हरिवंश का कॉलम:  मुल्क मजबूत रहेगा, तभी न्यायपालिका है, संसद है…
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8 घंटे पहले

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हरिवंश राज्यसभा के उपसभापति - Dainik Bhaskar

हरिवंश राज्यसभा के उपसभापति

न्यायपालिका में समाहित है- ‘न्याय’। ‘न्याय’ में ईश्वरत्व है। न्यायपालिका, समाज-समय के श्रेष्ठ मूल्यों, नैतिक सत्वों, उच्चतर संस्कारों की नींव पर विकसित है। आजादी बाद, इस बुनियाद में न जाने कितने गुमनाम ‘दधीचियों’ की हड्डियों की आहुति है। ऐसे ही कुछेक गुमनाम ‘दधीचियों’ का पुनर्स्मरण।

उच्च न्यायालय से रिटायर थे- जज एसके धर। तीन वर्ष से कम पद पर रहे, इसलिए पेंशन के हकदार नहीं थे। इलाहाबाद से रिटायर थे, इसलिए वहां प्रैक्टिस नहीं की। दिल्ली गए। आंखों में तकलीफ हुई। अभावों के दिन आए।

घर आगरा लौट गए। उनकी स्थिति जानकर कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें आर्बिट्रेटर (पंच) बनाया। बदले में 50 हजार फी। न्यायमूर्ति धर ने मना कर दिया। मुख्य न्यायाधीश को लगा, फी कम है।

बढ़ाकर एक लाख किया। धर ने लिखा, फी कम होने से उन्होंने प्रस्ताव नहीं ठुकराया। उन्हें पैसों की सख्त जरूरत है। पर आर्बिट्रेटर न बनने का फैसला न्यायमूर्ति पद पर कुछ दिनों रहने के कारण किया है। उसकी गरिमा-मर्यादा के तहत।

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति थे- विजन कुमार मुखरीजा। एक दिन प्रधानमंत्री नेहरू ने उनसे संपर्क किया। कहा, आप अगले मुख्य न्यायाधीश होंगे न्यायमूर्ति पतंजलि शास्त्री के रिटायर होने पर (1954)। पर वरीयता में न्यायमूर्ति मेहरचंद महाजन थे।

निजी कारणों से महाजन पंडितजी की पसंद नहीं थे। इस प्रस्ताव पर जस्टिस मुखरीजा ने तत्काल प्रधानमंत्री को कहा कि वरीयता में न्यायमूर्ति महाजन हैं। अगर वे मुख्य न्यायाधीश नहीं बने, तो वे और उनके अधिसंख्य सहयोगी जज विरोध में इस्तीफा देंगे।

जस्टिस महाजन ही मुख्य न्यायाधीश बने। उनके बाद 1954 (दिसंबर) में न्यायमूर्ति मुखरीजा मुख्य न्यायधीश हुए। ऐसे अनेक ‘दधीचि’ रहे हैं, न्यायपालिका में। वरीयता तोड़ मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति का मिजाज आजादी बाद से ही है। 1974-75 के बाद इसका नग्न खेल दिखा। लेकिन वरीयता छोड़ इस केंद्र सरकार पर मुख्य न्यायाधीश नियुक्ति का आरोप, तो कटु विरोधी भी नहीं लगा सकते?

ऐसे ही ‘दधीचि’ जजों के संस्कार, आचरण, मूल्यों पर चलने वाले वकील रहे हैं इस मुल्क में। बड़े वकील (इलाहाबाद हाईकोर्ट) थे- कैलाश नाथ काटजू। मुख्यमंत्री, राज्यपाल भी रहे। बंगाल के राज्यपाल थे। उनके बेटे शिवराज काटजू को एक कंपनी ने बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में रखने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने पिता से राय ली।

पिता ने बेटे को ऐतिहासिक पत्र लिखा। मर्म है- यह पद तुम्हें शायद मेरे राजनीतिक महत्व के कारण मिल रहा है। अगर कंपनी बोर्ड में शामिल होना, तो बताना। गवर्नर पद छोड़कर इलाहाबाद लौट आऊंगा। यह नैतिक ऊंचाई थी!

राजेंद्र बाबू पटना में वकील थे। अफ्रीका में गांधी के अभिन्न सहयोगी रहे थे- भवानी दयाल संन्यासी। आजादी की लड़ाई के बड़े नाम।

उनके एक रिश्तेदार नामी वकील की तलाश में थे। संन्यासी ने राजेंद्र बाबू के पास उन्हें भेजा। लौटकर संन्यासी से उन्होंने शिकायत की, हमें वकील के पास भेजा था या महात्मा के पास? फर्जी आरोपों-तर्कों को सुन राजेंद्र बाबू ने झूठा मुकदमा लेने से इनकार कर दिया था।

महात्मा गांधी भी एक वकील थे। अनेक प्रसंग हैं। वे कहते थे कि एक वकील का फर्ज कानूनी और विरोधी लाभों का फायदा उठाना नहीं है। समझौता-मेल-मिलाप को बढ़ावा देना है। अनेक चर्चित मुकदमों में गांधी ने नैतिक सच का पक्ष लिया। अदालत के बाहर प्रतिद्वंद्वियों में सुलह कराई। गलत करने वालों ने ‘अदालत’ के सामने सच कबूले।

पूर्व जज धर, पूर्व मुख्य न्यायाधीश मुखरीजा, वकील रहे काटजू, वकील के रूप में जीवन शुरू करने वाले राजेंद्र बाबू-गांधी जी जैसे अनेक ‘दधीचियों’ की आहुति पर भारतीय न्यायपालिका की ‘लोकप्रतिष्ठा’ है। इसकी रक्षा खुद न्यायपालिका को करनी है।

आज, दुनिया की भू-राजनीति का सबसे बड़ा सच क्या है? आर्थिक महाशक्ति बने बिना भविष्य नहीं है। भारत ‘ताकतवर’ बनने के रास्ते पर है। मुल्क मजबूत रहेगा, तभी न्यायपालिका है, संसद है, दल हैं, आजादी है या हम हैं। वक्त है कि सभी पक्ष-संवैधानिक अंग, समय के इस नाजुक पल को पहचानें व मुल्क के लिए राष्ट्रीय सहमति बनाएं।

पूर्व जज धर, पूर्व सीजेआई मुखरीजा, वकील रहे काटजू, वकील के रूप में जीवन शुरू करने वाले राजेंद्र बाबू-गांधी जी जैसे अनेक ‘दधीचियों’ की आहुति पर न्यायपालिका की ‘लोकप्रतिष्ठा’ है। रक्षा न्यायपालिका को ही करनी है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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