सुधीर चौधरी का कॉलम:  रूस-भारत-चीन ‘ट्रॉइका’ का समय क्या आ गया है?
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सुधीर चौधरी का कॉलम: रूस-भारत-चीन ‘ट्रॉइका’ का समय क्या आ गया है?

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5 घंटे पहले

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सुधीर चौधरी वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक - Dainik Bhaskar

सुधीर चौधरी वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक

फ्रांसीसी लेखक विक्टर ह्यूगो का यह कथन आज भारत की विदेश नीति और बदलती विश्व-व्यवस्था पर पूरी तरह से सटीक बैठता है कि जिस विचार का समय आ गया हो, उसे कोई नहीं रोक सकता। सवाल यह है कि क्या अब वह समय आ गया है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति- जिसे हम ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ कह सकते हैं- और रूस-भारत-चीन (आरआईसी) ट्रॉइका मिलकर अमेरिका व पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती दें?

वास्तव में, मोदी के कार्यकाल में भारत की विदेश नीति में एक बड़ा बदलाव आया है। भारत अब फॉलोअर नहीं, बल्कि एजेंडा-सेटर की भूमिका निभा रहा है। अमेरिका, रूस, यूरोप, खाड़ी देशों और अफ्रीका- सबके साथ रिश्तों को संतुलित करना, ग्लोबल साउथ की आवाज बनना, इंडिया फर्स्ट की सोच को व्यवहार में उतारना आदि इसमें शामिल है।

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने एक नया संदेश दिया है- सीमा विवाद को पीछे छोड़, सहयोग के रास्ते खोलना। यह वही रणनीति है, जो तनाव में भी अवसर तलाशने की मोदी डॉक्ट्रिन की पहचान है।

अगर मोदी डॉक्ट्रिन का अगला पड़ाव कोई है, तो वह आरआईसी ट्रॉइका ही है। जरा आंकड़े देखिए। इन तीनों देशों में मिलकर 3 अरब लोग यानी दुनिया की 37 फीसदी आबादी रहती है। इनकी संयुक्त जीडीपी 22.4 फीसदी (नॉमिनल) और 34.2 फीसदी (पीपीपी) है। यह जी-7 के लिए सीधी चुनौती है।

दुनिया का कुल 20 फीसदी भूभाग इन तीन देशों में है। इनके पास 46 लाख सक्रिय सैनिक हैं, यानी नाटो से ज्यादा। रूस के पास तेल-गैस के भंडार हैं, चीन का 90 फीसदी रेयर-अर्थ तत्वों पर नियंत्रण है और भारत की मैन्युफैक्चरिंग तेजी से विकसित हो रही है।

खाद्य सुरक्षा की बात करें तो आरआईसी के पास खाद्यान्नों का भरपूर उत्पादन है। हिंद महासागर, दक्षिण चीन समुद्र और आर्कटिक रूट इनके नियंत्रण में हैं। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में रूस और चीन स्थायी सदस्य हैं, वहीं भारत विकासशील देशों का दुनिया में सबसे बड़ा प्रतिनिधि बनकर उभरा है। यानी यह गठबंधन आर्थिक, सैन्य और तकनीकी- हर स्तर पर अपराजेय सिद्ध हो सकता है।

ट्रम्प ने 50 फीसदी तक के टैरिफ लगाकर वैश्विक व्यापार को हिला दिया है। लेकिन यह कदम ब्रिक्स देशों को और करीब ला रहा है। ब्रिक्स अब डॉलर पर निर्भरता कम कर, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ा रहा है। ब्रिक्स-पे जैसे भुगतान सिस्टम पश्चिमी वित्तीय ढांचे को चुनौती दे रहे हैं। यूरोप और अमेरिका के लिए यह सीधी चेतावनी है- अब ग्लोबल साउथ भी अपना रास्ता बना रहा है।

31 अगस्त को तियानजिन में हुई मोदी-शी मुलाकात ने यही संकेत दिया कि भारत और चीन रिश्तों को रीसेट करने की ओर हैं। सीमा विवाद पर शांति का संदेश दिया गया है। व्यापार बहाली और वीसा नियम आसान करने की घोषणा की है। रेयर-अर्थ सप्लाई में सहयोग का संकेत मिला है।

ये तमाम संकेत सिर्फ भारत-चीन के रिश्तों के लिए नहीं, बल्कि पूरे आरआईसी ढांचे के लिए अहम हैं। लेकिन चुनौतियां भी हैं, जैसे कि भारत-चीन सीमा विवाद, चीन-पाकिस्तान गठजोड़ और अमेरिका सहित पश्चिम की कोशिश कि यह गठबंधन कभी पूरी तरह से आकार न ले पाए।

लेकिन मोदी डॉक्ट्रिन का मूल यही है- विरोधाभासों के बीच संतुलन साधना। आज भारत एक साथ अमेरिका और रूस दोनों से संबंध मजबूत रख सकता है; चीन से प्रतिस्पर्धा भी कर सकता है और सहयोग भी। यही कूटनीति का नया संतुलन है।

तो क्या एक नई विश्व-व्यवस्था बन रही है? देखें तो आज दुनिया एक नए शीतयुद्ध की ओर बढ़ रही है- अमेरिका और उसके सहयोगी एक तरफ और ब्रिक्स जैसे समूह दूसरी ओर। अगर आरआईसी ट्रॉइका मजबूत होता है, तो यह न केवल अमेरिका बल्कि जी7 और यूरोप की आर्थिक-सैन्य ताकत को भी संतुलित कर देगा।

भारत इस नए समीकरण में किंगमेकर की भूमिका में है। तो ये कहना गलत नहीं होगा कि आरआईसी का समय आ गया है, और इसे आकार दे रहा है मोदी डॉक्ट्रिन। भारत अब तटस्थ दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय निर्माता बन चुका है। और जब हाथी (भारत), ड्रैगन (चीन) और भालू (रूस) एक साथ चलेंगे- तो दुनिया का पावर बैलेंस तो बदलना तय ही है।

भारत अब तटस्थ दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय निर्माता बन चुका है। जब हाथी (भारत), ड्रैगन (चीन) और भालू (रूस) साथ चलेंगे- तो पावर बैलेंस बदलना तय है। यह अमेरिका, जी7 और यूरोप की ताकत को भी संतुलित करेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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