संपादकीय: भाषा की राजनीति में उलझी हिंदी, क्या भविष्य की पीढ़ी भुगतेगी खामियाजा?
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संपादकीय: भाषा की राजनीति में उलझी हिंदी, क्या भविष्य की पीढ़ी भुगतेगी खामियाजा?

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कोई ज्यादा दिन नहीं हुए जब तमिलनाडु में हिंदी के विरोध में आवाज उठी थी। केंद्र और राज्य के बीच भाषा के मुद्दे पर सियासी विवाद कई दिनों तक चला, जबकि इसका कोई तर्कसंगत आधार नहीं था। क्षेत्रीय भावनाओं को उभारने के लिए कुछ राज्यों में राजनीतिक दल तीसरी भाषा के रूप में हिंदी का आज विरोध जरूर कर रहे हैं, लेकिन ऐसा कर वे भावी पीढ़ियों का नुकसान ही करेंगे। क्योंकि जब युवा अपने राज्य से किसी दूसरे राज्य में पढ़ने या नौकरी करने जाएंगे, तब संपर्क भाषा के रूप में उन्हें हिंदी की ही जरूरत पड़ेगी।

हैरत की बात है कि अब महाराष्ट्र में भी सियासी विरोध शुरू हो गया है। वहां अंग्रेजी और मराठी माध्यम के स्कूलों में पहली से पांचवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य बनाने के आदेश पर रोक लगाने से कई सवालिया निशान उठे हैं। स्पष्ट है कि यह फैसला राजनीतिक दबाव में लिया गया। हालांकि शिक्षामंत्री ने हिंदी सीखने को स्वैच्छिक बता कर नरमी दिखाई है, मगर राज्य में विपक्षी दलों का विरोध समझ से परे है। आखिर भाषा पर कितने दिनों तक वे सियासत करते रहेंगे?

मराठी अस्मिता के नाम पर विरोध कर रहे दलों को यह सोचना चाहिए कि हिंदी और मराठी दोनों की लिपि देवनागरी है और इससे विद्यार्थियों को भाषा सीखने में सहजता रहती है। उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मुंबई के सिनेमा उद्योग ने हिंदी का जितना प्रसार किया है, उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। आज दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के लोग भी हिंदी समझ जाते और थोड़ी-बहुत बोल भी लेते हैं।

संगीत, साहित्य और फिल्मों से पूरे भारत में हिंदी जिस तरह आगे बढ़ी है, उसे अलग करके नहीं देखा जा सकता। बाजार की भाषा के रूप में आज हिंदी की एक अलग पहचान है। अब पर्यटन से लेकर उद्योग या कोई भी व्यवसाय इसके बिना नहीं चल सकता। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात अक्सर होती है, तो इसकी वजह समझी जा सकती है। क्योंकि यही वह भाषा है, जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी को एक सूत्र में बांधती है।





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