगर बात करूं, तो कैसे बात करूं कि उन्हें बुरा न लगे? क्या ये हमारे रिश्ते के लिए ठीक नहीं है?
एक्सपर्ट: डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा
जवाब: आप जो महसूस कर रही हैं, वो स्वाभाविक है। शादी के चार साल बाद भी अगर आपको लगता है कि आपके पति पैसे से जुड़े फैसलों में आपको शामिल नहीं करते, तो ये कोई छोटी बात नहीं है। आपने बताया कि आप घर संभालती हैं और आपके हसबैंड नौकरी करते हैं।
ये व्यवस्था बहुत से घरों में होती है। लेकिन जब बात फाइनेंशियल डिसीजन्स की आती है, तो इससे आपको बाहर कर दिया जाता है। इससे आप असुरक्षित या खुद को कम महत्वपूर्ण महसूस करती होंगी। ज्यादातर मामलों में ये मुद्दा छोटी सी बात से शुरू होकर बड़ा असंतोष बन जाता है। इस समस्या को टुकड़ों में बांटकर समझते हैं और देखते हैं कि क्या करना चाहिए। याद रखिए, रिश्ते में प्यार के साथ-साथ बराबरी और भरोसा भी जरूरी है और आप इसकी हकदार हैं।
फाइनेंशियल डिसीजन्स रिश्ते को कैसे प्रभावित करते हैं?
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए। सोचिए, आपका घर एक छोटी सी कंपनी है। इसमें दो पार्टनर हैं, आप और आपके पति। अगर कंपनी के पैसे से जुड़े फैसले सिर्फ एक पार्टनर लेता है, तो दूसरा पार्टनर कैसा महसूस करेगा?
जाहिर है कि उसे लगेगा जैसे उसकी राय की कोई वैल्यू नहीं है। वह ये सोच सकता है कि शायद कंपनी का भविष्य उसके हाथ में नहीं है। ठीक वैसे ही, घर में फाइनेंशियल डिसीजन्स सिर्फ पैसे की बात नहीं होते हैं। ये भरोसे, साझेदारी और भविष्य की प्लानिंग से जुड़े होते हैं।
अगर इस बारे में सोचकर आप असुरक्षा महसूस कर रही हैं तो ये नॉर्मल है। आपके मन में यह सवाल पैदा हो रहा है तो धीरे-धीरे रिश्ते में यह एक बड़ी दीवार खड़ी कर सकता है। हर इंसान चाहता है कि रिश्ते में उसकी बराबर की भागीदारी हो। फाइनेंशियल ट्रांसपेरेंसी क्यों जरूरी है, ग्राफिक में देखिए-

आपकी फीलिंग्स गलत नहीं हैं
आपने कहा कि जब आप इस बारे में पूछती हैं, तो वो कहते हैं कि तुम्हें टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। ये भी हो सकता है कि वे शायद आपकी परवाह में ऐसा कर रहे हों, लेकिन असल में ये कहीं भरोसे की कमी के कारण होता है। आप सही सोच रही हैं। क्योंकि भरोसा सिर्फ शब्दों से नहीं, बल्कि एक्शन से बनता है। कई बार पुरुषों को बचपन से सिखाया जाता है कि घर की आर्थिक जिम्मेदारी उनकी है और पत्नी को इन टेंशन से दूर रखना चाहिए।
ये भी सच है कि कुछ मामलों में ये एक तरह का प्रोटेक्टिव बिहेवियर हो सकता है, न कि भरोसे की कमी। लेकिन ये लंबे समय तक नहीं चल सकता है। क्योंकि ये रिश्ते में असंतुलन पैदा करता है। आप घर संभालती हैं, जो कहीं से भी कम महत्वपूर्ण काम नहीं है। फिर पैसे से जुड़े फैसलों से आपको बाहर नहीं रखा जाना चाहिए। ये सोचकर मन में सवाल उठना लाजिमी है और ये आपकी ताकत है कि आप इसे समझ रही हैं।
रिश्ते में क्या नॉर्मल है और क्या नहीं?
हर रिश्ता अलग होता है। कुछ घरों में हरदम पति ही सारे फैसले लेते हैं और पत्नी खुश भी रहती है। लेकिन अगर आपको असहज लग रहा है, तो ये आपकी अवेयरनेस के कारण संभव हुआ है।
यह भी सच है कि जो कपल्स फाइनेंशियल मामलों में ट्रांसपेरेंट होते हैं, उनके रिश्ते ज्यादा मजबूत और खुशहाल रहते हैं। क्योंकि पैसे से जुड़े डिसीजन्स सिर्फ बैंक बैलेंस भर नहीं हैं, बल्कि ये साझा सपनों, जरूरतों और सुरक्षा से जुड़े होते हैं।
अगर किसी महिला को कभी भी फाइनेंशियल डिसीजन्स में इन्वॉल्व नहीं किया गया है। अचानक उसके पति के साथ कोई ट्रैजेडी हो जाती है तो वह एकदम से सबकुछ नहीं संभाल पाएगी। किसी के साथ कभी भी कोई भी परिस्थिति बन सकती है। ऐसे में सिर्फ महिला के लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लिए रिस्क होता है। साझा फैसले न लेने के कई नुकसान होते हैं, ग्राफिक में देखिए-

पति का नजरिया भी समझें
आपके पति शायद सोचते होंगे कि वो आपको प्रोटेक्ट कर रहे हैं। लेकिन उन्हें अवेयरनेस नहीं है कि उनकी ये सोच आउटडेटेड है। पहले के समय में महिलाओं को सिर्फ घर तक सीमित रखा जाता था, उन्हें सभी बड़े फैसलों से दूर रखा जाता था।
आज के समय में ये सब बदल रहा है। महिलाएं आत्मनिर्भर होना चाहती हैं। आपके पति के साथ ये भरोसे की कमी नहीं, बल्कि उनकी आदत या बैकग्राउंड का नतीजा हो सकता है। लेकिन अच्छी बात ये है कि इसे बदला जा सकता है।
ज्यादातर मामलों में जब महिलाएं अपनी फीलिंग्स शेयर करती हैं, तो पति उन्हें धीरे-धीरे समझने लगते हैं। अगर आपके इस बारे में बात किए जाने के बावजूद पति इसे नहीं समझ रहे हैं तो इसके ऊपर काम करने की जरूरत है। किसी रिश्ते में ये रवैया पार्टनर के लिए ट्रस्ट इश्यू और अलगाव की वजह बन सकता है। लेकिन चिंता मत कीजिए, बातचीत से सब ठीक हो सकता है।
घर के सभी डिसीजन्स साझा होने के फायदे
जब आप फाइनेंशियल डिसीजन्स में शामिल होती हैं, तो न सिर्फ आपका कॉन्फिडेंस बढ़ता है, बल्कि रिश्ता भी मजबूत होता है। उदाहरण के लिए, सेविंग्स प्लान बनाते समय आपकी राय लेने से घर का बजट मैनेज करना आसान होता है। अगर कोई बड़ा खर्च करना है, जैसे घर खरीदना है तो दोनों की राय से बेहतर फैसला लिया जा सकता है।
जब साझेदारी का एहसास देता है तो आप दोनों टीम की तरह काम करते हैं। घर में बच्चे भी इसे देखकर सीखते हैं कि रिश्ते में बराबरी जरूरी होती है। सबसे बड़ा फायदा ये है कि ये भविष्य को सुरक्षित बनाता है। इसके सभी फायदे ग्राफिक में देखिए-

अब क्या करें?
सबसे पहले, आपको पूरी बात करनी चाहिए। हालांकि, थोड़े स्मार्ट तरीके से बात करें। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि सालों से चली आ रही रूढ़ि के कारण आपके पति को लग सकता है कि जैसे आप कुछ गलत कर रही हैं। उन्हें धीरे-धीरे यह समझ में आने लगेगा। बातचीत के लिए कुछ आसान टिप्स हैं-

सही समय चुनें: शाम को जब दोनों लोग काम के बाद रिलैक्स हों, तब बात शुरू करें। कहें कि आज हम घर के बारे में थोड़ी बात करते हैं।
पॉजिटिव रहें: शुरुआत अच्छी बातों से करें। कहें कि तुम घर को इतनी अच्छी तरह संभालते हो, मुझे गर्व है। फिर बताएं कि मैं भी इसमें हिस्सा बनना चाहती हूं।
अपनी फीलिंग्स शेयर करें: बताएं कि तुम मुझे टेंशन से बचाते हो, ये अच्छा है। लेकिन मुझे लगता है कि अगर मुझे भी पता तो हम साथ मिलकर बेहतर कर सकते हैं।
छोटी बातों से शुरू करें: कहें कि अगली बार सेविंग्स की बात हो, तो मुझे भी बताओ। मैं सीखना चाहती हूं।
उनकी बात सुनें: अगर वो कहते हैं कि ऐसा कर सकते हैं तो बहुत अच्छा है।
अगर वो मना करते हैं तो उनकी इस बात के पीछे की वजह समझें और धैर्य रखें। धीरे-धीरे बदलाव की कोशिश करें।
इस दौरान खुद की जानकारियां अपडेट करें। बैंक स्टेटमेंट्स देखें, बेसिक फाइनेंस की समझ बढ़ाएं। इससे आप अधिक सशक्त होंगी। ज्यादा हक से साझेदारी की मांग कर सकेंगी।
अगर बदलाव न हो तो क्या करें
अगर कई बार बात करने के बाद भी वो न बदलें, तो ये थोड़ा गंभीर है। ऐसे में कपल काउंसलिंग लें। इसमें कोई शर्म की बात नहीं है, बल्कि रिश्ते को बेहतर बनाने का तरीका है। एक्सपर्ट की मदद से वो समझ सकते हैं कि ये साझेदारी के लिए जरूरी है। खुद को ब्लेम मत कीजिए, ये उनकी सोच का मुद्दा हो सकता है। लेकिन याद रखिए, आपकी खुशी और सुरक्षा सबसे ऊपर है।
आखिर में ये याद रखिए
शादी का मतलब हर तरह की साझेदारी है, जहां प्यार के साथ फैसलों में भी बराबरी होनी चाहिए। आपके पति का आपको दूर रखना शायद उनकी आदत है, लेकिन ये रिश्ते के लिए ठीक नहीं है। बातचीत से शुरुआत करें और देखिए कैसे सब बेहतर होता है। आप एक मजबूत रिश्ते की हकदार हैं, जहां भरोसा और ट्रांसपेरेंसी हो। अगर जरूरत पड़े तो प्रोफेशनल मदद लें। आपकी खुशी सबसे जरूरी है।
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आप अपने बॉयफ्रेंड की ईमानदारी की कद्र करती हैं, लेकिन उसकी पास्ट रिलेशनशिप्स की बातें आपको अंदर तक परेशान कर रही हैं। ऐसा फील करना बिल्कुल नॉर्मल है। कोई भी इंसान अपने पार्टनर की पुरानी जिंदगी की बातें बार-बार सुनकर असुरक्षित महसूस कर सकता है। पूरी खबर पढ़िए…








