सुखवीर सिंह का कॉलम:  प्राइवेसी और डेटा-अधिकारों पर मजबूत नीतियां अब जरूरी हैं
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सुखवीर सिंह का कॉलम: प्राइवेसी और डेटा-अधिकारों पर मजबूत नीतियां अब जरूरी हैं

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8 घंटे पहले

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सुखवीर सिंह, लेखक और आईएएस अधिकारी - Dainik Bhaskar

सुखवीर सिंह, लेखक और आईएएस अधिकारी

पिछले दो हजार सालों में कृषि, लोहा, कागज, कम्पास, गनपाउडर, बिजली, प्रिंटिंग जैसी खोजें धीरे-धीरे सभ्यता के रूप को बदलती रही हैं। लेकिन अंतिम सौ सालों में परिवर्तन तेजी से हुआ और संचार, परिवहन, दवाई, ऊर्जा और सूचना तक पहुंच में अभूतपूर्व गति आई है। इनमें भी पिछले 25 वर्षों में जो हुआ, वह सूचना प्रौद्योगिकी के औद्योगीकरण, डेटा कलेक्शन और कंप्यूटेशनल ताकत के संयोजन का परिणाम है। इनसे सुपरकंप्यूटर्स, क्लाउड, आईओटी, एआई/एमएल, रोबोटिक्स, डेटा साइंस का समन्वय सामने आया, जो दुनिया को पहले के बजाय कहीं तेजी से बदल रहा है।

वास्तव में इंटरनेट और मोबाइल क्रांति ने अर्थव्यवस्था, समाज, संस्कृति और राजनीति- चारों को एक साथ झकझोर दिया है। आर्थिक स्तर पर बाजार की सीमाएं टूट गई हैं और पारंपरिक उत्पादन-भागीदारी की जगह डेटा-आधारित प्लेटफॉर्म हावी हो गए हैं। ऑटोमेशन और एआई ने लागत, निर्णय-प्रक्रिया और श्रम-संरचना को बदल दिया है। इनोवेशन आसान हो गया है। ग्लोबल-रीच बढ़ी है। लेकिन पूंजी के एक जगह इकट्ठे होने से विषमताएं भी तीव्र हुई हैं। डिजिटल-प्रभाव ने पारिवारिक और सामुदायिक ताने-बाने में दरारें डाली हैं।

युवा वर्चुअल दुनिया में पहचान, मान्यता और संबंध गढ़ रहे हैं, जिससे परंपरागत सांस्कृतिक ढांचे कमजोर हो रहे हैं। राजनीतिक स्तर पर डिजिटल माध्यमों ने सूचना-वितरण और चुनावी अभियान को नई शक्ति दी है, पर साथ ही गलत सूचना, ध्रुवीकरण और बाहरी हस्तक्षेप को भी बढ़ावा दिया है। डेटा और एआई आधारित निगरानी ने शासन की शक्ति और नागरिक की निजता के बीच नई खाई पैदा कर दी है, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब सूचना-नियंत्रण पर केंद्रित है।

युवाओं के व्यवहार में भी स्पष्ट बदलाव आए हैं। तेज रिवॉर्ड-सिस्टम्स, तुरंत प्रतिक्रिया, अनगिनत विकल्पों ने धैर्य, दीर्घकालीन योजनाओं और सामुदायिक समर्थन के स्थान को चुनौती दी है। इस संदर्भ में ‘चोकर गेम’ का उदाहरण महत्वपूर्ण है। युवा जोखिम, उत्तेजना और वायरल पहचान के लिए मूल सेफ्टी-नेट और परिवार/समाज के परम्परागत मार्ग को छोड़ तात्कालिक वर्चुअल मान्यता की ओर रुख कर रहे हैं। वे पुराने मूल्यों जैसे परिश्रम, धैर्य, सहिष्णुता, सामूहिकता, सामाजिक संस्कार आदि को कम प्राथमिकता दे रहे हैं।

सफलता का आकलन लाइक्स, फॉलोअर्स, व्यूज से हो रहा है। 2050-2060 के दशक तक यह परिवर्तन किसी साधारण तकनीकी उन्नति का रूप नहीं होगा- यह वह विस्फोट हो सकता है, जो आज की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक संरचनाओं की जड़ें हिला सकता है। परंपरा आधारित व्यवस्था, पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक मान्यताएं, भाषा का स्वाभाविक विकास, रिश्तों की नैतिक परिभाषाएं और श्रम-संस्कृति- सब धीरे-धीरे टूटकर नई, डिजिटल-केंद्रित संरचनाओं में पुनर्गठित होंगी।

एआई-आधारित व्यक्तिगत मॉडलिंग ‘एक जैसे पाठ्यक्रम’ और ‘एक जैसे उपचार’ को अप्रासंगिक बना देगी। श्रम की पारंपरिक परिभाषाएं टूटेंगी और नौकरियों की स्थिरता, करियर-मार्ग और दीर्घकालीन भूमिका जैसी अवधारणाएं इतिहास बन जाएंगी।

इतना ही नहीं, परिवार, विवाह और सामुदायिक बंधन की जगह वर्चुअल और ह्यूमनॉइड सहभागिता का नया मिश्रित ढांचा उभर सकता है, जहां एल्गोरिदमिक संगति और डिजिटल निकटता रिश्तों की नई भाषा बन जाएगी। संस्कृति और भाषा का विखंडन इतनी तेज गति से होगा कि दशकों पुरानी परंपराएं कुछ ही वर्षों में अप्रचलित लगने लगेंगी। रीति-रिवाज, सामूहिक अनुष्ठान, सामाजिक संकेतक विलीन हो जाएंगे।

यही कारण है कि निजता और डेटा-अधिकारों को लेकर मजबूत नीतियां बनाई जाना जरूरी हैं। अगर ऐसा नहीं किया गया तो निगरानी और डेटा-नियंत्रण समाज की नई संस्कृति बन जाएगी- जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक मूल्य नहीं, बल्कि दुर्लभ संपदा बनकर रह जाएगी। ऐसे में एकमात्र संभावित स्थिरता वही होगी, जो हम शिक्षा, कानून, समुदाय और मानव-केंद्रित तकनीक के रूप में निर्मित करेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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