लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम:  सोशल मीडिया के दौर में आप युवाओं को दबा नहीं सकते
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम: सोशल मीडिया के दौर में आप युवाओं को दबा नहीं सकते

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11 घंटे पहले

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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर - Dainik Bhaskar

लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर

हमने पहले भी यह देखा है। हाल ही में बांग्लादेश में, कुछ साल पहले श्रीलंका और अब नेपाल में। प्रत्येक घटना के अपने अलग कारण हैं, लेकिन एक चिंताजनक पैटर्न समान है। युवा आक्रोश, एकाएक उकसावा (जैसे इंटरनेट शटडाउन, कोटा निर्णय या बुनियादी सेवाओं की समाप्ति) और शासन की विफलताओं का एक ज्वलनशील मिश्रण।

बढ़ती युवा आबादी जनसांख्यिकीय लाभ जरूर है, लेकिन यदि उसे उपेक्षित- बेरोजगार, अकुशल और हाशिए पर- छोड़ दिया जाए तो वो विस्फोटक भी हो सकती है। इन तमाम बदलावों में जेन-जी और युवा मिलेनियल्स केंद्र में क्यों हैं? जनसांख्यिकी इसमें मायने रखती है। दक्षिण एशिया की युवा आबादी विशाल है।

संभवत: यह एक आर्थिक इंजन है, लेकिन शोध एक चिंताजनक पैटर्न भी बताते हैं। जहां बड़ी युवा आबादी बेरोजगारी, कमजोर शासन और हाशिए पर धकेलने वाली राजनीति झेलती है, वहां राजनीतिक अशांति की आशंका बढ़ जाती है। साफ शब्दों में कहें तो बेचैन, डिजिटली कनेक्टेड युवा, भीड़ जुटाने वालों के लिए वरदान और कमजोर राजनेताओं के लिए सिरदर्द हैं।

इस घटना को समझने के लिए आपको तीन दृष्टिकोण से विचार करना होगा। नेपाल के टूटे-फूटे लोकतांत्रिक प्रयोगों और हिंसक विद्रोह का इतिहास। मोबाइल, मीडिया-सैवी युवा आबादी की संगठन शक्ति। और अमेरिकी राजनीतिक दार्शनिक जीन शार्प द्वारा गढ़ी गई सैद्धांतिक रणनीति- जो बताती है कि आंदोलन सत्ता को कैसे उखाड़ फेंकते हैं।

नेपाल में 2008 तक राजशाही थी। देश की राजनीति बेहद अस्थिर थी। 1996-2006 तक चले लंबे माओवादी विद्रोह ने हजारों लोगों की जान ली और शासन और जनता के रिश्ते खराब हुए। इस इतिहास ने तय किया कि सेना और पुलिस किसी अव्यवस्था का जवाब कैसे देते हैं और राजनीतिक कुलीन कैसे राष्ट्रवादी ढांचों का उपयोग करते हैं। ताकतें अतीत से कुछ नहीं सीखती हैं।

किसी भी राजनीतिक विज्ञानी ने नेतृत्व विहीन, त्वरित और अहिंसक संघर्ष की यांत्रिकी को जीन शार्प से बेहतर नहीं समझाया है। अपनी महान कृति फ्रॉम डिक्टेटरशिप टु डेमोक्रेसी में शार्प ने बताया है कि कैसे विकेंद्रीकृत आंदोलन सांकेतिक अवज्ञा, हड़ताल, असहयोग और कम्युनिकेशन नेटवर्क के रणनीतिक उपयोग के जरिए सत्ता की जड़ों को कमजोर कर सकते हैं। जहां सोशल मीडिया है, वहां ये प्रक्रिया तेजी से चलती है। जब सोशल मीडिया को रोका जाता है तो विकेंद्रीकरण के चलते आंदोलन अकसर डार्क नेट जैसे एनक्रिप्टेड चैनलों के जरिए बढ़ निकलता है।

2024 में बांग्लादेश के आंदोलन से इसकी चेतावनी मिली थी। उस घटना ने दिखाया कि एक छात्र आंदोलन कितनी जल्दी राष्ट्रीय संकट में बदल सकता है और सख्ती से इसका दमन करने पर समस्या और विकराल होती जाती है। नेपाल की वर्तमान अशांति को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए।

नेपाल ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म प्रतिबंधित कर दिए थे। विद्रोह के जख्म झेल चुके किसी देश में शहरी भीड़ को काबू करने के लिए सेना का इस्तेमाल भी अविवेकपूर्ण था। इसमें सुरक्षा बलों के अलग-थलग पड़ने, प्रदर्शनकारियों का हौसला और बुलंद होने और कभी ना भरने वाले घाव छोड़ने का जोखिम है। बल प्रयोग के बजाय भरोसा बनाने, रोजगार-शिक्षा के विश्वसनीय वादे और सुधारों की स्पष्ट योजना स्थिरता लाने के कारगर उपाय होंगे।

ऐसे में भारत को क्या करना चाहिए? जवाब के दो पहलू हैं- बुद्धिमानी और तैयारी। कोई सैन्य या राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसका फायदा सभी पक्ष उठाएंगे। ऐसा करना नेपाली राजनीति को ऐसे दौर में धकेल देगा, जिसे काबू करना मुश्किल होगा।

हम नेपाल में अपने नागरिकों के लिए दूतावास संबंधी त्वरित सेवाएं सुनिश्चित कर सकते हैं। सीमावर्ती राज्यों में आकस्मिक तैयारियां चाकचौबंद कर सकते हैं। नेपाली नागरिक और सुरक्षा अधिकारियों के साथ बातचीत के लिए संचार लाइनें खुली रख सकते हैं।

नेपाली संप्रभुता का सम्मान करने वाली भाषा में संयम का सार्वजनिक आग्रह कर सकते हैं। सूचना संबंधी तैयारियों के तहत गलत सूचनाओं की निगरानी और उनका जवाब देना और मीडिया के किसी भी पक्षपात से बचना सही उपाय है। अभी संयम ही सबसे अच्छा नैरेटिव होगा।

दमन एक अल्पकालिक समाधान और दीर्घकालिक गलती है। इंटरनेट प्रतिबंध या बलप्रयोग एक-दो दिन के लिए विरोध शांत कर सकता है, लेकिन सत्ता की ताकत अच्छी नौकरियों, विश्वसनीय पुलिसिंग, स्वतंत्र न्याय और शांतिपूर्ण शिकायत निवारण पर टिकी होती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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