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नई दिल्ली6 घंटे पहले
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केंद्र सरकार के निर्देश के बाद स्विगी और जेप्टो ने बुधवार को अपने प्लेटफॉर्म से ’10 मिनट में डिलीवरी’ के दावे को हटा दिया। सरकार ने इन कंपनियों को सख्त हिदायत दी है कि वे डिलीवरी टाइम को लेकर ऐसे दावे न करें जिससे डिलीवरी पार्टनर्स पर दबाव बने।
इससे पहले मंगलवार को ब्लिंकिट ने अपने विज्ञापनों और एप से ’10 मिनट’ का टैग हटाया था। केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने मंगलवार को ही क्विक कॉमर्स कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ एक हाई-लेवल मीटिंग की थी। इस बैठक में डिलीवरी पार्टनर्स की सुरक्षा और उनके काम करने के तरीकों पर चर्चा हुई थी।
सरकार का मानना है कि 10 मिनट में सामान पहुंचाने के वादे के कारण राइडर्स पर मानसिक दबाव बढ़ता है, जिससे सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। मंत्रालय ने साफ कहा कि कंपनियों को अपनी ब्रांडिंग से समय की पाबंदी हटानी होगी।
कंपनियों ने बदला अपना स्लोगन और विज्ञापन
सरकार की सख्ती के बाद कंपनियों ने अपने एप और सोशल मीडिया हैंडल पर बदलाव शुरू कर दिए हैं। ब्लिंकिट ने अपनी टैगलाइन ‘10,000+ प्रोडक्ट्स 10 मिनट में’ को बदलकर अब ‘30,000+ प्रोडक्ट्स आपके दरवाजे पर’ कर दिया है।
इसी तरह स्विगी और जेप्टो ने भी अपने प्लेटफॉर्म से 10 मिनट वाले वादे को हटाकर उसे सर्विस की सुविधा और वैराइटी पर फोकस कर दिया है।

सोशल मीडिया और कई मंचों पर 10-15 मिनट की डिलीवरी सर्विस की आलोचना हो रही थी।
राइडर्स की सुरक्षा और तेज ड्राइविंग पर थी चिंता
क्विक कॉमर्स सेक्टर की सबसे बड़ी आलोचना इस बात को लेकर होती रही है कि 10 मिनट की डेडलाइन पूरा करने के चक्कर में राइडर्स तेज गाड़ी चलाते हैं और ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, इस होड़ की वजह से राइडर्स के बीच तनाव और हादसों की खबरें बढ़ रही थीं। हालांकि, कंपनियां दावा करती रही हैं कि वे राइडर्स को टाइम लिमिट नहीं दिखाते, लेकिन विज्ञापन का असर जमीन पर अलग दिखता था।
बिजनेस मॉडल पर क्या पड़ेगा असर?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि विज्ञापन से 10 मिनट का दावा हटाने का मतलब यह नहीं है कि डिलीवरी देर से होगी। कंपनियां अभी भी अपने डार्क स्टोर्स (स्थानीय गोदामों) की मदद से तेजी से सामान पहुंचाएंगी।
एलारा कैपिटल के करण तौरानी के अनुसार, यह बदलाव केवल ब्रांडिंग और दिखावे तक सीमित है, बिजनेस मॉडल में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। कंपनियां अब स्पीड के बजाय ‘सुविधा’ और ‘ज्यादा प्रोडक्ट्स’ को अपनी ताकत बनाएंगी।
गीग वर्कर्स की हड़ताल ने खींचा था सरकार का ध्यान
बता दें कि नए साल की शुरुआत में ही देश के कई हिस्सों में डिलीवरी पार्टनर्स ने हड़ताल की थी। उनकी मुख्य मांग बेहतर वेतन, सुरक्षा और काम के घंटों में सुधार थी।
आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने भी संसद में यह मुद्दा उठाया था और गीग वर्कर्स के लिए सोशल सिक्योरिटी और सम्मानजनक वेतन की मांग की थी। इसके बाद ही सरकार ने इस मामले में दखल दिया।
गिग वर्कर्स ने 31 दिसंबर को हड़ताल की थी
कम कमाई और 10 मिनट में डिलीवरी के प्रेशर से परेशान गिग वर्कर्स ने न्यू ईयर से पहले 31 दिसंबर को हड़ताल की थी, जिसमें स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, जेप्टो जैसी कंपनियों के राइडर्स शामिल थे। इससे पहले गिग वर्कर्स ने 25 दिसंबर को क्रिसमस पर भी हड़ताल की थी। इन हड़ताल में गिग वर्कर्स ने 10 मिनट में डिलीवरी मॉडल को खत्म करने समेत कई मांगें की थीं।

क्या है क्विक कॉमर्स ?
- क्विक कॉमर्स को 15-30 मिनट के भीतर ग्रॉसरी और अन्य सामान पहुंचाने वाला मॉडल कहा जाता है।
- यह ‘डार्क स्टोर्स’ (छोटे गोदामों) के नेटवर्क पर आधारित होता है, जो रिहायशी इलाकों के 2-3 किलोमीटर के दायरे में होते हैं।
गिग वर्कर्स की स्थिति
- भारत में लगभग 80 लाख से ज्यादा लोग गिग इकोनॉमी (डिलीवरी, कैब आदि) से जुड़े हैं।
- नीति आयोग के अनुमान के मुताबिक 2030 तक यह संख्या बढ़कर 2.35 करोड़ हो सकती है।

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ब्लिंकिट जैसी क्विक कॉमर्स कंपनियों ने अब ’10 मिनट में डिलीवरी’ का दावा हटा दिया है। यह बदलाव डिलीवरी बॉयज की हड़ताल और सरकार की दखल के बाद आया है। सरकार के साथ हुई बैठक में ब्लिंकिट के अलावा स्विगी और जेप्टो ने भी भरोसा दिया है कि वे अब ग्राहकों से समय सीमा का वादा करने वाले विज्ञापन नहीं करेंगे। पूरी खबर पढ़ें…








