श्रीश्री रवि शंकर का कॉलम:  खुश रहने के लिए किसी वजह की जरूरत नहीं होती
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श्रीश्री रवि शंकर का कॉलम: खुश रहने के लिए किसी वजह की जरूरत नहीं होती

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10 घंटे पहले

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श्रीश्री रवि शंकर आर्ट ऑफ लिविंग के प्रणेता, आध्यात्मिक गुरु - Dainik Bhaskar

श्रीश्री रवि शंकर आर्ट ऑफ लिविंग के प्रणेता, आध्यात्मिक गुरु

यदि आप अपने भीतर झांकें तो पाएंगे कि खुशी आपका स्वभाव है। दु:खी होने के लिए आपको किसी न किसी कारण की जरूरत पड़ती है, लेकिन खुश रहने के लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं होती। जब आपको कुछ भी नहीं चाहिए, तब जो स्थिति होती है, उसे ही खुशी कहा जाता है। यह जानने के लिए कि आप खुश हैं या नहीं, आपको अधिक कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। बस दर्पण में देखिए- आपकी मुस्कान कितनी बड़ी है, आप कितने शांत और संतुलित हैं।

अक्सर हम छोटी-छोटी बातों से अपनी प्रसन्नता खो देते हैं। कल्पना कीजिए कि आपने एक बहुत अच्छा केक बनाया और सभी ने उसका आनंद लिया। लेकिन आप- जो इसे बनाने वाले हैं- उदास हैं क्योंकि आप उस पर चेरी डालना भूल गए।

मेहमानों ने केक खाया, आनंद लिया और चले गए, लेकिन आपका मन अभी भी उस चेरी पर ही अटका हुआ है! ऐसा ही मन का स्वभाव है- यह छोटी-छोटी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है और जो खुशी पहले से मौजूद है, उधर ध्यान ही नहीं देता है।

यहीं पर योग की बुद्धिमत्ता काम आती है। खुशी और संतोष कोई संयोग नहीं हैं; वे अभ्यास हैं। जिस तरह शारीरिक स्वच्छता स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, उसी तरह मानसिक स्वच्छता एक सुखी जीवन के लिए अनिवार्य है।

यदि हम हर दिन कुछ मिनट अपने मन की देखभाल में लगाएं तो यह हमारे जीवन की गुणवत्ता को और अच्छा बनाता है, क्योंकि अंततः मन की स्थिति ही हमारे जीवन की दिशा तय करती है। ध्यान, श्वास-तकनीक और जागरूकता को विकसित करना ऐसे उपकरण हैं, जो मन को शुद्ध करने में मदद करते हैं और हमें हमारे स्वभाव में स्थिर करते हैं।

हालांकि, खुशी केवल एक व्यक्ति के आनंदित होने तक सीमित नहीं है। यह एक सामूहिक और संचारी गुण है। यदि किसी परिवार में केवल एक व्यक्ति प्रसन्न है और बाकी दु:खी हैं, तो वह खुशी टिकाऊ नहीं रह सकती। हमारे आस-पास के लोगों का सुख-दुःख हमारी स्वयं की प्रसन्नता को प्रभावित करता है। इसी कारण हमारी प्राचीन प्रार्थनाओं में हमेशा सामूहिक आनंद की कामना की गई- “सर्वे भवन्तु सुखिनः’- अर्थात् सभी सुखी हों। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि यदि आपके आस-पास के लोग दु:खी हैं, तो आपको भी उसी दु:ख में डूब जाना चाहिए? नहीं। यदि परिवार में कोई बीमार हो, तो कम से कम एक व्यक्ति को पुष्ट रहना आवश्यक होता है ताकि वह उनकी देखभाल कर सके।

इसी तरह, यदि आपके आस-पास के लोग दु:खी हैं, तो आपकी आंतरिक स्थिरता उनके लिए सहारा बन सकती है। आपकी प्रसन्नता दूसरों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह उनके उत्थान का कारण होना चाहिए।

यह 100 प्रतिशत सच है कि कोई और न तो आपको खुशी दे सकता है और न ही दु:ख। प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्म के अनुसार जीवन का अनुभव करता है। आप किसी को खुश करने के लिए दुनिया इधर से उधर कर दें, फिर भी वे दु:खी ही बने रह सकते हैं।

क्या आपने ऐसा नहीं देखा? आप हरसंभव प्रयास कर लेते हैं, फिर भी कुछ लोग शिकायतें करते ही रहते हैं। उनके मन की स्थिति उनकी अपनी बनाई हुई है, ठीक वैसे ही जैसे आपका मनोभाव आपकी स्वयं की जिम्मेदारी है।

कभी-कभी, खुश रहने में सबसे बड़े बाधक हम स्वयं ही होते हैं। इस बाधा से पार पाने का एक सरल उपाय यह है कि थोड़ी देर के लिए मूर्ख बन जाएं। जब और कुछ भी शांति नहीं देता, तो बस यह मान लें, “ठीक है, मैं नासमझ हूं!’ इस स्वीकार्यता से ही मन को गहरा विश्राम मिल सकता है। प्रसन्नता तब प्रकट होती है जब हम अपनी बुद्धि से परे जाते हैं- जब हम प्रेम में होते हैं, किसी वस्तु से चकित होते हैं, या जब हम हर समय बुद्धिमान दिखने की आवश्यकता को छोड़ देते हैं।

इसलिए, यदि कभी आपको लगे कि आप खुश नहीं हैं, तो बाहरी कारणों को मत ढूंढिए, बल्कि अपने अंदर की ओर देखें। खुशी न तो केक में है, न ही उस नदारद चेरी में- बल्कि यह उस आनंद में है, जिससे आप केक को दूसरों के साथ बांटते हैं, और जीवन का उसके सभी विरोधाभासों के साथ उत्सव मनाते हैं।

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