‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के शिल्पकार राम सुतार का निधन:  बढ़ई परिवार में जन्मे, पिता से छेनी-हथौड़ी चलाना सीखा; 1,150 से ज्यादा मूर्तियां बनाईं
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‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के शिल्पकार राम सुतार का निधन: बढ़ई परिवार में जन्मे, पिता से छेनी-हथौड़ी चलाना सीखा; 1,150 से ज्यादा मूर्तियां बनाईं

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1 दिन पहले

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‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ जैसी विशालकाय मूर्तियों के रचयिता राम वानजी सुतार का गुरुवार, 18 दिसंबर को निधन हो गया। वो 100 साल के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे।

सुतार ने संसद भवन परिसर में ध्यान मुद्रा में बैठे महात्मा गांधी की मूर्ति और दिल्ली में घोड़े पर सवार छत्रपति शिवाजी की मशहूर प्रतिमा भी बनाई थी। सुतार का मतलब कारपेंटर होता है।

पिता से छेनी-हथौड़ी चलाना सीखा

महाराष्ट्र के एक बढ़ई परिवार में जन्मे राम सुतार के पिता कारपेंटर का काम करते थे। साथ ही खेती के औजार, गाड़ियां और बैल गाड़ियां बनाते थे। बचपन में राम सुतार अपने पिता के साथ काम किया करते थे। उन्हीं से छेनी-हथौड़ी चलाना सीखा।

गांव से ही शुरुआती पढ़ाई हुई

चौथी तक गांव में पढ़ाई की। इसके बाद पड़ोस के गांवों से 5वीं और छठी की पढ़ाई की। फिर धूलिया आ गए। धूलिया से उन्होंने मैट्रिकुलेशन किया। यहीं, उनकी मुलाकात ड्रॉइंग टीचर श्री रामकृष्ण जोशी से हुई। जोशी से जब राम सुतार से कला के प्रति रुझान देखा तो उन्हें बहुत प्रोत्साहित किया।

ड्रॉइंग टीचर ने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स भेजा

जोशी की ही वजह से मैट्रिकुलेशन के बाद राम सुतार मुंबई आ गए और जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में एडमिशन लिया। यहां से उन्होंने मूर्ति कला की बारीकियां सीखी। जोशी जी ने मुंबई में अपने रिश्तेदार के यहां उनके रहने खाने का इंतजाम किया।

राम सुतार ने जेजे स्कूल में 5 साल का कोर्स 4 साल में कंप्लीट किया। यहां वो गोल्ड मेडलिस्ट रहे।

4 साल अजंता और एलोरा की गुफाओं के लिए काम किया

कॉलेज से निकलने के बाद उन्होंने कर्माकर नाम से एक स्कल्पचर के यहां काम किया। यहां एक मार्बल की चेयर पर बैठी एक महिला की मूर्ति बनाई। इसके बाद उन्हें अजंता और एलोरा की गुफाओं में सुधार और संरक्षण करने के लिए औरंगाबाद में नौकरी मिल गई। वो यहां 4 साल रहे। यहां उन्‍होंने पुरानी और टूटी मूर्तियों को सही किया।

सुतार राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिमा बनाने के लिए मशहूर थे। (फाइल फोटो)

सुतार राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिमा बनाने के लिए मशहूर थे। (फाइल फोटो)

सरकारी नौकरी छोड़कर मूर्ति बनाने लगे

आगे चलकर वो दिल्ली आ गए। यहां उन्होंने DAVP यानी डायरेक्टरेट ऑफ एडवर्टाइजिंग एंड विजुअल पब्लिसिटी जॉइन किया। उन्होंने DAVP में काम किया।

इसी दौरान उन्हें दिल्ली के प्रगति मैदान में एक मूर्ति बनाने का काम पता चला। वहां गए और 13-13 फीट के फार्मर्स की 2 मूर्तियां बनाई- एक कपल फिगर और दूसरी स्टैंडिंग फार्मर की।

राम सुतार की सरकारी नौकरी होने से उन्हें इस तरह के काम की परमिशन नहीं थी। ऐसे में उन्होंने अपने पद से रिजाइन कर दिया। फिर थोड़े ही दिनों बाद उन्हें पार्लियामेंट में अशोक स्तंभ लगाने का काम मिला। इसके बाद ये सिलसिला चलता रहा।

बड़ी मूर्तियां बनाने की इच्छा आनुवांशिक है

सुतार ने 1942 में पहली मूर्ति बनाई थी। उन्होंने जीवनभर में 1,150 से ज्यादा मूर्तियां बनाई। भारत के बाहर भी कई देश राम सुतार की बनाई हुई मूर्तियों से सुसज्जित हैं। संसद परिसर में मौजूद ध्यान मुद्रा में बैठे महात्मा गांधी की प्रतिमा को बहुत सराहना मिली।

सुतार ने एक इंटरव्यू में बताया था कि शायद उन्हें बड़ी मूर्तियों को बनाने का इच्छा हेरिडिटी यानी आनुवांशिक थी। पिता जी गणेश भगवान की बड़ी मूर्तियां बनाते थे। उन्हीं से बड़ी मूर्ति बनाने की इच्छा सुतार के जीन में आई।

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