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- Sudhir Chaudhary’s Column The World’s ‘double Standards’ On Pakistan’s Nuclear Bomb
3 घंटे पहले
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सुधीर चौधरी वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक
इजराइल-ईरान युद्ध के रुकने के बाद पूरी दुनिया में दो ही शब्द गूंज रहे हैं- सीजफायर और दोहरा चरित्र। लेकिन दिलचस्प है कि भारत-पाकिस्तान के सीजफायर को दुनिया अलग नजर से देखती है। भारत के विपक्षी दल इसे सरेंडर कहते हैं और भारत को हुए नुकसान की डिटेल मांगते हैं, ये साबित करने के लिए भारत जीता नहीं बल्कि युद्ध हार गया। लेकिन इजराइल और ईरान के सीजफायर पर किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया और पश्चिमी देश इसे शांति की जीत बता रहे हैं।
इस समय इजराइल की सड़कों पर लोग जीत का जश्न मना रहे हैं। इजराइल कहता है कि उसने ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों को नष्ट करने का अपना लक्ष्य हासिल कर लिया, इसलिए वो जीत गया। ईरान में खामेनेई के समर्थक भी सड़कों पर नाच रहे हैं और कह रहे हैं कि जीत ईरान की हुई क्योंकि इजराइल उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया, लेकिन ईरान ने इजराइल का बहुत नुकसान किया है। ईरान ने कहा है कि वो अब भी अपने न्यूक्लियर कार्यक्रम पर कायम है।
आज शांति सबसे महंगी चीज है। एक अनुमान के मुताबिक इस युद्ध में अमेरिका, इजराइल और ईरान के करीब ढाई लाख करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। अमेरिका में ट्रम्प भी बेहद खुश हैं क्योंकि उन्होंने ईरान न्यूक्लियर ठिकानों पर पहले बम बरसाए और फिर शांति की स्थापना का दावा किया और अब नोबेल शांति पुरस्कार की उम्मीद कर रहे हैं। यानी इस युद्ध में शामिल तीनों देश इसे अपनी जीत बता रहे हैं।
लेकिन इस प्रकरण में अमेरिका और पाकिस्तान का दोहरा चरित्र दुनिया ने देख लिया है। पाकिस्तान एक तरफ ओआईसी में मुस्लिम देशों की एकता की बात करता है और ईरान को ये आश्वासन भी देता है कि अगर जरूरत पड़ी तो वो ईरान के समर्थन में अपने परमाणु बम का इस्तेमाल कर सकता है।
दूसरी तरफ असीम मुनीर व्हाइट हाउस में अमेरिका के विशेष मेहमान बनकर ट्रम्प के साथ लंच करते हैं। एक तरफ पाकिस्तान ट्रम्प के नोबेल पुरस्कार की पैरवी करता है और दूसरी तरफ ट्रम्प ईरान पर बी-2 बॉम्बर विमान से बम बरसाते हैं। यानी पाकिस्तान का एक हाथ ईरान के कंधे पर है और दूसरा हाथ ट्रम्प के हाथ में है और ट्रम्प ने पाकिस्तान के हाथ को मरोड़कर रखा हुआ है।
आज ईरान और दुनिया भर के इस्लामिक देशों को सोचना होगा कि क्या पाकिस्तान वाकई भरोसे के लायक है? असल में आज पाकिस्तान इतनी कमजोर स्थिति में है कि वो ना तो अमेरिका को ना कह सकता है और ना ही चीन को इनकार कर सकता है।
पाकिस्तान अब सिर्फ इस्तेमाल हो सकता है। इसलिए अमेरिका और चीन दोनों ही पाकिस्तान की जमीन का खुलकर इस्तेमाल कर रहे हैं। पाकिस्तान का एक ही उद्देश्य है-भारत का विनाश और जो भी महाशक्ति उसे भारत के खिलाफ मदद का आश्वासन देती है, पाकिस्तान उसके आगे आसानी से घुटने टेकने के लिए तैयार हो जाता है।
अमेरिका के दोहरे चरित्र को भी देखिए। उसे ईरान का न्यूक्लियर बम मंजूर नहीं है, लेकिन उसे चोरी और स्मगलिंग से बने पाकिस्तान के परमाणु बम से कोई समस्या नहीं है। अमेरिका ईरान को धर्म के नाम पर चलने वाला कट्टरपंथी देश मानता है।
अमेरिका मानता है कि ईरान जैसे देशों में शासकीय अनुशासन नहीं है, वहां कोई प्रोटोकॉल नहीं है, इसलिए ऐसे देश के हाथ अगर परमाणु हथियार आ गए तो उनका दुरुपयोग हो सकता है। लेकिन ट्रम्प से ये सवाल होना चाहिए कि क्या पाकिस्तान भी ईरान जैसा ही देश नहीं है, जहां सत्ता और सेना की ताकत इस्लामिक कट्टरवाद से आती है?
ईरान हिजबुल्ला, हमास और हूती जैसे संगठनों को उसी तरह से पाल-पोसकर बड़ा करता है, जैसे पाकिस्तान लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिद्दीन और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों को पैसा, ट्रेनिंग और हथियार देता है। पाकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित लगभग 136 आतंकवादी रहते हैं और ये देश करीब 22 आतंकवादी संगठनों का घर है।
ईरान और पाकिस्तान को लेकर डर है कि इनके न्यूक्लियर हथियार कभी भी आतंकवादियों के हाथ में पहुंच सकते हैं, जिससे दुनिया खतरे में पड़ जाएगी। ईरान और नॉर्थ कोरिया को भी परमाणु बम बनाने की मदद पाकिस्तान से ही मिली है।
अगर 80 और 90 के दशक में अमेरिका ने पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को वैसे ही रोक दिया होता, जैसे आज ईरान का रोका है तो आज नॉर्थ कोरिया और ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम इतना बड़ा खतरा नहीं बनते। जब तक पाकिस्तान के पास परमाणु बम है, ईरान जैसे देशों के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करने से कुछ नहीं होगा।
अमेरिका के दोहरे चरित्र को भी देखिए। उसे ईरान का न्यूक्लियर बम मंजूर नहीं है, लेकिन उसे पाकिस्तान के परमाणु बम से कोई समस्या नहीं है। ट्रम्प से ये सवाल होना चाहिए कि क्या पाकिस्तान भी ईरान जैसा ही देश नहीं है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








